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मेरी जाति क्या है
एमजे अकबर 
 यदि कोई मुझसे पूछे कि मेरी जाति क्या है, तो मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं होगा? मेरी राष्ट्रीयता है भारतीय। मेरी धार्मिक आस्था है इस्लाम। मेरा जन्मस्थान है बंगाल। मेरी एक सांस्कृतिक पहचान है। मेरे पिता बिहारी थे, जो बंगाल में आकर बस गए थे। 
मेरी मां कश्मीरी थीं, जिनकी परवरिश अमृतसर में हुई और मैं हरियाणा में रहता हूं। मेरी सांस्कृतिक पहचान क्या है, इसका जवाब थोड़ा मुश्किल जरूर हो सकता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं है। लेकिन जाति? मेरी कोई जाति नहीं है।
क्या डॉ मनमोहन सिंह और श्रीमती सोनिया गांधी के राज में ‘पहचान’ हासिल करने के लिए मुझे अपने लिए किसी जाति की जुगाड़ कर लेनी चाहिए? मैंने जानबूझकर इन दोनों के नाम लिए हैं, क्योंकि जहां तक मेरी जानकारी है, उनकी भी कोई जाति नहीं है। 
जब जनगणना अमले का कोई कर्मचारी हाथ में खाली फॉर्म लिए प्रधानमंत्री के दरवाजे पर दस्तक देगा, तब वे उसे अपनी क्या जाति बताएंगे : जाट या सिख या कुछ और? क्या सोनिया गांधी जनगणना करने वालों को यह बताएंगी कि वे ब्राrाण-ईसाई हैं, क्योंकि उन्होंने जिस व्यक्ति से विवाह किया, उनकी मां कश्मीरी पंडित थीं और पिता पारसी?
हमारा सामाजिक ढांचा पहले ही कई स्तरों पर विभाजित है।
फिर आखिर ऐसी कौन-सी जरूरत आन पड़ी कि एक और श्रेणी की गिनती करने के लिए यह खर्चीला और थकाने वाला उपक्रम किया जा रहा है? हमारी मौजूदा जनगणना के जरिए हम आंशिक रूप से यह जान सकते हैं कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में कितने फीसदी दलित, ब्राrाण, यादव और मुस्लिम हैं। आखिर इसी आधार पर तो हमारे राजनेता जातिगत समीकरण तय करते हैं और अपने उम्मीदवारों का चयन करते हैं। 
सरकार को ये आंकड़े पता होते हैं और वह उन्हें प्रकाशित भी करती है ताकि नागरिक उन्हें पढ़ें और नौकरियों में आरक्षण की मांग करें। क्या हम अब यह भी जानना चाहते हैं कि देश में फलां-फलां उपजाति या गोत्र के कितने फीसदी लोग हैं ताकि नौकरियों के लिए होने वाली जूतमपैजार और जोर पकड़े?
हमारी राजनीति की स्थिति कुछ ऐसी है कि इसमें आमतौर पर आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए ही अहम निर्णय लिए जाते हैं। जिन कैबिनेट मंत्रियों ने जातिगत आरक्षण पर आपत्ति उठाई थी, उन्हें चेता दिया गया कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो कांग्रेस बिहार और उत्तरप्रदेश में महत्वपूर्ण वोट गंवा देगी। जबकि सच्चाई यह है कि जब कोई पार्टी सतही लाभों के लिए अपने बुनियादी उसूलों को कुर्बान करने को तैयार हो जाती है, तभी वह अपने राजनीतिक मानकों को जोखिम में डाल देती है।
एक ऐसे जटिल सामाजिक ढांचे में, जहां आर्थिक विसंगतियां बढ़ रही हों और व्यक्ति की बुनियादी पहचान को झुठलाया जा रहा हो, जाति को लोकतांत्रिक मूल्य के रूप में स्वीकार लिया जाना आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसी समस्याओं को तंत्र से बेदखल करने की जरूरत है, लेकिन होता यह है कि नेतागण यह जताने लगते हैं मानो कोई समस्या ही न हो। 
यदि आंबेडकर की पहल पर स्वतंत्रता प्राप्ति से भी पहले दलित आंदोलन की शुरुआत न हुई होती और उन्होंने महात्मा गांधी से आरक्षण का वादा नहीं लिया होता तो भी देर-सबेर वंचितों-पीड़ितों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिए आगे आना ही पड़ता।
आर्थिक तरक्की और सामाजिक आकांक्षाओं में हमेशा एक फासला रहेगा, खास तौर पर तब जब विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक समानता से पहुंचाना संभव न हो। मार्क्‍सवाद यह करने में विफल रहा और पूंजीवाद तो खैर यह करने से रहा। 
लोकतंत्र एकमात्र ऐसी पद्धति है जो सामाजिक न्याय की दिशा में काम कर सकती है। मजदूरों को उनकी मेहनत का उचित मेहनताना और रोजगार के लाभकारी अवसरों का विस्तार लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों में शामिल है। लेकिन हमारे देश में आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण की धारणा जाति के इर्द-गिर्द ही घूमती है। इसीलिए भारत के आर्थिक इतिहास में मंडल रिपोर्ट एक अनिवार्य अध्याय है।
मंडल आरक्षण के दो दशक बाद अब इस बात की फिक्र की जा रही है कि इस ‘अध्याय’ को एक पूरी किताब की शक्ल कैसे दी जाए। जो अल्पसंख्यक वर्ग जाति को स्वीकार नहीं करते हैं, उनके लिए हमारे तंत्र ने कुछ अनूठे कदम उठाए हैं। मिसाल के तौर पर मुस्लिमों को उनकी इस्लाम पूर्व पहचान यानी धर्मातरण के पूर्व उनकी जाति के आधार पर निर्दिष्ट किया जा रहा है। 
चूंकि नौकरियां और शैक्षिक सीटों में आरक्षण मिल रहा है, इसलिए कई मुस्लिमों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। बहरहाल, समझौता कभी भी उपयुक्त समाधान नहीं हो सकता। जातिगत आरक्षण एक असंगत व्यवस्था है। जाति अब एक ऐसी गाड़ी बन चुकी है, जिसमें कोई रिवर्स गियर नहीं है और आगे कोई यू-टर्न भी नजर नहीं आता।
 लेखक द संडे गार्जियन के संपादक हैं।
 
 
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