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अमेरिका में नव सांप्रदायिकता

 मृणाल पाण्डे  

इक्कीसवीं सदी की हवा बीते इतिहास का कौन सा पन्ना खोलकर बैठ जाएगी और एक पुराने नाटक का नया मंचन शुरू कर देगी, यह कोई नहीं बता सकता।’ वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र माथुर की यह बात आज भी प्रासंगिक है। इस साल दुनिया में करोड़ों लोगों ने 11 सितंबर को ईद और गणोश चतुर्थी का पर्व और 9/11 की बरसी मनाने की तैयारी की तो बहुत सशंक मन से। 
डर था कि धुर कट्टरपंथी धर्मगुरुओं के बीच अमेरिका में पवित्र धार्मिक किताब और मस्जिद निर्माण को लेकर अचानक छिड़े विवाद के तूल पकड़ने से अमेरिका से अफगानिस्तान तक हजारों बेगुनाहों की जान पर न बन आए। 
ईश्वर ने फ्लोरिडा के सिरफिरे पादरी को सन्मति दी और अंत में उसने कुरान जलाने का अपना आह्वान वापस ले लिया। पर लगभग दो सदियों से दुनिया में सर्वधर्म समभाव, नस्ली भेदभाव के मुखर विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतीक रहा अमेरिका आर्थिक रूप से इतना असुरक्षित और कट्टरपंथिता से सहमा हुआ शायद ही कभी दिखा हो। 
अमेरिकी बाजारों के ढहने तथा इराक युद्ध की आग में अमेरिका के साथ खड़े होकर हाथ जला चुके करीबी दोस्त राष्ट्रों - फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन को शिकायत है कि उनकी चिंता करने की बजाय विदेश नीति में अमेरिका की प्राथमिकता एशिया बन चला है। 
इससे वे बहुत खुश नहीं हैं। उधर एशिया में भी दोस्ती के रंग गहरा नहीं रहे। अलकायदा व तालिबान की मौजूदगी को लेकर फटकारा गया पूर्व दुलारा पाकिस्तान अचानक ‘तू नहीं और सही’ की तर्ज पर कभी चीन और कभी रूस से बतियाने लगा है। 
ओस्लो वार्ता के विफल रहने के बाद भी उसकी पहल पर दोबारा जबरन वार्ता की मेज पर ला बिठाए गए इजरायल व फलस्तीन के नेता अमेरिकी हुक्म मानकर सुई की नोंक बराबर विवादित जमीन बांटने से भी कतरा रहे हैं और न्यूयॉर्क में 9/11 की घटनास्थली के पास मस्जिद बने या नहीं, इस सवाल पर तो इतनी तीखी प्रतिक्रिया हुई है कि फ्लोरिडा के कट्टरपंथी पादरी ने कुरान शरीफ की प्रतियां जलाने का घातक आग्रह कर (जिससे आसन्न कांग्रेशनल चुनावों में बेरोजगारी, इराकी विफलता, ओबामा के रंग तथा मुस्लिम कनेक्शन से कुढ़े अनेक मतदाताओं का मन बदलने का साफ अहसास है) इराक युद्ध के कलंक से विपक्षी रिपब्लिकनों को उबारकर विश्व को चौंका दिया है। 
अमेरिका की नीतियां आंतरिक सुरक्षा की चिंता तथा घरेलू दबावों के तहत अब आमूलचूल बदली जा रही हैं। पर उससे नए सिरदर्द उठ खड़े हुए हैं। कभी यूरोप से परे न झांकने वाले और ब्रिटेन को तो अपना ननिहाल समझने वाले अमेरिका की विदेशनीति से यूरोप नाखुश है। 
अमेरिकी राजनय की धुरी अब अफगानिस्तान, इराक, साना (यमन की राजधानी), यरुशलम तथा तेहरान के करीब आ गई है और इन देशों पर भारी-भरकम सैन्य हमले करने की बजाय वहां की सरकार की मदद से अल कायदा के सदस्यों को बीन-बीनकर धरपकड़ करने का रास्ता अपनाया जा रहा है। 
लेकिन मदद के बदले में अरबों डॉलर वसूल रही इन देशों की सत्तारूढ़ सरकारें नितांत भ्रष्ट हैं और भीतरखाने उग्रवादियों की नाराजगी नहीं झेलना चाहतीं। इसी वजह से प. पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान में अमेरिका बुरी तरह फंसा हुआ है। यह इलाका एशिया की एक ऐसी चूहेदानी रहा है, जिसमें उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड और बीसवीं में रूस जैसे महादेश भी फंसकर बरसों छटपटाए हैं। वजह यह कि इस सुदूर क्षेत्र के युद्ध की सच्चाई स्थानीय कैनवास पर अलग दिखती है और बड़े अंतरराष्ट्रीय कैनवास पर अलग। 
