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ब्लॉगिंग की आचार संहिता
संजीत त्रिपाठी 
सबसे पहले तो आभार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का जिसने  समय को जानते-बूझते हुए हिंदी ब्लॉगिंग के संदर्भ में कार्यशाला व गोष्ठी का आयोजन करना शुरु किया और आवारा बंजारा को भी उसमें शिरकत करने का मौका दिया। बात अब आगे करें…
एक समय में देश के वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन की प्रमुख कविताएं बनीं जनता का आदमी और गोली दागो पोस्टर जैसी कविताएं लिखने वाला शख्स आलोक धन्वा जब यह कहे कि कि  " पहली बार जब उन्हें किसी ने इंटरनेट पर हिंदी ब्लॉग्स के बारे में बताया और उन्होंने पटना में पहली बार ब्लॉग देखना शुरु किया तो बड़े ही कौतुक से देखा"।  तो यह ब्लॉग और खासतौर से  हिंदी ब्लॉग्स जब देश के मूर्धन्य साहित्यकारों के द्वारा भले ही कौतुक की नजर से देखे जाते हों लेकिन वह अब अपनी धमक इतनी बढ़ा चुके हैं कि कंप्यूटर के क ख ग से अपरिचित रहने वाले साहित्यकार भी अब ब्लॉग्स की ओर रुख कर रहे हैं। 
वर्धा स्थित  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में 9-10 अक्टूबर को  'हिंदी ब्लॉग की आचार संहिता' विषय पर  आयोजित दो दिनी कार्यशाला व गोष्ठी में  शारीरिक लिहाज से बुजुर्ग लेकिन विचारों से खांटी नौजवान इस कवि आलोक धन्वा ने अपने पूरी उर्जा के साथ देश भर से आए ब्लॉगर्स के बीच रहकर ब्लॉग्स को जाना समझा और कार्यशाला के उद्घाटन के दौरान अपनी राय  इसके बारे में व्यक्त करते हुए कहा कि "यह अंतत: एक व्यक्ति पर निर्भर करता है जो इसे ऑपरेट करता है, उसकी ज्ञान और नैतिकता पर निर्भर करता है"। आगे वे कहते हैं कि "आचार संहिता यदि भारी भरकम शब्द है तो  नैतिकता की नजर से  देखिए, एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक के नजरिए से।  जब आप ब्लॉग पर कवियों के बारे में लिखते हैं तो सवाल उठता है कि आप हिंदी या अन्य भाषाओं के कितने कवियों को कितना जानते हैं"।
धन्वा का इशारा इस ओर था कि ब्लॉग पर लिखने वाला अपने को सर्वज्ञानी समझते हुए ही न लिखे जैसा कि हिंदी ब्लॉग्स में अक्सर देखा जाता है।  उन्होंने ब्लॉग बिरादरी से इस बात की अपेक्षा की कि गुलामी की जंजीरों को तोड़ने में आजादी को आगे बढ़ाने में सहयोग करें। वाकई उनकी यह अपेक्षा आज के इस समय में सटीक है क्योंकि वर्तमान दौर में देश एक तरह से वैचारिक गुलामी की ओर बढ़ता जा रहा है और यह वैचारिक गुलामी एमएनसी कंपनियों व उनके उत्पादों के माध्यम से आ रही है। 
पिछले दिनों अपने बयान से काफी ज्यादा चर्चा में आए और आलोचित हुए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने यह स्पष्ट किया कि  "विवि के बारे में यह धारणा रही है कि यह महज हिंदी साहित्य का विवि है लेकिन हकीकतन यह हिंदी भाषा की सभी विधाओं का विवि है। इंटरनेट पर अभिव्यक्ति के सबसे नवीनतम तरीके ब्लॉग को यह विवि नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसके लिए यह आयोजन दूसरी कड़ी है, पहली कड़ी के रुप में पिछले साल इलाहाबाद में हुई वर्कशॉप है"।  उन्होंने ब्लॉगरों से यह कहा कि "हम ऐसा कुछ न करें कि राज्य प्रतिष्ठान्न दखल दे, सेंसर न बिठा दे"।
प्रथम सत्र में सबसे आश्चर्यजनक जो बात लगी वह यह कि विषय प्रवर्तन की जिम्मेदारी निभा रहीं
राजस्थान की ब्लॉगर व राजस्थान साहित्य अकादमी की पूर्व अध्यक्ष डॉ अजीत कुमार ने अपने वक्तव्य में ब्लॉग्स की आचार संहिता के रुप में एक पंचायत बनाने की जरुरत बताई । इसके बाद हिंदी ब्लॉग्स के शुरुआती ब्लॉगरों में शामिल कानपुर निवासी अनूप शुक्ल ने कहा कि  "ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात करना खामख्याली है। ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का माध्यम है। समय और समाज की जो आचार संहिताएं जो होंगी वे ही ब्लॉगिंग पर भी लागू होंगी। इसके अलावा ब्लॉगिंग के लिये अलग से आचार संहिता बनाने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए"।
