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गाँधी की खादी बाजार के हवाले
लखनऊ, अगस्त । गाँधी के नारे के सहारे सत्ता के  गलियारों तक पहुँचने वाली कांग्रेस ने अब उनकी  खादी  को बाजार के ताकतों के हवाले कर दिया है । सरकार ने खादी से  20 फीसदी  की सब्सिडी खत्म कर  दी  है । जिससे अब खादी  लेने पर कोई छूट नहीं मिलेंगी । 
कांग्रेस सरकार ने खादी वस्त्रों पर हर साल गाँधी जयंती के उपलक्ष्य में दी जाने वाली २० फीसदी  की छुट इस साल से बंद करने का निर्णय लिया है, जब की हर साल यह छूट आज़ादी मिलने के बाद से अभी तक बिना किसी रुकावट के मिलती रही है। खादी वस्त्रों पर हर साल केंद्र के अलावां उत्तर  प्रदेश सरकार भी अपनी तरफ से १० फीसदी   का छुट देती है जो आज भी जारी है| बहुजन समाज पार्टी की सरकार से एक बार छूट बंद करने की उम्मीद की जा सकती थी लेकिन यह निर्णय गाँधी के आदर्शों को ढोने वाली कांग्रेस सरकार ने लिया । 
यह प्रस्ताव दरअसल पूर्व में भाजपा नेतृत्व वाली (राजग) सरकार ने तैयार किया था, जिसे भाजपा ने यह सोच कर नहीं लागू कराया की उसके अपने ही संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ऊपर गाँधी की हत्या कराने के आरोप लग चुके हैं । पूर्व राजग सरकार जिस  प्रस्ताव को  लागू कराने का साहस नहीं कर पाई, उसको कांग्रेस सरकार ने  बहुत आसान तरीके से लागू करा ।   
उत्तर प्रदेश में इसे लेकर आन्दोलन शुरू हो गया है । १६ अगस्त को पुरे प्रदेश के उत्पाद और बिक्री केंद्र बंद रखे गए । २२ अगस्त से वर्धा में गाँधी वादी फिर से आन्दोलन की रूप रेखा बना रहे है । खादी  पर यहे छूट आजादी के पहले १९२० से दी जा रही है, हर साल गाँधी जयंती २ अक्टूबर  पर १०८ दिनों तक यह  छूट दी जाती है । गाँधी आश्रम के सचिव रामेश्वर नाथ  मिश्रा बताते है कि यही वो  वक्त होता है, जिसमे करीब पूरे साल कि ८५ फीसदी  की बिक्री होती है, शेष १५ फीसदी  वर्ष भर में की जाती । 
पूरे देश में खादी   के करीब १९५० मान्यता प्राप्त संस्थान है, जिसमे ५५००० से उपर वेतन भोगी कर्मचारी है,जिसमे कतिन बुनकरों की संख्या २.५ से ३लाख है और करीब उत्तर प्रदेश में २२००० समितियां है। 
 इन समितियों में करीब ५५ लाख स्त्री बुनकर व कातिन हैं । भारत सरकार नें राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी के खादी  के प्रचार प्रसार  की  नीतियों पर कुठारा घात करते हुए वर्षों से खादी पर दी जाने वाली इस छूट को समाप्त कर उसके स्थान पर ०१ अप्रैल २०१० से विपणअन विकास सहायता देना लागू कर दिया है । 
इस योजना के प्रावधानों के अनुसार वर्षों से भारी छूट का लाभ उठाने के आदि हो चुके ग्राहकों को अब खादी के वस्त्रों पर अब ४ या ५ फीसदी  छूट ही उपलब्ध हो पायेगी जिससे खादी की बिक्री निश्चीत तौर पर प्रभावित होगी और खादी संस्थाओं  तथा उनसे जुड़े बुनकरों और कामगारों को भारी वितीय क्षति उठानी पड़ेगी । निजी और कॉरपोरेट संस्थाओं द्वारा अपने ग्राहकों को दी जा रही आकर्षक छूट व अन्य प्रलोभनों के चलते धीरे धीरे खादी संस्थाओं  में ताले पड़ते जायेंगे । 
१४  अक्टूबर २००९ को प्रधानमंत्री को प्रतिवेदन दे कर उनकी खादी विरोधी नीतियों का विरोध करते हुए नए निर्णयों को लागू करनें  में असमथर्ता प्रकट की । कुछ संस्थाओं  द्वारा  सरकार द्वारा खादी विरोधी नीतियाँ न वापस लेने के विरोध में असहयोग आन्दोलन की चेतावनी  दे डाली| 
इस पर कम्युनिस्ट   पार्टी ऑफ़ इंडिया के महासचिव अशोक मिश्रा का कहना है यह खादी के ऊपर एक प्रहार है, सरकारी संरक्षण के बिना इसको नहीं चलाया जा सकता है। कांग्रेस गाँधीवाद की हत्या कर रही है  और ये विश्व व्यापर के समर्थक है तथा इस उद्योग को मरनें नहीं दिया जायेगा ।जनसत्ता में आशुतोष सिंह की रपट 
 
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