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विभूति के उतराधिकारी की तलाश

 आलोक तोमर

नई दिल्ली, अगस्त- तैतीस साल भारतीय पुलिस सेवा में नौकरी करने वाले और एक साहित्यकार के तौर पर अपना नाम जमाने वाले उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विभूति नारायण राय को अब अदालत से जमानत लेनी पड़ेगी। विभूति नारायण राय फिलहाल दुनिया में हिंदी के अकेले विश्वविद्यालय महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। 
विभूति नारायण राय के खिलाफ लिखवाई गई एफआईआर में कहा गया है कि श्री राय ने साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय में एक साक्षात्कार में कुछ भारतीय लेखिकाओ के लिए छिनाल शब्द का उपयोग किया था और यह भी कहा था कि इनके लेखन का शीर्षक तो कितने बिस्तरों पर कितनी बार होना चाहिए। एफआईआर में कहा गया है कि इस बयान से लेखिकाओं का अपमान हुआ है इसलिए धारा 499, 500, 501 ओैर 509 के तहत इनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। 
चार्जशीट पेश हो गई है और इसका जवाब वर्धा जिला न्यायालय के प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट धनंजय निकम ने विभूति राय को 20 सितंबर तक देने के लिए कहा है। इस मामले में नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया और इंटरव्यू लेने वाले राकेश मिश्रा भी अभियुक्त है। इस मामले की पहरवी शिकायत करने वालों में से एक खुद संजय नंदन करेंगे। विभूति नारायण राय अपने इस बयान के बाद जीवन की सबसे बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं। राष्ट्रपति का पुलिस मैडल पाने वाले विभूति राय पुलिस के खिलाफ भी लिखते रहे हैं और उनके ब्लॉग पर खुद उनका दावा है कि उनके पांच उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी है। हालांकि इनमें से कोई फिल्म किसी ने देखी नहीं है। 
विभूति नारायण राय ने पहले तो अपने बयान को उचित ठहराया मगर फिर जब चारो तरफ से गालिया पड़ने लगी तो मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने उन्हें बुला कर माफी मांगने के लिए कहा। राय ने लेखक के नाते नहीं लेकिन कुलपति के नाते माफी लिखित रूप से मांगी और बाद में मीडिया के सामने भी इसे दोहराया। यह मामला यही खत्म हो जाता मगर विभूति नारायण राय के चारणों की मंडली उन्हें बचाने के लिए गुमनाम हमले करने लगी तो मामला सीमा से बाहर चला गया। अब उनके खिलाफ एफआईआर को न्यायालय ने संज्ञान में लिया है तो सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राय अब बाकायदा अभियुक्त बन गए हैं। ऐसे में कुलपति बने रह पाएंगे इस पर भी संदेह हैं। 
विभूति नारायण राय का नाम विवादों में हमेशा रहा है मगर कानूनी विवाद में वे पहली बार फंसे हैं। अगर वर्धा में उनके खिलाफ मामला शुरू होता है तो उत्तर प्रदेश पुलिस में रिटायरमेंट के एक साल पहले ही उन्हें पद से हटाना पड़ेगा या उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी पड़ेगी। इसके अलावा भी विभूति नारायण राय पर अयोग्य शिक्षको की नियुक्ति, प्रचंड जातिवाद, आर्थिक घपले और गैर जरूरी विदेश यात्राओं के इल्जाम लगते रहे हैं और इनके सबूत भी दिए जाते रहे हैं। इसके बावजूद राय ने दोषी अधिकारियों और शिक्षकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। 
विभूति नारायण राय के उत्तराधिकारियों की तलाश शुरू हो गई है। जब उन्हें नियुक्त किया गया था तब यूपीए प्रथम का शासन काल था। वामपंथियों ने राय के वामपंथी होने के अभिनय पर विश्वास कर लिया था और उनके नाम की सिफारिश भी तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह और राष्ट्रपति से करवा ली थी। इसके बाद जब प्रतिभा पाटिल के परिवार में ही दोस्ती कर के अपनी नौकरी को पक्का मानने लगे थे। मगर अदालती इल्जाम के बाद यह मामला गंभीर रूप लेता नजर आ रहा है।
 
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