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सिक्किम में चामलिंग का दहला

 कुमार प्रतीक

गंगटोक।  सिक्किम में पंद्रह साल से राज कर रहे सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) के प्रमुख व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने अबकी तुरूप की चाल चली है। राज्य में अपने खिलाफ एकजुट होने वाले विपक्ष को मात देने के लिए उन्होंने विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की सूची में 21 मौजूदा विधायकों का पत्ता साफ कर दिया है। विपक्ष के नहले पर उका यह दहला भारी पड़ रहा है। कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी पार्टियां अपने चुनाव अबियान में सरकार के दागी और भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जोर दे रही थी। लेकिन चामलिंग की इस चाल ने उनके अभियान की हवा निकाल दी है। विधानसभा चुनाव के लिए जिन विधायकों का टिकट कटा है उनमें नौ मंत्रियों के साथ ही एसडीएफ के प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष का नाम भी शामिल है।
पश्चिम बंगाल से सटे इस पर्वतीय राज्य में लोकसभा की तो एक ही सीट है, लेकिन उसके साथ यहां विधानसभा की 32 सीटों के लिए भी चुनाव होने जा रहे हैं। सत्तारूढ़ सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) के प्रमुख व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग इस बार चौथी बार सत्ता हासिल करने के लिए मैदान में उतरे हैं। लेकिन अबकी विपक्षी राजनीतिक दलों की गोलबंदी और प्रतिष्ठानविरोधी लहर से निपटने के लिए उन्होंने अपने 21 मौजूदा विधायकों का पत्ता साफ कर दिया है। इससे साफ है कि उनकी राह आसान नहीं है। राज्य के विधायकों पर भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद के आरोप लगते रहे हैं। चामलिंग की दलील है कि पार्टी ने नए चेहरों को मैदान में उतारने के लिए यह कदम उठाया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि वे युवा नेताओं की एक फौज खड़ी करना चाहते हैं ताकि सक्रिय राजनीति से उनके संन्यास के बाद वे पार्टी को आगे ले बढ़ा सकें। 
राज्य में अबकी चुनाव प्रचार के दौरान विधानसभा में लिंबू और तामंग तबके के लिए सीटों के आरक्षण के अलावा आयकर कानून और गोरखालैंड मुद्दा उभरने की संभावना है। पिछली बार राज्य की 32 में से 31 विधानसभा सीटें जीतने वाले एसडीएफ को अबकी लिंबू और तामंग तबके के लिए सीटों के आरक्षण और एक गैर-राजनीतिक संगठन अफेक्टेड सिटीजंस आफ तिस्ता (एसीटी) की ओर से राज्य में पनबिजली परियोजनाओं के खिलाफ जारी आंदोलन के चलते कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। सिकिक्म पश्चिम जिले में एसडीएफ के उम्मीदवार को आरक्षण के सवाल पर मुश्किल हो सकती है। इस इलाके में लिंबू और तामंग तबके के वोटर ही निर्णायक हैं। विपक्षी सिक्किम हिमाली राज्य परिषद पार्टी व नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) इलाके के वोटरों को यह समझाने में जुटी हैं कि बीते छह वर्षों के दौरान एसडीएफ ने आरक्षण की उनकी मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया है। उनको अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किए जाने के छह साल बाद भी सरकार ने उनकी लगातार उपेक्षा करती रही है।
हिमाली परिषद के अध्यक्ष ए.डी सुब्बा व एनसीपी अध्यक्ष अशोक सोंग-दोनों ही लिंबू समुदाय के हैं। वे दोनों विधानसभा में इस तबके के लिए आरक्षण की पुरजोर वकालत करते रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एनसीपी के राष्ट्रीय महासचिव पी.ए.संगमा खुद सिक्किम चुनाव में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं। ऐसे में यहां अबकी एसडीएफ को नुकसान उठाना पड़ सकता है। ध्यान रहे कि वर्ष 2004 के विधानसभा चुनावों में एसडीएफ ने इस जिले की सभी आठ सीटों पर जीत हासिल की थी और उनमें से पांच उम्मीदवार लिंबू व तामंग समुदाय के थे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है चामलिंग ने अबकी जानबूझ कर अपने उम्मीदवारों की सूची देर से जारी की। इसके साथ ही इस बात का भी पूरा ख्याल रखा कि एक साथ इतने विधायकों के सफाए से बगावत की बालत नहीं पैदा हो।  इस राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री नर बहादुर भंडारी के खिलाफ हुई बगावत ने ही चामलिंग को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। चामलिंग इस बात को भूले नहीं होंगे। इसके बावजूद भितरघात के अंदेशे से इंकार नहीं किया जा सकता। पर्यवेक्षकों का कहना है कि भितरघात के चलते कई सीटों पर एसडीएफ उम्मीदवारों को दिक्कत हो सकती है।
 
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