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नक्सली आतंक के बीच त्रिकोणीय मुकाबला

 संदीप पुराणिक

जगदलपुर, मार्च। बस्तर लोकसभा क्षेत्र मध्यभारत का वह क्षेत्र है जो विकास के लिए आजादी के छह दशक बाद भी तरस रहा है। बस्तर का 60 प्रतिशत हिस्सा अतिसंवेदनशील है जहां नक्सली समानांतर सरकार चला रहे हैं। सरकार के विकास कार्य लगभग बंद होने से ग्रामीणों तक सरकार की योजनाएं नहीं पहुंच रही है। बस्तर संसदीय क्षेत्र के बीजापुर, कोंटा, नारायणपुर, दंतेवाड़ा तहसील नक्सली आतंक से प्रभावित है। वहीं कोंडागांव तहसील का 60 प्रतिशत व जगदलपुर तहसील के 40 प्रतिशत हिस्से में नक्सली गतिविधियां अपना पैर पसार चुकी है। जिससे चुनाव प्रचार करने में कांग्रेस व भाजपा कार्यकताओं को आसानी नहीं होने वाली है। क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं को दिल्ली तक पहुंचाने वाला प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के कारण व घटते वनोपज और बढ़ते नक्सलवाद के चलते यहां के लोग और गरीब होते जा रहे हैं। बस्तर के 30 हजार वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में कोई भी उद्योग नहीं है। यहां भाजपा, कांग्रेस व कम्यूनिस्ट पार्टी के प्रत्याशियों के बीच त्रिकोणीय संघर्ष के आसार हैं। बस्तर संसदीय सीट से अब तक पांच बार निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत का सेहरा बांधा है। इतनी ही बार कांग्रेस, एक बार भालोद ने जीत का परचम लहराया है। तीन बार लगातार भाजपा के बलिराम कश्यप ने यहां कमल खिलाया है। चौथी बार पुन: भाजपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा है।
बस्तर संभाग में विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां अभूतपूर्व सफलता मिली। बस्तर संसदीय क्षेत्र के 8 में से 7 विधानसभा सीटों में भाजपा को जीत हासिल हुई। एकमात्र कोंटा सीट भाजपा करीब डेढ़ सौ वोटों के अंतर से हार गई। बस्तर में कांग्रेस की दुर्गति का आलम यह रहा कि बस्तर टाइगर कहे जाने वाले नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा तीसरे स्थान पर रहे। इस बार बस्तर संसदीय क्षेत्र की तस्वीर काफी बदल गई है। इस क्षेत्र के दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंटा, नारायणपुर क्षेत्र पूरी तरह नक्सलवाद की चपेट में है। यहां हजारों लोग राहत शिविर में रह रहे हैं। नक्सलियों के खिलाफ यहां सलवा जुड़ूम आंदोलन भी चल रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी काफी प्रतिक्रिया हुई है। इस आंदोलन के बाद नक्सली गतिविधियां तेज हुई है। हिंसा की काफी घटनाएं हुई है। शायद ही ऐसा कोई दिन रहता है जब नक्सली कोई वारदात न करते हों। सलवा जुड़ूम आंदोलन को लेकर जमकर राजनीति भी हो रही है। भाजपा का इस आंदोलन को खुला समर्थन है। जबकि कांग्रेस नेता इसको लेकर बंटे हुए हैं। पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा आंदोलन की अगुवाई करने वालों में हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी इसके मुखर विरोधी हैं।
