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तलाश है श्री कृष्ण की

 विजय विनीत

पंडवानी गायिका तीजनबाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को मध्य प्रदेश के भीलाइ जनपद के गनीयारी गांव मे हुआ। इनके पिता का नाम हुनुक लाल परधा व माता का नाम सुखवन्ती था। इनका पालन पोषण इनके नाना बृजलाल परधा ने किया।  तेरह साल की उम्र से ही तीजनबाई तम्बूरा लेकर पंडवानी गाने लगी। इनके गायन से पंडवानी को असीमित ऊचाईया मिली और इसे लोग भारत ही नहीं दुनिया के कई देशो में पसन्द करने लगे। जैसे-जैसे समय बीतता गया पंडवानी विधा मशहूर होती गयी। साथ ही तीजनबाई की गायन शैली लोगांे को अभिभूत करती गयी। इनकी गायन शैली का जादू लोगों को सर चढ़कर बोलने लगा। इनकी गायन शैली से इन्दिरा गांधी इतनी प्रसन्न हुयी थी, कि उन्होने भी तीजनबाई की पीठ थपथपाकर शाबाशी दी थी। विलासपुर विश्व़िव़द्यालय में इन्हें डि लीट की उपाध से सम्मानित किया। 1988 में पद्म श्री व 2003 में भारत सरकार ने पद्मभूषण के सम्मान से सम्मानित किया। 1995 में इन्हें संगीत नाटक अकादमी व 2007 में नृत्य शिरोमड़ी का सम्मान दिया गया।
 आज के हालात पर जब तीजनबाई से नक्सलवाद गरीबी भुखमरी सलवा जुड़ूम जैसे मुद्दो पर सवाल किया गया, तो उन्होने बड़ी ही बेवाकी से अपना जवाब दिया। नक्सलवाद समाप्त करने के लिए सबकों आगे आने के लिए तीजनबाई ने कहां उन्होंने कहा कि नक्सलवाद समाप्त करना सिर्फ सरकार का काम नहीं इसके लिए सबको आगे आना होगा। छत्तीसगढ़ सरकार की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि वहां दो रूपये किलो चावल गेंहु मिट्टी का तेल मिल रहा है। इससे वहा के तमाम लोग सरकार के साथ खड़ेे है। सरकार इतना सस्ता और इतना बढ़िया अनाज बाट रही है। जिसे अमीर गरीब सभी खा सकते है। भ्रष्टाचार को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बताते हुए तीजनबाई ने कहा की जितनी बढ़ोतरी इसमें होगी आम आदमी उतना ही परेशान होगा। गरीबी बढ़ेगी लोग हतास होगें। और इससे भविष्य में कानून व्यवस्था खराब हो सकती है।
 पाश्चात् संस्कृति पर चर्चा करते हुए तीजनबाई ने कहा कि चाहे कितनी भी पाश्चात् संस्कृति आ जाये हमारी लोक कला को समाप्त नहीं कर सकती। लोक कला हिन्दुस्तान की मिट्टी में पैदा होती है, ऐसी कोई बाहरी संस्कृति पैदा नहीं हुई जो हमारी किसी भी लोक कला को मिटा सके। लोक कला को सुरक्षित संरक्षित व संवर्धित रखने के लिए युवाओं को आगे आना होगा। देश के युवाआंे को आगे बढने के लिए सर्घषशील रहना होगा। उन्होंने कहा कि विदेशी नाच से कमर हिलती है। जबकि हिन्दुस्तानी कला वह संस्कृति से दिल मचलता है।
 
 देश में महिलाओं के हालात पर अपनी बेवाक टिप्पणी करते हुए तीजनबाई ने कहा कि आज की स्थिति को देखकर सच में कलयुग का आभाष होता है। अगर कलयुग नहीं होता तो कृष्ण जरूर नजर आता, आज कृष्ण कही दिखाई नही देता द्रोपदी तो हर जगह देखी जा रही है। हमे कृष्ण की तलाश है।
 अपनी पंडवानी विधा पर बातचीत करते हुए उन्होने कहा कि इस समय मै कर्णवंध प्रसंग को मंचो पर अपने गायन से प्रस्तुत कर रही हूँ। कर्ण अत्याचारी व अन्यायी नही था। वह बेवश, लाचार व निरीह हो चुका था। ऐसे में उसके सामने कोई रास्ता नहीं रह गया था। कुरूक्षेत्र के मैदान में कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गये उपदेश को उन्होंने मनुष्य के लिए सबसे बड़ा ज्ञान बताया और कहा कि अगर आज के परिवेश में उसका रंच मात्र भी अनुसरण किया जाय तो तमाम समस्याएं पैदा ही नहीं होगी।  
 
(१० दिसम्बर को तीजन बाई सोनभद्र सोनमहोत्सव में आयीं थीं इस अवसर पर उनसे बातचीत हुयी थी )
 
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