पहले दिन के दूसरे सत्र में हिंदी ब्लॉगिंग पर कार्यशाला रखी गई जिसमें यह जानकर खुशी हुई कि करीब पचास से ज्यादा प्रतिभागियों ने इसमें हिस्सा लिया था। विवि के छात्रों से लेकर उड़ीसा के संबलपुर के बैंक कर्मचारी भी इसमे शामिल थे। 
दूसरे दिन के पहले सत्र में ब्लॉगरों के समूह् ने अपनी चर्चा के बाद बनाए गए समूह  के प्रतिनिधि रुप में उस समूह के एक ब्लॉगर ने अपने  समूह की राय वक्तव्य के रुप में  सामने रखीं।  दूसरे दिन सबसे खास बात थी, देश के प्रख्यात साइबर लॉ एक्सपर्ट व सुप्रीम कोर्ट के वकील पवन दुग्गल का व्याख्यान।
पवन दुग्गल ने अपने वक्तव्य में कई उदाहरण दिए जिसमें किसी कंपनी के खिलाफ कोई अज्ञात बेनामी ब्लॉगर उसके उत्पाद के बारे में अंट-शंट लिखे जा रहा था। कोर्ट में मामला ले जाया गया। उस ब्लॉगर के खिलाफ फैसला आया लेकिन दिक्कत यह थी कि वह ब्लॉग नार्वे से संचालित था। फिर इसके लिए भारतीय कमीशन के माध्यम से नार्वे के कमीशन से संपर्क किया गया तब जाकर उस व्यक्ति तक पहुंचा जा सका।
उन्होंने मार्के की बात यह कही कि ब्लॉग धीरे-धीरे लेकिन जल्दी असर दिखाता है, लोग उसे पढ़कर एक धारणा कायम करते हैं।  उन्होंने कारगिल हमले के दौरान बरखा दत्त  पर ब्लॉग में लिखे जाने का भी हवाला दिया।  जो सबसे बड़ी जानकारी उन्होंने दी वह यह कि " देश के  इंफर्मेशन एक्ट 2000 में 2008 में संशोधन पारित किया गया जो कि 27 अक्तूबर 2009 से लागू हो चुका है। इस एक्ट के तहत अब ब्लॉग, ब्लैकबेरी  यहां तक कि सेटेलाइट फोन भी आ चुके हैं ( सेटेलाइट फोन के संदर्भ में सवाल उज्जैन के एंग्री यंगमैन ब्लॉगर सुरेश चिपलूनकर ने पूछा)"। साइबर लॉ एक्स्पर्ट ने कहा कि  " ब्लॉगिंग ने आपको पूरी स्वतंत्रता नहीं दी है कि किसी के बारे में कुछ भी जो मन में आया लिख दें, बिना किसी सबूत के। ब्लॉग कानून के दायरे में आ चुका है।  कानूनन ब्लॉगिंग इंटरनिजरी है।  धारा 79 कहता है कि जिम्मेदारी ब्लॉग, ब्लॉगर व ब्लॉगिंग प्लेटफार्म पर है।  किसी जुर्म या कमीशन में भागीदार हैं तो पूरे तौर पर जिम्मेदार। तीन साल की सजा व पांच लाख का जुर्माना। पांच करोड़ तक का हर्जाना (6 माह के भीतर) भी हो सकता है"। 
इसी दिन अंतिम सत्र में भोपाल में बैठकर फोन के माध्यम से सेमीनार के दौरान कंप्यूटर पर पावरप्वाइंट प्रेजेंटेशन देते हुए ब्लॉग जगत के एक अन्य पुरोधा रवि रतलामी ने यह स्पष्ट कर दिया कि "ब्लॉगिंग के लिए आचार संहिता संभव नहीं है। उन्होंने बतौर उदाहरण देते हुए बताया कि विकिलिक्स एक उदाहरण है कि कैसे इसके माध्यम से घोटालों को भी उजागर किया जा सकता है"। 
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि "जिसे कानून का उल्लंघन करना ही होगा उसके लिए इंटरनेट पर कई साफ्टवेयर मौजूद हैं जैसे कि टॉर जिनका उपयोग करते हुए वह बेनामी ब्लॉगिंग कर सकता है"। 
बहरहाल! इस दो दिवसीय कार्यशाला व सेमीनार से यह बात तो उभर कर सामने आई कि हिंदी ब्लॉगिंग के लिए किसी आचार संहिता या रेगुलेटरी बोर्ड या फिर पंचायत जैसी किसी संस्था के लिए कोई गुंजाईश ही नहीं है। दरअसल  यह संभव ही नहीं है।  दूसरी बात यह कि अगर कानून है तो हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भले ही अपराधी हमेशा पुलिस से दो कदम आगे ही होता है लेकिन कानून के हाथ लंबे होते हैं। इसलिए स्व-नैतिकता ही ब्लॉगिंग में सबसे अनिवार्य तत्व है, यही एक ब्लॉगर की ब्लॉगिंग के लिए आचार संहिता है। लेकिन आधुनिक युग में अभिव्यक्ति के एक इतने अच्छे माध्यम का दुरुपयोग करने वाले और बिना सबूतों के कुछ भी लिख देने वालों के लिए कानून मौजूद ही है।  भले ही आप ब्लॉग में पहले कुछ लिख दें और उसे लिखकर मिटा/ डिलिट कर दें लेकिन अगर सामने वाला उसका प्रिंट आउट/स्क्रीन शॉट लेकर रख लेता है तो उसके माध्यम से ही कानून अपना काम कर लेगा, जैसा कि साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने कहा। 
आवारा बंजारा
http://sanjeettripathi.blogspot.com/
 
 
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