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विदर्भ के रास्ते पर छत्तीसगढ़

 राजकुमार सोनी 

रायपुर सितंबर  । सब कुछ पत्रकारिता के फटीचर समय को दर्शाने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ के समान है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि पीपली लाइव का नायक नत्था जहां अपनी पुश्तैनी जमीन को बचाने के चक्कर में मुआवजा पाने के लिए मरने को तत्पर दिखता है तो छत्तीसगढ़ की  नई राजधानी के नत्था (किसान) मुआवजा हासिल कर लेने के बाद उपजी विसंगतियों के चलते ‘आत्मघाती कदम’ उठा लेने की शपथ लेने को मजबूर नजर आते हैं। भले ही खेती-किसानी में आंकड़ों की बाजीगरी करने वाले सरकारी नुमांइदे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि यहां का किसान मौत को गले लगाने के बारे में विचार कर रहा है। लेकिन यह एक बड़ी सच्चाई है। खेती-बाड़ी से महरूम होने वाले ‘नई राजधानी के नत्थाओं’ ने अपने भीतर आत्महत्या के खतरनाक बीज का रोपण शुरू कर दिया है।
नई राजधानी पहुंचने के लिए आपको वह टेम्पो भी नहीं मिलेगी जो पीपली लाइव में दिखाई गई थी। यहां पहुंचने के लिए आपको ‘कार-मोटर-सायकिल’ या दूसरे माध्यमों का उपयोग करना पड़ेगा। यदि आप उड़नखटोले के मालिक है तो रायपुर से ब-मुश्किल दस मिनट में आपकी यात्रा पूरी हो सकती है, अन्यथा किसी भी अन्य माध्यम से पहुंचने में एक घंटा जाया करना पड़ सकता है। हालांकि पुरानी राजधानी से नई राजधानी में पहुंच को सुगम बनाने का दावा वर्ष 2002 से किया जा रहा है क्योंकि इसी साल आवास एवं पर्यावरण विभाग ने नई राजधानी के निर्माण के लिए अधिसूचना जारी की थी। ग्राम पलौद में इंटरनेशनल स्टेडियम आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा। स्टेडियम को देखकर आपको लगेगा- भई वाह जब स्टेडियम इतना शानदार है तो नई राजधानी खूबसूरत होगी ही लेकिन जैसे-जैसे उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर आप गांव पहुंचते जाएंगे, वैसे-वैसे आपको ‘पीपली लाइव’ का सच नजर आने लगेगा। कहीं आपको खड़खड़ करती हुई जीप नजर आएगी तो कही कोई धनिया कंडे थापते मिलेगी। देसी भभके के बीच बीड़ी सुलगाते हुए सैकड़ों नत्था भी आपको मिल ही जाएंगे।
मैं कोटराभाठा में एक किसान जयराम यादव के घर के सामने खड़ा हूं। जयराम जैसे-तैसे चर्चा करने को तैयार हुआ। बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसके पास कुल पांच एकड़ खेती की जमीन थी। दबाव के चलते उसने अपनी जमीन एनआरडीए (न्यू रायपुर डेव्लपमेंट अथॉरिटी) को सौंप तो दी लेकिन अब वह पछता रहा है। जयराम को मुआवजे में कुल 28 लाख रुपए मिले थे। पांच एकड़ जमीन का मालिक जब जमीन खरीदने के लिए अपने इलाके से बाहर निकला तो उसे बैरंग लौटना पड़ा क्योंकि गांव से सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर भीतर-बाहर के दायरे में कोई भी उसे 15 लाख रुपए एकड़ में जमीन देने को तैयार नहीं हुआ। मंदिर हसौद में जमीन की कीमत एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ हो चुकी थी तो नई राजधानी से कुछ दूरी पर स्थित ग्राम लखौली में जमीन 75 लाख एकड़ में बिक रही थी। यही हाल ग्राम गनौद और धमनी का भी था। जमीन से महरूम हो जाने के बाद बैलगाड़ी पर चलने वाले जयराम ने अपने बच्चों के लिए हीरो होंडा व स्कूटी खरीद ली। मिट्टी के घर को पक्का बना लिया। मुआवजे का पैसा कब खत्म हो गया उसे पता नहीं चला। अब वह खुद मानता है कि उसके सामने भूखों मरने की नौबत आन खड़ी हुई है। कुछ ऐसी ही स्थिति कोटराभाठा के एक दूसरे किसान गंगाराम की भी है। गंगाराम ने मुआवजे में मिली रकम से राजिम पोखरा में खेती के लिए जमीन तो खरीद ली है लेकिन वहां उसका अपना घर नहीं है। एक बड़े परिवार का मुखिया होने के कारण वह भी मुआवजे का सही उपयोग नहीं कर पाया। गंगाराम की स्थिति भी दयनीय हो चली है। निरन्तर खराब हो रही आर्थिक स्थिति से परेशान गंगाराम ने कहा कि वह कभी भी आत्मघाती कदम उठा सकता है।
