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 अमित प्रकाश सिंह

नई दिल्ली केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने मंगलवार को ओडीशा के कालाहांडी और रायगढ़ जिलों की लांजीगढ़ बाक्साइट खदानों की मंजूरी रद्द कर दी। इस महत्त्वपूर्ण फैसले से स्टरलाइट या वेदांत रिसोर्सेज समूह को गहरा झटका लगा है। सरकार अब दक्षिण कोरिया की कंपनी पोस्को की परियोजना में भी वनवासी कानून, पुनर्वास आदि कानूनों पर अमल की पड़ताल करेगी। मंत्रालय की सचिव मीना गुप्त की अगुवाई में एक दल प्रस्तावित परियोजना स्थल का दौरा करेगा जिसकी रपट पर ही कोई फैसला लिया जा सकता है। 
मंत्रालय के इस अहम फैसले के साथ ही राज्य में निवेश और रोजगार को बढ़ावा देने के नाम पर बीजू जनता दल और कांग्रेस के बीच रस्साकशी का नया दौर शुरू हो गया है। साथ ही यह सवाल उभरा है कि विकास के नाम पर देश की आदिवासियों और दलितों से उनकी जल, जंगल, जमीन और आजीविका छीन लेना क्या उचित है। 
पर्यावरण और वनमंत्री ने कहा है कि मंत्रालय का फैसला देश में आने वाली विदेशी मुद्रा के लालच, आस्था या दबावों के आधार पर नहीं लिया गया है। बल्कि संसद में पास किए गए कानूनों की राज्यों में हो रही अनदेखी, विभिन्न जांच समितियों की रपट और एटार्नी जनरल की राय पर लिया गया है। उन्होंने कहा कि सोमवार को दिल्ली में ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, राज्य के प्रमुख सचिव और अन्य अधिकारियों से उनकी मुलाकात हुई थी। मंगलवार को भी उन्होंने राज्य के अधिकारियों से राय-मश्विरा किया। इस दौरान अधिकारी एनसी सक्सेना समिति की रपट के पांच मुद्दों और वन अधिकार कानून 2006 को लागू कराने की कार्यप्रणाली पर आई रपट की ही आलोचना करते रहे। उधर, समिति के अध्यक्ष एनसी सक्सेना ने कहा, ‘रपट में साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य सरकार के अधिकारी वन अधिकार कानूनों की अनदेखी करने में कंपनी से मिले हुए हैं। मैंने परियोजनास्थल का दौरा करने वाले केंद्रीय पर्यावरण अधिकारियों को कोई प्रमाण पत्र नहीं दिया है जिन्होंने वहां जाकर कई अनियमितताओं की अनदेखी की।’ 
जयराम रमेश ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने आठ अगस्त, 2008 के फैसले में परियोजना को ‘मंजूरी’ जरूर दी लेकिन इसके साथ ही कहा था कि पर्यावरण और वन मंत्रालय को कानून के तहत अपनी मंजूरी देने पर सोचना चाहिए। इस संबंध में अपनी भूमिका जानने के लिए मंत्रालय ने एक पत्र कानून मंत्री को भेजा। उसके जवाब में भारत सरकार के एटार्नी जनरल ने साफ लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पर्यावरण और वन मंत्रालय के लिए बाध्यकारी नहीं है। मंत्रालय निष्पक्ष तौर पर फैसला ले सकता है। मंत्रालय ने तब ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी कर पूछा कि पर्यावरण नियमों का पालन न करने पर दी गई मंजूरी को क्यों न खारिज कर दिया जाए।
उधर ‘भाषा’ के अनुसार वेदांत रिसोर्सेज का तर्क है कि लांजीगढ़ बाक्साइट खदानों में किसी भी कानूनी प्रावधान की अनदेखी नहीं हुई है। नियमगिरि खदान तो उसके अधिकार में ही नहीं है। फिर भी जब तक मंजूरी नहीं मिलेगी कोई खनन गतिविधि नहीं होगी। खनिज के वैकल्पिक स्रोत तलाशे जाएंगे। कंपनी ने दावा किया है कि ओडीशा सरकार अब बदले में वैकल्पिक खदानें देने पर विचार कर रही है।
ओडीशा सरकार का वेदांत रिसोर्सेज को वैकल्पिक खदान उपलब्ध कराने के वायदे से जाहिर है कि सरकार हर हाल में इस समूह से राज्य में निवेश कराने पर आमादा है। विकास, रोजगार और निवेश के जादुई प्रभाव से विधानसभा चुनाव में वोट पाने के लिए यह पांसा फेंका जा रहा है। इस पूरे प्रसंग पर ओडीशा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद भक्तचरण दास ने कहा कि इस फैसले से नियमगिरि पहाड़ी क्षेत्र के जनजाति समुदाय डोगरिया कोंड के लोगों के लंबे संघर्ष को मान्यता मिली है। यह इस समुदाय और दलित परिवारों की जीत है, जिनकी जिंदगी सदियों से वनोपज पर ही निर्भर है। इन सबका भी इस राज्य और देश के दूसरे निवासियों की तरह ही रहने और जीने का हक है।
 जनसत्ता  
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