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माओवादियों ने बदली रणनीति

 वीरेंद्र मिश्र,

जगदलपुर/रायपुर.सलवा जुडूम अभियान के ठप पड़ने से राहत महसूस कर रहे नक्सलियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। अपने स्थापना सप्ताह के दौरान बस्तर में शांति संघर्ष समिति की गठन की तैयारियों ने उनकी नींद उड़ा दी है। इससे निपटने के लिए वे अब मोबाइल वार के सहारे बड़ी वारदात को अंजाम देने की तैयारी में हैं। 
माओवादियों की सेंट्रल कमेटी ने भी इसे गंभीरता से लिया है। लिहाजा स्थापना सप्ताह के दौरान ही ताड़मेटला कांड दोहराने के फरमान जारी हुए। भद्रकाली थाने के सात जवान हत्थे चढ़ने के बाद माओवादियों ने थाना लूटने की भी योजना बना ली। 
इसी फेर में उन्होंने ढेपला के निकट तीन जवानों की हत्या कर उनकी लाश सड़क पर फेंक दी और जबरदस्त एंबुश लगाकर बैठ गए। माओवादियों को फरमान था कि लाश लेने के लिए भद्रकाली थाने के जवान जब मौके पर पहुंचेंगे तो उन्हें घेरकर निशाना बना लिया जाएगा। इसके साथ ही उनकी दूसरी टुकड़ी भद्रकाली थाने पर हमला करने वाली थी। मौका उनके हिसाब से उपयुक्त था, क्योंकि आधे से ज्यादा जवान शव लाने निकल पड़ते।
पिछले हादसों से सबक : 
माओवादियों के बेट एंबुश में लगातार फंस रही पुलिस ने पिछले हादसों से सबक लेते हुए मौके पर खुद न जाकर गांव वालों की मदद से शव भोपालपटनम थाने में मंगवा लिया। इस बीच माओवादियों ने पुलिस को फिर से फांसने के लिए इलाके के ही करकावाया में अगवा चार जवानों की लाश देखे जाने की अफवाह फैला दी। यहां भी उन्होंने एंबुश लगाया था, लेकिन इस दफे भी पुलिस उनके जाल में नहीं फंसी।
निशाने पर था भद्रकाली थाना : 
भद्रकाली थाना पुलिस ने बीते साल क्षेत्र में माओवादियों की देख-रेख में ली जा रही दस एकड़ गांजे की खड़ी फसल को नष्ट कर दिया था। गांजे के अवैध कारोबार से माओवादियों को खासी आमदनी हो रही थी। वहीं उनके हिमायती इलाके के संघम सदस्यों को भी रोजगार मिल रहा था। इसके बाद से माओवादी इस थाने को निशाना बनाने को बेताब थे।
फारेस्ट गार्ड ने नाहक गंवाई जान : 
दो दफे अपने मंसूबों में कामयाब न होने के बाद माओवादियों ने सुकमा इलाके में बस से अगवा किए फॉरेस्ट गार्ड जगदीश मरकाम की हत्या कर लाश राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे फेंक दी थी। यहां भी पुलिस उनके जाल में नहीं फंसी।
नेपाल की तर्ज पर मोबाइल वार : 
झारखंड में वर्ष 2006 की शुरुआत में माओवादियों ने अपनी कांग्रेस में मोबाइल वार के लिए तैयार बताया था। इसके बाद 14-15 मार्च को बीजापुर के रानीबोदली और फिर मुरकीनार पोस्ट पर जबरदस्त हमला कर मोबाइल वार के नमूने भी दिखा दिए। मोबाइल वार के इन दो बड़े हमलों के बाद करीब चार साल से माओवादियों ने मोबाइल वार के जरिए एक भी हमले नहीं किए। इस कारण उनकी सेंट्रल कमेटी का दबाव नेपाल की तर्ज पर मोबाइल वार किए जाने के लिए है और फिलहाल शांति संघर्ष समिति को सबक सिखाने वक्त माकूल माना जा रहा है।
बड़े पैमाने पर लड़ाकों की भर्ती : 
बीते साल की सफलता से उत्साहित माओवादियों ने अपनी सैन्य इकाई को नए सिरे से लामबंद किया है। बारिश के बाद पुलिस की संभावित कार्रवाई के मद्देनजर बड़े पैमाने पर लड़ाकों की भर्ती की जा रही है। 
इसके लिए अंदरुनी इलाकों में हर घर से एक युवक की मांग की जा रही है। नारायणपुर क्षेत्र में युवकों की भर्ती के लिए माओवादियों ने काफी दबाव बनाया है, जबकि सलवा जुडूम के चलते बीजापुर, भैरमगढ़, कुटरू, फरसेगढ़, बेदरे क्षेत्र से उन्हें ढूंढे से युवक नहीं मिल रहे हैं। अमूमन राह दिखाने और बोझा ढोने का काम करने वाले संघम सदस्यों को भी एरिया कमेटी और लोकल गुरिल्ला स्क्वाड से जोड़ा जा रहा है।
डिवीजनल कमेटी ब्यूरो के अधीन : 
पिछले कुछ समय में माओवादियों ने अपने संगठनात्मक ढांचे में फेरबदल किया है। अब तक बस्तर में डिवीजनल कमेटी ही माओवादियों की सबसे बड़ी इकाई थी, जो दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के आधीन थी। अब नई इकाई ब्यूरो गठित की गई है। 
फिलहाल नार्थ और साउथ दो ब्यूरो हैं। साउथ ब्यूरो के सेक्रेटरी रमन्ना हैं और उनकी कमान में साउथ बस्तर, वेस्ट बस्तर, ईस्ट बस्तर और दरभा डिवीजनल कमेटी हैं। जबकि नार्थ ब्यूरो के बारे में अब तक ज्यादा जानकारी नहीं मिल सकी है।
"बस्तर में माओवादी बड़े हमले की फिराक में हैं। जिसके चलते रेंज की पुलिस को सतर्कता बरतते हुए कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए हैं।"
टीजे लांगकुमेर आईजी बस्तर रेंज
क्या है मोबाइल वार 
मोबाइल वार (चलायमान युद्ध) यानी खुद के ठिकाने से निकलकर दुश्मन की टुकड़ी पर उन्हीं के इलाके में जाकर पूरी तैयारियों के साथ सीधा और सुनियोजित हमला करना है। मोबाइल वार के लिए बड़ी तादाद में प्रशिक्षित लड़ाकों के साथ ही आधुनिक हथियार और साजो-सामान की जरूरत पड़ती है। 
माओवादियों ने मोबाइल वार के मकसद से ही बीते साल भी बारिश के दौरान भारी पैमाने पर लड़ाकों की भर्ती की थी। शुरुआती दौर में लड़ाकों, हथियार और संसाधनों की कमी के चलते माओवादी गुरिल्ला वार के जरिए पुलिस पर हमला कर उनके हथियार लूटकर अपने को मजबूत करते थे। जबकि आज स्थिति बदल गई है। 
बीते 6 अप्रैल को ताड़मेटला में 76 जवान और 29 जून को धौड़ाई में 27 जवान की माओवादियों ने घात लगाकर हत्या की थी। यह भी गुरिल्ला वार का नमूना था। लेकिन नक्सली अब सुरक्षाबलों के कैंपों, थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले की तैयारी कर रहे हैं।
 
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