छोटे कैनवास पर अफगानिस्तान में रूस या अमेरिका सरीखे महादेश की सेनाएं देखकर लगता है कि मानो एक मासूम खरहे को एक भेड़िए ने दबोच लिया हो और दुनिया उस भेड़िए की रक्त पिपासा पर छी-छी कर उठती है। लेकिन वृहत्तर कैनवास की सच्चाई यह है कि खरगोश तो शायद कहीं घास में जा दुबका होगा और कई कोणों वाली असली लड़ाई इलाके में बाहर से आए अनेक भेड़ियों के बीच इलाकाई वर्चस्व की है। 
जिन लड़ाइयों को स्थानीय चित्र एक लघु देश की अस्मिता बचाने का पवित्र संग्राम बताता है, वे सभी विश्व संदर्भो में कभी मुगलों व नादिरशाह, कभी रूस तथा अमेरिका, कभी अमेरिका तथा चीन और कभी भारत और पाकिस्तान के बीच की वर्चस्व की लड़ाई का ही सहज विस्तार हैं। इन्हीं से आने वाले वक्त में तय होता है कि एशिया में किस महादेश का कितना वर्चस्व इस भूभाग के बाजारों, कुदरती संसाधनों और तिजारती मार्गो पर होगा? अमेरिकी नेतृत्व यही सच्चाई देख रहा है। 
पर दिक्कत यह है कि अमेरिकी नेतृत्व के युद्ध दर्शन पर घरेलू जनता की पक्की आस्था नहीं है। जब थी तो वियतनाम के गलग्रह से ‘पीस विद ऑनर’ का नारा देकर जान छुड़ा ली गई थी, लेकिन अभी तो लंबे इराक युद्ध से जख्मी ओबामा सरकार लगातार कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। 
बेरोजगारी की दर वहां 10 फीसदी से ऊपर जा रही है, बाजार डगमग हैं और युद्ध क्षेत्र में अपने हजारों साथियों को खोकर खाली हाथ वापस आए हजारों सैनिकों का गुस्सा अमेरिका में सुलग रही नव सांप्रदायिकता की खतरनाक आग में घी का काम कर रहा है। 
इराक युद्ध के बाद जिस नई दुनिया का उदय हो रहा है, उसमें पिछली सदी के संपन्न गोरे मूल के लोग आज विश्व युद्ध के बाद पहली बार आर्थिक मंदी झेल रहे हैं और उनकी आबादी की औसत आयु भी 50 के पार हो चली है। 
आव्रजन या बुर्के पर रोक लगाने और भारत को आउट सोर्सिग रोकने के बावजूद वे यह देख रहे हैं कि चीन या भारत सरीखे जिन महादेशों पर कभी उनका शासन था, वे अब तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। कई विकासशील एशियाई अफ्रीकी देश, जिनको उन्होंने अपने भले दिनों में भारी इमदाद दी थी, चीनियों की तरफ झुक रहे हैं या इस्लामी कट्टरपंथी गुटों के चंगुल में हैं जो उन पर घातक हमले कर रहे हैं। उनके भ्रष्ट नेतृत्व ने अमेरिकी पैसे से सिर्फ गुलर्छे उड़ाए और प्रगति की कोई स्थाई नींव नहीं रखी। वहां जनता आज भी गरीब और असंतुष्ट है और नेता गद्दी बचाने को कट्टरपंथी धड़ों को पैसा खिला रहे हैं। 
बहरहाल अब आर्थिक नाकेबंदी या मोटी इमदाद द्वारा इतिहास का चक्का रोकना मुमकिन नहीं। आज के एशिया और पहले के पश्चिमी धड़े की हालत में बड़ा फर्क है। पहले वे विश्व का रंगमंच भी थे और इस पर हो रहे हर नाटक के सूत्रधार भी। नाटकों की पटकथा वहीं तैयार होती थी, प्रमुख रोल वहीं बंटते थे और वहीं की समीक्षा मान्य होती थी। 
एशिया बस नेपथ्य से फूल फेंकता जयकार करता था। आज एशिया नई शैली की स्क्रिप्ट लिए विंग्स से बाहर आ गया है और नई कास्ट के साथ नए नाटक खेले जाने की मांग कर रहा है। एशिया का जो हिस्सा बाहर नहीं भी आया है, वह भी निडरता से अंडे-टमाटर (या जूते) फेंककर अपनी राय जताने में संकोच नहीं कर रहा। युद्ध या युद्ध विराम की चाभी अब ओबामा के पास नहीं रह गई, वह एशिया के पास है। 
 लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।
 
 
 
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