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समाजवादी चेतना के प्रकाश पुंज

विजय प्रताप

लोकतांत्रिक - समाजवादी विचारों, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और सादगी की जिंदगी जीने के लिए प्रसिद्ध सुरेंद्र मोहन केवल भारतीय समाजवादी धारा के नेता नही थे, बल्कि सभी वामपंथी कार्यकर्ता, चाहे वे किसी भी विचारधारा से जुड़े हों, उन्हें अपना नेता, सलाहकार और खैरख्वाह मानते थे। 
 सुरेंद्र मोहन ने युवा अवस्था में ही अंबाला से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में शरीक होकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। भारतीय समाजवादी आंदोलन के सभी स्वरुपों में उनकी अग्रणी भूमिका रही। इंदिरा गांधी की तानाशाही-आपातकाल - के खिलाफ चली मुहिम में भी उन्होने महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई। जय प्रकाश नारायण के विश्वासपात्र होने के साथ-साथ वे विभिन्न राजनीतिक धाराओें को एक जुट कर जनता पार्टी बनाने में सक्रिय प्रमुख व्यक्तियों में थे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव और उसके बाद बनी सरकार के दौरान वे जनता पार्टी के महामंत्री थे। 1978 से 1984 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे पीयूसीएल के संस्थापक सदस्य थे और लगातार उनके संरक्षक के रुप में सक्रिय रहे। अस्सी के दशक में हिंद मजदूर सभा के साथ उन्होनें ‘काम का अधिकार’ के लिए देश व्यापी अभियान खड़ा किया जिसमें विभिन्न श्रमिक संघों और राजनीतिक धाराओं ने एक जुट होकर इस मांग को बुलंद किया। 1990 में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए मंडल आयोग की सिफारिश पर अमल कराने में उनका भी अहम योगदान था।
काशी विद्यापीठ में दो साल समाजशास्त्र  पढ़ाने  के बाद  सुरेंद्र मोहन ने नौकरी छोड़ कर पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बनना तय किया था। पर पढ़ना-लिखना उनके जीवन का अभिन्न अंग बना रहा। हिंदी और अंग्रजी के अखबारों में उनके विश्लेषणात्मक लेख, अनेक पुस्तिकाएं और तीन पुस्तके प्रकाशित हुईं हैं। वे अंग्रजी में प्रकाशित पत्रिका ‘जनता’के सह-संपादक भी थे।
वे ‘सोशलिस्ट इंटरनेशनल’ और भारत-पाकिस्तान आवामी फोरम के सदस्य थे। दक्षिण एशिया में भारत और नेपाली समाजवादियों के बीच उनकी अहम भूमिका थी। नेपाली कांग्रेस के अनेक नेता उन्हें अपना मित्र, संरक्षक और सलाहकार मानते थे। सुरेंद्र मोहन के शब्द कोश में ‘सफलता’ और ‘विफलता’ दोनों शब्द नही थे। उनके जीवन का एक ही मकसद था, समाजवादी मूल्यों के लिए अनवरत कोशिश। इस मामले में वे संपूर्ण-संभव अर्थों में विदेह थे। सत्ता और संपत्ति के मोह से पूरी तरह ऊपर उठ चुके थे। जीवन संगिनी मंजू मोहन भी ऐसी मिलीं कि उनका घर देश भर के समाजवादी और जेपी आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए अपने घर जैसा था। कोई कभी भी उनके घर आता तो मंजू   जी  सबसे पहले पूछतीं - खाना खाया है। मुझे याद है 1977 के चुनाव पूर्व की स्थिति।
15 अप्रैल, 1977 को उनकी दूसरी संतान बिटिया अनघा मोहन को इस दुनिया में आना था। फिर भी सुरेंद्र मोहन सुबह से देर रात तक ऐतिहासिक चुनाव अभियान के लिए मुद्दे और प्रेस वक्तव्य तैयार करने, नौकरशाही में लोकतंत्र  के लिए प्रसिद्ध वरिष्ठ अफसरों से संवाद रख कर संभावित साजिशों को भापनें और नाकाम करने की योजना बनाने में जुटे रहते थे और मंजू जी आने वाले हर कार्यकर्ता की देखभाल के लिए अपनें को झोंके रहती थीं।
इंदिरा गांधी ने 1976 में कुछ नेताओं को छोड़ा जरुर था, लेकिन सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए वे अंत तक साजिशें करती रही थीं। मगर हमारी नौकर शाही, बीएसएफ, सेना   और चुनाव आयोग सभी में लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध लोगों के होने, उनके सुरेंद्र मोहन को आवश्यक सूचनाएं देने और सुरेंद्र मोहन द्वारा आवश्यक कदम उठाने के कारण लोकतंत्र की जीत हुई। इंदिरा जी को बार-बार ऐसी कोशिशों से बाज आने के लिए सार्वजनिक तौर पर ललकारने की भी जनता पार्टी की जीत में एक निर्णायक भूमिका थी। जनता की ‘नब्ज’ पहचानने वाले कई वरिष्ठ जननेता 1977 के चुनाव के बहिष्कार के पक्ष में थे। सुरेंद्र मोहन ऐसे लोगों में थे जो शुरु से मानते थे कि चुनावी मैदान में उतरने से ही दूसरी आजादी की जंग जीती जा सकती है। 