किसान संघर्ष समिति के बैनर तले नई राजधानी का विरोध करने वाले सरजूदास मानिकपुरी के पास मात्र 2 एकड़ जमीन थी। इसमें से कुछ जमीन एनआरडीए अधिगृहीत कर चुका है। सरजू का मानना है कि सरकार ने सोची-समझी योजना के तहत किसानों से पांच-छह लाख रुपए प्रति एकड़ में जमीनों की खरीदी की है। उन्होंने कहा कि किसानों से सस्ते दर पर जमीन खरीद कर सरकार अब उसी जमीन को मंहगे दर पर बेच रही है। सरकार की इस कार्रवाई से लगता है कि वह ‘व्यवसाय’ करने पर आमादा है।
सरजू गांव-गांव में अवैध ढंग से बेची जा रही शराब को भी षड़यंत्र का एक हिस्सा मानते हैं। उन्होंने बताया कि किसान मुआवजे में मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा शराब में खर्च कर रहे हैं। किसान भूख-गरीबी और मुफलिसी से जब मरेगा तब मरेगा, अभी तो हालात यह है कि वह पी-पीकर ही दम तोड़ रहा है। सरजू ने बताया कि गत दो सालों में 26 गांवों के 20 से ज्यादा किसान शराब पीकर मौत के घाट उतर चुके हैं। कुछ दिनों पूर्व बहरूराम के लड़के चोवा की मौत भी शराब सेवन के बाद एक दुर्घटना में हुई थी। नवागांव के एक किसान डेरहाराम ने बताया कि उनके गांव के किसान सरकार को जमीन देने के पक्ष में नहीं थे लेकिन एनआरडीए से जुड़े लोगों ने ऐसा दबाव बनाया कि किसानों को जमीन देनी ही पड़ी। शादी-ब्याह तथा अन्य कारणों से कर्ज में दबे किसानों को लगा कि यदि   मुआवजा मिलेगा तो राहत मिल जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। मुआवजे की रकम खत्म हो गई है और अब किसानों के सामने कटोरा लेकर भीख मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। इसी गांव के एक नेत्रहीन किसान बलराम यादव की जमीन भी नई राजधानी के निर्माण की भेंट चढ़ चुकी है। बलराम की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है। जबकि रेवाराम सिन्हा को जमीन के चले जाने से ज्यादा भाई से अलग हो जाने का दुख है। रेवाराम ने बताया कि पहले वह अपने भाई देवनाथ के साथ ही रहता था लेकिन मुआवजे की रकम मिल जाने के बाद भाई को हसदा में जमीन लेनी पड़ी तो उसे राजिम के पास पांडुका में किसी तरह जमीन मिल पाई। इलाके के दुर्गापाल, कार्तिकराम, श्रवण कुमार, भगतराम, मेहतरू यादव सहित कई किसान ऐसे हैं जो मानते हैं कि नई राजधानी में स्थिति विस्फोटक है। किसानों का कहना है कि भले ही उनकी लाशों पर सरकार मंत्रालय व अन्य भवनों का निर्माण कर लेगी लेकिन उनकी रूहें वहीं-कहीं मंडराती मिलेगी। यह रूहें एक न एक दिन उन सबसे हिसाब मांगेंगीं जो मामूली से फायदे के लिए साजिशों को प्रश्रय देते रहे हैं।
मुआवजा दिया गया 
एनआरडीए के महाप्रबंधक महादेव कांवरे ने बताया कि मुआवजे का निर्धारण सबकी सहमति से किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि किसी भी ग्रामीण को कम मुआवजा दिया गया है। मुआवजे की रकम का किस किसान ने क्या उपयोग किया यह  तो वे ही ठीक तरीके से बता सकते हैं।
किसान निशाने पर 
