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हमारा लीडराबाद

 राजीव यादव 

उस दिन अभिषेक भाई का फोन आया कि राहुल जी द्वारा लायी गयी पांडुलिपियां चोरी हो गयीं। इतना सुनने के बाद मेरे मन में क्षोभ हुआ और दोषियों के रुप में खुद की शिनाख्त की। मैंने अभिषेक भाई से कहा कि मैं देखता हूं क्या कर सकता हूं। अभिषेक रंगकर्मी हैं और वे तत्तकाल उस हरिऔध कला भवन के सामने धरने पर बैठ गए जहां चोरी हुयी थी। 
हरिऔध कला भवन अयोध्या सिंह उपाध्याय के स्मृति में बना था। हमारी जानकारी में जिसको पृथ्वी राज कपूर ने डिजाइन किया था। 1957 में जब राहुल सांकृत्यायन कई देशों की यात्रा कर तिब्बत से आजमगढ़ आए थे तो उन्होंने इस कला भवन में अपने द्वारा लायी गयी पुरातत्व महत्व की चीजों को आने वाली नस्लों को समझने और सहेजने के लिए दे दिया था। बहरहाल मैंने अपने करीबी साथी मसीहुद्दीन, तारिक भाई समेत एक-एक करके सभी को फोन किया। 
इस घटना के बाद मेरे जेहन में जर्जर हो चुके हरिऔध कला भवन जिसका एक हिस्सा गिर गया है और पूरे के गिरने की प्रशासन बाट जोह रहा है, उसकी दीवारों पर दर्जनों छाया चित्रों के लटके हुए चीथडे़, कचहरी का लीडराबाद जिस पर हमरा लोकतंत्र सांसे ले रहा है एक-एक करके फ्लैश बैक की तरह गुजरने लगे। मैं याद करने लगा कि इन सबके बारे में मुझे कब मालूम चला। विस्मृतियों के पन्ने पलटने पर महसूस हुआ कि इनके प्रति मेरी प्रतिबद्वता शहर छोड़कर इलाहाबाद आने पर हुयी। यानी जब मुझे अपनी पहचान की आवश्यकता हुयी तब मेरे जेहन में यह बातें मजबूत तर्कों के रुप में स्थान बना पायीं। मेरे दिमाग में कई सवाल हैं कि कहीं हम जैसों के साथ कोई साजिश तो नहीं की जा रही है? यानी कहीं न कहीं उन चोरी हुयी वस्तुओं में ऐसा कुछ न कुछ था जिसको आने वाली नस्लें न देख पाएं इसकी मौन सहमति से कोशिश की जा रही थी। 
हर शहर की पहचान कुछ लोग और स्थानों से होती है। इसी तरह हमारे शहर का लीडराबाद और वहां पर तैय्यब आजमी। जब भी लीडराबाद जाइए वहां प्लास्टिक की बोरियों पर बैठे तैय्यब साहब ‘अकेले’ रेलवे विकास संघर्ष समिति के बैनर तले ‘सर्वदलीय धरना’ करते मिल जाएंगे। चाय की दुकान वाले राजेंद्र चाचा बतातें हैं तैय्यब साहब एक बार अपने गांव में चुनाव लड़े। सोचे थे कि हम इतनी ईमानदारी से काम करते हैं, तो जीत ही जाएंगे। पर उन्होंने अपने घर वालों के खिलाफ ही गांव में बनने वाले चकरोट को लेकर मोर्चा खोल दिया था। सो गांव वालों ने कहा कि जो आदमी अपने घर का नहीं हुआ वो हमारा क्या होगा। सो तैय्यब साहब बुरी तरह से चुनाव हार गए। कई बार पूछा कि धरने को कितने दिन हो गए तो कभी कहा 600 दिन तो कभी कहा 885 दिन और यह सवाल मैंने अंतिम बार उनसे तीस दिसंबर 08 को पूछा तो उन्होंने बताया 1060 दिन। इसके बाद मैंने उनसे कभी नहीं पूछा और आज भी धरना अनवरत जारी है। हर सफलता के समय वे सुसज्जित मंचों पर नही बल्कि हम लोगों या कहें भीड़ के हिस्से रहते हैं। 
ऐसे लोगों को हम लोग आम बोल-चाल की भाषा में ‘कैम्पेनर’ कहते हैं। तैय्यब साहब हमारे ‘वरिष्ठ कैम्पेनर’ हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन कैम्पेन में लगा दिया। सफेद कुर्ता-पैजामा, सर पर गांधी टोपी और हाथ में झोला। जिसमें एक प्लास्टिक की बोरी जिस पर वे बैठते हैं, कुछ मांग पत्र, पर्चे, और बैनर रहता है। इस झोले में कुछ गैस्टिक चूर्ण की शीशियां, माचिस की डिब्बियां और डाट पेन भी रहती हैं। जिसकी रोचक कहानी है। इसे मैंने उनके पर्चों के नीचे लिखे नोट से जाना। जिसमें लिखा होता है- ‘पचास रुपए में चार शीशी गैस्टिक चूर्ण के साथ एक माचिस, एक डाट पेन मुफ्त में प्राप्त करके दिल्ली जाने के लिए बैनर-पोस्टर हेतु रेलवे विकास संघर्ष समिति की मदद करें।’ पिछले दिनों मालूम चला कि तैय्यब साहब ने जनता की मांग पर रेलवे के साथ-साथ सड़क के लिए भी अभियान छेड़ दिया है। 
लीडराबाद यानी लीडरों से आबाद! के बारे में कभी-कभी सोचता हूं तो लगता है कि यह समय से काफी पीछे चल रहा है या यहां के लोग अतीतजीवी हैं। पर ऐसे विचारों का मेरे जेहन में आना स्वाभाविक न होकर आयातित ज्यादा महसूस होता है। क्योंकि इसी लीडराबाद में तेजबहादुर यादव, जय प्रकाश राय और इम्तियाज बेग और बहुत सारे वरिष्ठ लोगों से मुझे वो इतिहास जानने को मिला जिसका मेरी पीढ़ी के बहुत से लोगों को अता-पता नहीं है। मैंने कई बार लीडराबाद में यह भापने की कोशिश की कि कितने युवा उसके इर्द-गिर्द हो रही बहसों में शिरकत कर रहे हैं। काफी निराशा हुयी पूरी एक पीढ़ी का अंतराल। यहां की चाय कि दुकानें एक पूरे इतिहास की गवाही करती हैं। यहां समाजवादी नेता राजनारायन जी के भाषणों और उसके बाद हुयी हलचल के अनकों किस्से आसानी से सुने जा सकते हैं। लीडराबाद में हमारे अतीत के विस्मृत इतिहास से हमारे स्वर्णिम भविष्य का खाका खींचने का अद्भुत सामर्थ्य है। जिसमें दिन ब दिन हम कमजोर होते जा रहे हैं। 
लंबे समय से फोटो पत्रकारिता और रंगकर्म में मशगूल बंगाली दादा एसके दत्ता के फोटोग्राफ इसको समझने की एक समझ मुझमें विकसित करते हैं। दादा ने प्रकृति के छाया लोक में जड़ों में जीवन और मानवीय मूल्यों की संवेदनाओं को निहारने की कोशिश की है। जड़ चेतन होती है और पूरे पेड़ का अस्तित्व उसी पर टिका होता है। ठीक उसी तरह हमारा लीडराबाद और ‘हमारे वरिष्ठ कैम्पेनर’ जो लोकतंत्र की जड़े हैं।
 
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