यह लोकसभा सीट 1952 में अस्तित्व में आई। 1971 तक इस सीट पर निर्दलियों का कब्जा रहा। सिर्फ 1957 में कांग्रेस प्रत्याशी को जीत हासिल हुई। मनकूराम सोढ़ी यहां से सर्वाधिक चार बार सांसद रहे। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद लोकसभा चुनाव में फिलहाल कांग्रेस यहां कोई बड़ी चुनौती खड़ी करने की स्थिति में नजर नहीं आ रही है। लगातार चौथी बार भाजपा ने बुजुर्ग आदिवासी नेता बलिराम कश्यप पर भरोसा कर उन्हें मैदान में उतारा है। कश्यप की अगुवाई में बस्तर में पिछले तीन चुनावों में जीत का अटूट सिलसिला बनाए रखने में सफल भाजपा हर चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले जीत का औसत अंतर बढ़ाने में भी कामयाब रही है। 1998 में कांग्रेस के मनकूराम सोढ़ी को 4.71 प्रतिशत मतों के अंतर से हराकर इस संसदीय सीट से पहली बार पार्टी की जीत का खाता खोलने वाले कश्यप ने 1999 में कांग्रेस के पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा को 5.81 प्रतिशत मतों से पराजित किया था। कांग्रेस ने वर्ष 2004 में कर्मा को फिर मौका दिया तो जीत का यह अंतर बढ़कर 12.06 प्रतिशत हो गया। शायद इसी से सबक लेते हुए कांग्रेस ने नए उम्मीदवार बस्तर के तीन बार सांसद रहे मनकूराम सोढ़ी के पुत्र व प्रदेश के पूर्व खेलमंत्री शंकर सोढ़ी को टिकट दी है। भाजपा प्रत्याशी बलिराम कश्यप बीमारी के कारण अशक्त नजर आ रहे हैं। बावजूद इसके उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। बलिराम कश्यप  से गांव-गांव के आदिवासी परिचित हैं। कश्यप के प्रति लोगों के मन में आदर का भाव है। उन्होंने बस्तर के विकास के लिए टाटा संयंत्र की स्थापना का पुरजोर समर्थन किया है। वे इसके लिए बाकायदा अभियान चलाकर बेरोजगार और व्यवसायियों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे।
बस्तर संसदीय क्षेत्र में विकास के नाम पर सरकार द्वारा विकास के लिए लगने वाले टाटा जैसे संयंत्र का विरोध करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाया है लेकिन चुनाव में माकपा को कितना जनसमर्थन मिलेगा देखना है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पूर्व विधायक मनीष कुंजाम को यहां से चुनाव मैदान में उतारा है। सलवा जुड़ूम और टाटा संयंत्र का विरोध कर कुंजाम ने प्रभावित आदिवासियों को अपने साथ जोड़े रखने में सफलता पाई है। उनकी रैली में हजारों की भीड़ उमड़ी थी। उनका दंतेवाड़ा जिला में अच्छा खासा प्रभाव है और वे यहां त्रिकोणीय स्थिति पैदा करने की स्थिति में है।
बस्तर में रेल की मांग दशकों से की जाती रही। अब तक किसी सांसद द्वारा लोकसभा में इस मांग को लेकर कोई मुहिम नहीं चलाए जाने से परंपरागत व्यवसायी मतदाता नाराज हैं। लेकिन इससे चुनावी परिणाम प्रभावित होने का खतरा नजर नहीं आता। पांचवी बार भाग्य आजमा रहे कुंजाम