1977 के अभियान और जनता पार्टी को चलाने की जिम्मेवारी अन्य तत्कालीन महामंत्रियों, लाल कृष्ण आडवाणी  और रामकृष्ण हेगड़े की भी थी, लेकिन जनता पार्टी के थिंक टैंक-   प्रो. जेडी सेठी, एलसी जैन, प्रो. राजकृष्ण- द्वारा तैयार सामग्री का धारदार इस्तेमाल जिस प्रकार सुरेंद्र मोहन करते थे, उनकी बानगी उन दिनों के समाचार पत्रों को पढ़ कर आज भी जानी जा सकती है। 
 सुरेंद्र मोहन आपातकाल में अगस्त में गिरफ्तारी से पहले भी बिहार आंदोलन के दौरान दो अक्तूबर, 1974 को गिरफ्तार हुए थे और 13 अक्टूबर, 1974 को छूटे। उसके बाद वे कई बार छोटी-छोटी अवधि के लिए सत्याग्रहों में शरीक रहे।
जेल में सुरेंद्र मोहन न केवल खुद स्वाध्याय में अपना समय बिताते थे, बल्कि अन्य साथियों को भी पढ़ने-गुनने की प्रेरणा देते थे। जेल में जिंदादिली से कैसे जिया जाता है, वह सुरेंद्र मोहन और और उनके अन्य साथियों बलवंत सिंह अटकान, सांवल दास गुप्ता, ललित मोहन गौतम और राजकुमार जैन आदि के साथ वालों के लिए आज भी एक मीठी याद जैसा है। 
सुरेंद्र मोहन अपने विदेह भाव के कारण भविष्य में झांकने की अद्भुत क्षमता रखते थे। जो नकारात्मक पूर्वानुमान थे, वे भी सही निकले। जेल में वे समाजवादी पार्टी को किसी बड़ी पार्टी में विलीन कर देने के स्पष्ट रुप से विरोधी थे। उनका मानना था कि जनसंघ, संघठन कांग्रेस और लोकदल के समाजवाद विरोधी तत्व समाजवादियों और समाजवाद के कार्यक्रमों के खिलाफ एक हो जाएंगे। उनकी राय में समाजवादियों को एक फेडरल फ्रंट ही बनना चाहिए, जिससे हमारी समाजवादी पहचान कायम रहे। लेकिन इसे विडबंना ही कहा जाएगा कि जब जेपी ने सभी पार्टियों के विलय को अपने अभियान में शामिल होने की पूर्व शर्त के बतौर रख दिया तो सुरेंद्र मोहन ने ही निस्पृह भाव सभी नेताओं को एक करने और साझे झंडे, चुनाव चिह्न, घोषणा- पत्र और साझे- सामूहिक नेतृत्व को तैयार करने में महत्ती भूमिका निभाई।
कौन आदमी किस कद का है, यह नापने-जानने की भी सुरेंद्र मोहन में अद्भुत  क्षमता थी। आज भी अगस्त 1977 की वह रात याद करके मेरे शरीर में झनझनाहट सी पैदा होती है। जनता पार्टी में विभिन्न घटक कैसे कैसे फिर से टूट सकते हैं, कौन नेता चाल चल सकता है और जनता पार्टी का प्रयोग कैसे अधबीच ही चरमरा सकता है, इस बात को उन्होनें शतरंज की बिसात की तरह चित्रित किया था। दुर्भाग्य से अधिकतर नेताओं ने अपनी चालें ऐसे चलीं तो सामने वाला क्या हारता और क्या जीतता, जनता पार्टी के प्रयोग की गाड़ी जुलाई 1979 में पटरी से उतर गई।
आज भी मेरे लिए यह सवाल अनसुलझी पहेली की तरह है कि जब वे भविष्य के नकारात्मक पहलुओं को इतना स्पष्ट देख लेते थे फिर भी शुभ के लिए, समाजवाद के लिए इतनी निष्ठा, एकाग्रता से कैसे जुटे रहते थे। जीवन के आखिरी क्षणों तक समाजवाद के सांगठनिक ढांचे को फिर से मरम्मत करके खड़ा कर देना है, इसके लिए वैचारिक चौखटे के पुनर्कथन, समाजवादी आंदोलन के विभिन्न संगठनों को चुस्त-दुरुस्त करने और एक साझी, बड़ी और प्रभावी समाजवादी पार्टी बनाने के मिशन में जुटे थे।
सुरेंद्र मोहन चौरासी वर्ष की उम्र में हमसे जुदा हुए। उनके परिवार में सहकर्मी पत्नी, बेटा और बेटी के परिवार ही नहीं, हजारों ऐसे सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, जिनको सुरेंद्र मोहन के जाने से व्यक्तिगत क्षति का आभास हुआ होगा। सामाजिक आंदोलन और उपेक्षित वर्गों के अधिकारों के लिए चल रहे तमाम अभियानों ने भी आज तक ऐसा आघात सहा है, जो कोई पूरा नही कर सकता।
jansatta
 
 
 
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