छत्तीसगढ़ एग्रीकान के प्रदेश अध्यक्ष संकेत ठाकुर ने बताया कि  प्रदेश के हर कोने से किसानों द्वारा आत्महत्या कर लेने की खबरें आ रही हैं। कुछ समय पहले हमने जब सूचना के अधिकार के तहत थानों से जानकारी मांगी थी तब चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए थे। कर्नाटक, आंध्र और महाराष्ट के बाद छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक किसान मौत को गले लगा रहे हैं। जब हम लोग इस बारे में तथ्यात्मक ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास करते है तो कह दिया जाता है कि हमारा नजरिया अलग हैं।
आत्महत्या की बात गलत 
छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू किसानों  द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर को असत्य बताते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ का सामाजिक ताना-बाना ऐसा नहीं है कि किसी को आत्मघाती कदम उठाने की जरूरत पड़े। उन्होंने कहा कि जो  लोग किसानों के द्वारा आत्महत्या कर लेने की बात प्रचारित करते हैं वे भी अब तक किसी तरह का प्रमाण नहीं दे पाए हैं। प्रदेश में कृषि विभाग द्वारा संचालित योजनाओं से किसानों की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। नई राजधानी के किसान भी खुशहाल जीवन जी रहे हैं। जबकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा का कहना है कि नई राजधानी के किसानों को सही ढंग से न्याय नहीं मिल पाया है। उनकी जमीनें बेहद सस्ते दर पर खरीदी गई और बाद में उसे मंहगे दर पर बेचने का काम किया गया। यहां का किसान जहर खाकर मर जाने की बात कहता है। सरकार को चाहिए कि वह किसानों के वक्तव्य को समय रहते गंभीरता से लें।
मामला लोक आयोग में
अपने गठन के प्रारंभिक दिनों से ही एनआरडीए विवादों में घिरा रहा है। वैसे जब जोगी शासनकाल में नई राजधानी बनाने की बात सामने आई थी तब विपक्ष ने पौता और चेरिया जैसे गांवों के चयन को गलत ठहराया था। विपक्ष का यह आरोप था कि सरकार भू-माफियाओं को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है। विपक्ष का यह आरोप सही साबित भी हुआ क्योंकि उन दिनों जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों ने किसानों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदने का खेल प्रारंभ कर दिया था। जब भाजपा सत्ता में आई तो उसने नई राजधानी के स्थल में परिवर्तन कर दिया। कुछ समय पहले मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने एनआरडीए में व्याप्त अनियमितताओं को लेकर लोक आयोग में शिकायत की है। कांग्रेस के एक प्रमुख पदाधिकारी राजेश बिस्सा का आरोप है कि नारडा ने दिल्ली की एक कंपनी आईएलएंडएफएस से मिलकर एक नई कंपनी बनाने का खेल भी रचा था। बिस्सा का यह भी आरोप है कि नारडा दक्षिण भारत के एक ठेकेदार बी सिनैय्या से लगभग तीन सौ करोड़ की सड़कों का निर्माण करवा रहा है। यह सड़कें गुणवत्ताविहीन हैं। श्री बिस्सा ने सड़कों की गुणवत्ता के संबंध में सूचना के अधिकार के तहत सेम्पल की मांग भी की है। इधर नई राजधानी में जिस मंद गति से निर्माण कार्य चल रहा है उसे देखते हुए यह लगता नहीं है कि पुरानी राजधानी  आने वाले पांच सालो में वहां शिफ्ट की जा सकती है। छेरीखेड़ी में जिस फ्लाईओवर को ढाई साल पहले बन जाना था वह अब तक नहीं बन पाया।
भटक रहे किसान
भू-अर्जन और मुआवजे से संबंधित कामकाज के निपटारे के लिए एनआरडीए ने पहले पुराने आरटीओ के पीछे एक कार्यालय खोला था। अब यह दफ्तर न्यू राजेंद्र नगर के एक काम्पलेक्स में शिफ्ट हो गया है। इस दफ्तर में अब भी किसानों को भटकते हुए देखा जा सकता है। कामकाज को देखने के लिए पदस्थ किए गए एक तहसीलदार  के काम काज को लेकर भी ग्रामीणो में आक्रोश देखा गया।
 
 
 
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