संसदीय क्षेत्र के चुनावी दंगल में 1984 से हाथ-पांव मार रहे कम्युनिस्ट की ओर से सीपीआई ने मौजूदा चुनाव में फिर मनीष कुंजाम को अपना झंडा थमाया है। कुंजाम इसके पूर्व 1996 से 99 तक लगातार तीन चुनावों में जोर आजमाइश कर चुके हैं। पहली बार 59,908 (15.49 फीसदी) मत पाकर वे चौथे स्थान पर थे। वर्ष 1998 में दूसरी बार उन्हें 15.77 प्रतिशत वोट मिले और तीसरे नंबर पर रहे। 1999 में भी उन्होंने अपना यही स्थान बनाए रखा। उन्हे 58906 मत मिले थे जो कि कुल मतदान का 16.52 फीसदी रहा। वर्ष 2004 में सीपीआई की ओर से नए प्रत्याशी रामनाथ सारफे को मौका दिया गया मगर वे मात्र 30608 यानी 6.4 प्रतिशत वोट ही पा सके। दरअसल, चुनाव में सीपीआई (एमएल) ने भी अपना उम्मीदवार अड़ा दिया था। पार्टी प्रत्याशी शिवराम को 5015 (1.1) प्रतिशत मिले थे। जाहिर है आपसी रस्साकशी के चलते कम्युनिस्टों के पुराने रिकार्ड में गिरावट दर्ज क गई। वैसे साफरे 1991 में भी सीपीआई की टिकट पर खड़े हुए थे और करीब 16 प्रतिशत वोट पाकर तीसरे स्थान पर थे।
कांग्रेस को 74 हजार की चुनौती
बस्तर संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले कुल आठ में सात विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को सिर्फ एक कोंटा से 192 मतों की मामूली बढ़त मिली थी। दूसरी ओर भाजपा क्रमश: कोंडागांव से 2771, नारायणपुर से 21635, बस्तर से 1201, जगदलपुर से 17524, चित्रकोट से 9231, दंतेवाड़ा से 12008 और बीजापुर से 10521 मतों के अंतर से आगे रही थी। जाहिर है कि कांग्रेस को लोकसभा चुनाव जीतने के लिए इन कुल 74891 मतों के अंतर को पार करना होगा। यह निश्चय ही एक बड़ी चुनौती है और यह देखना दिलचस्प होगा कि नतीजा क्या निकलता है।
मतदान के आंकड़े
क्र. वर्ष उम्मीदवारों की संख्या मतदाताओं की संख्या मतदान का प्रतिशत
1. 1951 02 3,84,277 55.65
2. 1957 02 3,70,085 49.35
3. 1962 04 4,21,440 51.93
4. 1967 08 4,27,235 50.27
5. 1971 10 4,79,049 48.41
6. 1977 04 4,95,505 42.90
7. 1980 06 5,05,816 37.21
8. 1984 06 5,90,530 40.45
9. 1989 07 7,51,296 34.80
10. 1991 07 7,60,905 27.21
11. 1996 07 9,23,408 45.76
12. 1998 05 9,31,368 41.33
13. 1999 06 9,54,405 39.35
14. 2004 08 10,39,442 43.33
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बस्तर लोकसभा क्षेत्र के चुनावी नतीजे (वर्ष 1951 से 2004 तक)
1. मुचाकी कोसा निर्दलीय 177588 83.05 सुरती क्रिस्टैया कांग्रेस 36257 16.95
2. सुरती क्रिस्टैया कांग्रेस 140961 77.18 बोड़ा दादा निर्दलीय 41684 22.82
3. लखमू भवानी निर्दलीय 87557 46.66 बोड़ा दादा निर्दलीय 61348 32.69
4. जे. सुंदरलाल निर्दलीय 53798 27.85 आर. झाड़ू जनसंघ 36531 18.91
5. लंबोदर बलियार निर्दलीय 42207 21.08 पीलूराम निर्दलीय 34713 17.34
6. दृगपाल शाह भालोद 101007 52.47 लंबोदर बलियार कांग्रेस 50953 26.98
7. लक्ष्मण कर्मा कांग्रेस 62014 35.66 समारुराम जपा 46964 27.00
8. मनकूराम सोढ़ी कांग्रेस 118729 54.66 महेंद्र कर्मा सीपीआई 42419 19.53
9. मनकूराम सोढ़ी कांग्रेस 101131 41.87 संपतसिंह भंडारी भाजपा 64905 26.87
10. मनकूराम सोढ़ी कांग्रेस 87993 44.87 राजाराम तोड़ेम भाजपा 70973 36.19
11. महेंद्र कर्मा निर्दलीय 124322 32.15 मनकूराम सोढ़ी कांग्रेस 110265 28.51
12. बलिराम कश्यप भाजपा 151489 42.27 मनकूराम सोढ़ी कांग्रेस 134603 37.56
13. बलिराम कश्यप भाजपा 155421 43.58 महेंद्र कर्मा कांग्रेस 134684 37.77
