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तुर्की से लेकर नैनीताल की फिल्म
लखनऊ, अक्तूबर। जसम फिल्मोत्सव के दूसरे दिन दर्शकों ने तुर्की की फिल्म से लेकर नैनीताल के एक गांव पर बनी फिल्म देखी। इसके अलावा डाक्यमेन्टरी फिल्मों की प्रतिपक्ष की भूमिका पर जसम के द ग्रुप के संयोजक फिल्मकार संजय जोशी की प्रस्तुति ने डाक्यूमेन्टरी फिल्मों को समझने का एक नया दृष्टिकोण दिया। शाम के सत्र में मालविका ने गायन प्रस्तुत किया। कबीर पर चार डाक्यूमेन्टरी फिल्मों में से एक हद अनहद ने फिल्म उत्सव में आए दर्शकों को एक नए आस्वाद से परिचय कराते हुए कबीर के राम की खोज करते हुए दर्शको को गहरे तक प्रभावित किया।
फिल्म उत्सव के दूसरे दिन की शुरूआत महान फिल्मकार इल्माज गुने की फिल्म सुरू से हुई। फिल्म का परिचय कराते हुए लेखक एवं जसम के उपाध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि इल्माज गुने ऐसे फिल्मकार हैं जिन्हें सत्ता का दमन खूब झेलना पड़ा। उन्होंने मजदूर वर्ग की हिरावल भूमिका को पहचाना और अपनी जीवन दृष्टि को एक क्रंातिकारी जीवन दृष्टि में रूपान्तरित किया। सुरू फिल्म दो कबीलों के बीच पिसती एक औरत की कहानी है। उसका पति अपने पिता से विद्रोह कर शहर में इलाज कराना चाहता है। एक संयोग के तहत उनका पूरा कुनबा अपनी भेड़ों को बेचने के लिए तुर्की की राजधानी अंकारा की या़त्रा करता है। इस यात्रा में वे बार-बार ठगे जाते हैं। घर के विद्रोही बेटे केा अंकारा में अपनी बीबी के बेहतर इलाज की पूरी उम्मीद है। इस यात्रा में उनकी भेड़ें और पूरा परिवार ठगा जाता है और वे राजधानी की भीड़ में कहीं खो जाते हैं। 
दोपहर बाद के सत्र में फिल्मकार संजय जोशी ने पांच डाक्यूमेन्टरी फिल्मों के अंश दिखाते हुए प्रतिपक्ष की भूमिका में सिनेमा पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने आनन्द पटवर्धन की फिल्म बम्बई हमारा शहर, अजय भारद्वाज की एक मिनट का मौन, बीजू टोप्पो व मेघनाथ की विकास बन्दूक की नाल से, हाउबम पबन कुमार की एएफएसपीए 1958 और संजय काक की बंत सिंह सिंग्स के अंश दिखाते हुए कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों के जरिए सही तौर पर प्रतिपक्ष की भूमिका निर्मित की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 के बाद आनन्द पटवर्धन की क्रांति की तरंगे से डाक्यूमेन्टरी फिल्मों में प्रतिपक्ष का एक नया अध्याय शुरू हुआ था जिसमें फिल्मस डिवीजन के एकरेखीय सरकारी सच के अलावा जमीनी सच सामने आते हैं। कई फिल्मकारों ने अपनी प्रतिबद्धता, विजन के साथ तकनीक का उपयोग करते हुए कैमरे को जनआन्दोलनों की तरफ घुमाया है और सच को सामने लाने का काम किया है।
यह डाक्यूमेन्टी फिल्म पुणे महानगर निगम कामगार यूनियन ने बनाई है और इसको अतुल पेठे ने निर्देशित किया है। यह फिल्म सिफ सफाई कामगारों के बारे में नहीं बताती है बल्कि कचरे की समस्या के पीछे सम्पूर्ण समाज की भूमिका और उसके प्रति भिन्न-भिन्न तबकों के नजरिए को सामने लाती है। साथ ही आम लोगों को अपने कर्तव्य का बोध कराते हुए सफाई मजदूरों को मानज जाति के सदस्य के बतौर समझने का दृष्टिकोण देती है। यह फिल्म सफाई कामगारों के एक व्यूह में फंसने और उस व्यूह को तोड़ने के प्रयासों का दस्तावेज है। इसमें सरकार और प्रशासन के सफाई कामगारों के प्रति दोरंगे व्यवहार का भी पर्दाफाश किया गया है।
कबीर परियोजना के तहत फिल्मकार शबनम विरमानी ने अपने दल के साथ मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान,पाकिस्तान और अमेरिका की यात्रा की। इस अवधि में ऐसे कई लोक गायकों, सूफी परंपरा से जुड़े गायकों से मिलने और उनको सुनने, कबीर के अध्ययन से जुड़े देशी-विदेशी विद्वानों और विभिन्न कबीर पंथियों से मिलकर उनके विचारों को जानने-समझने का प्रयत्न किया। 
छह वर्ष लंबी अपनी इस यात्रा में शबनम विरमानी ने चार वृत्तचित्र बनाए जिसमें से हद-अनहद  इस श्रृंखला की पहली कड़ी है। इस फिल्म के माध्यम से कबीर के राम को खोजने का प्रयास किया गया है, जो अयोध्या के राजा राम से भिन्न है। फिल्मकार यह भी बताती है कि कबीर गाने वाले लोकगायक कबीर की शिक्षा से दूर नहीं है। वे इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि कबीर का राम वह राम नहीं है जिसकी गाथा रामायण में कही गयी है। प्रहलाद सिंह टिपाणिया और उनके साथियों और गांव वालों के साथ यह वार्ता इसी सत्य का उद्घाटन करती है कि कबीर का राम अब भी लोक चेतना में बसा हुआ है। वह केवल किताबों तक सीमित नहीं है।
बेला नेगी की फिल्म दांए या बांए एक ऐसे नौजवान दीपक की कहानी है जो पहाड़ के अपने छोटे से कस्बे से जाकर शहर में गुजारा करता है। शहर में अपनी प्रतिभा का कोई इस्तेमाल न पाकर गांव लौट आता है। शहर से आया होने के कारण सभी के नजरों में वह एक विशेष व्यक्ति बन जाता है लेकिन वह शहर वापस जाने के बजाय गांव में स्कूल खोलकर बच्चों को पढ़ाने का निर्णय लेता है जिस पर गांव के लोग उसे आदर्शवादी कहकर हंसते हैं। एक दिन दीपक की कविता उसके दोस्त एक कान्टेस्ट में भेज देते हैं। इनाम में दीपक को कार मिलती है। इसके बाद दीपक का विकास एक दूसरे रूप में शुरू हो जाता है। वह लोगों को कर्ज बांटता है और कार को किराए पर चलाना शुरू कर देता है। इन सबके बावजूद दीपक को अहसास होता है कि वह अपने बेटेे की नजर में गिर गया है और वह बेटे की नजर में खोया सम्मान वापस पाने का प्रयास करता है। इस फिल्म की शूटिंग नैनीताल के पास एक गांव में हुई है और यह फिल्म जीवन की गाढ़ी जटिलता और दुविधाओं को सामने लाती है। 
 
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