14. बलिराम कश्यप भाजपा 212893 47.26 महेंद्र कर्मा कांग्रेस 158520 35.19
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बस्तर लोकसभा (अजजा)
मतदाताओं की संख्या
11,85,377
मतदान केंद्रों की संख्या
1716
विधानसभा क्षेत्रों की संख्या
08
विधानसभा क्षेत्रों में काबिज पार्टियां
1. कोंडागांव भाजपा लता उसेंडी 2771
2. नारायणपुर भाजपा केदार कश्यप 21635
3. बस्तर भाजपा डॉ. सुभाऊ कश्यप 1201
4. जगदलपुर भाजपा संतोष बाफना 17524
5. चित्रकोट भाजपा बैदूराम कश्यप 9231
6. दंतेवाड़ा भाजपा भीमा मंडावी 12008
7. बीजापुर भाजपा महेश गागड़ा 10521
8. कोंटा कांग्रेस लखमा कवासी 192
अब तक हुए चुनावों की संख्या-14
कांग्रेस जीती 5 बार
निर्दलीय जीते 5 बार
भाजपा जीते 3 बार
भालोद जीते 1 बार
परिसीमन मे विलोपित सीट
केसलूर
परिसीमन में नवगठित सीट
जगदलपुर (आरक्षित से सामान्य वर्ग में)
बस्तर
वर्ष 2004 के मतदाताओं की संख्या
10,39,442
मतदान केंद्रों की संख्या
1511
वैद्य मतों की संख्या
4,50,425
वर्ष 2004 के मतदान का प्रतिशत
43.33
विजयी प्रत्याशी
बलीराम कश्यप (भाजपा)
दूसरे नंबर के प्रत्याशी
महेंद्र कर्मा (कांग्रेस)
हार-जीत का अंतर
54,373
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पांच निर्दलीय संसद पहुंचे
वर्ष 1951 में अस्तित्व में आने के  साथ ही अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित बस्तर संसदीय सीट के लिए हुए अब तक 14 में से आठ चुनावों के नतीजे दिलचस्प और चौका देने वाले रहे। इस दौरान पांच निर्दलीय उम्मीदवारों का सांसद बनना अपने आप में एक रिकार्ड है। मसलन पहले ही चुनाव में निर्दलीय मुचाकी कोसा ने कांग्रेस के सुरती क्रिष्टैया को करीब 66 प्रतिशत मतों से भारी मतों के अंतर से हरा दिया। दुबारा कांग्रेस की टिकट पाकर क्रिस्टैया अपने निकटतम निर्दलीय प्रतिद्वंदी बोडा दादा को हराने में सफल तो हो गए लेकिन 1962 के तीसरे चुनाव में संसदीय सीट से फिर निर्दलीय लखमू भवानी ने बाजी मार ली। खास बात ये भी कि इस चुनाव में उनके निकटतम प्रतिद्वंदी रहे बोड़ा दादा भी निर्दलीय थे। तीसरी बार चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के क्रिस्टैया को तीसरे स्थान पर खिसकना पड़ गया। निर्दलियों का दबदबा लगातार तीसरी बार यानी 1971 में भी बना रहा। चुनाव में निर्दलीय लंबोदर बलियार के मुकाबले दूसरे नंबर पर भी निर्दलीय पीलूराम रहे। कांग्रेस इस चुनाव में मैदान में ही नहीं उतरी। जबकि जनसंघ मजह 14 प्रतिशत वोट पाकर चौथे स्थान पर रही। बलियार ने वर्ष 1977 का चुनाव कांग्रेस के बैनर तले लड़ा मगर आपातकाल से नाराज मतदाताओं ने विपक्षी गठबंघन की ओर से भालोद की टिकट पर खड़े दृगपाल शाह को जीता दिया। चुनावी इतिहास में 23 साल बाद अर्थात वर्ष 1980  में कांग्रेस दुबारा जीत का चेहरा देख सकी। पार्टी प्रत्याशी लक्ष्मण कर्मा इस बार जनता पार्टी के समारुराम को करीब साढ़े आठ प्रतिशत मतों के अंतर से हराकर संसद तक पहुंचने में सफल हुए थे। ख्याल रहे, कर्मा वर्ष 1971 में संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय लड़ते हुए तीसरे नंबर पर थे।
 
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