ताजा खबर
बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
भ्रष्टाचार के खिलाफ फिर आक्रोश

 प्रमोद कुमार

1974 के जयप्रकाश आन्दोलन के 36 साल बाद एक बार फिर भ्रष्टाचार के विरुद्व राष्ट्रीय आक्रोश  अखबारों की सुर्खियां बनने लगा है। इन दोनों दौरों में फर्क सिर्फ इतना है कि 36 साल पहले जहॉं वह भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन एक छात्र आन्दोलन के रुप में विकसित हुआ था, जिसका नेतृत्व जननायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे, वहीं इस बार इस राष्ट्रीय आक्रोश  का उत्स स्वयं सरकारों में बैठे लोग कर रहे हैं। एक तरफ बिहार की गद्दी को दुबारा सम्भालने वाले नितीश कुमार ने भ्रष्टाचार को जड़ मूल से समाप्त कर देने की कवायद प्रारम्भ कर दी है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की सोनिया गांधी  ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये पॉच सूत्री कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार को समाप्त करने की यह सरकारी कवायद अपना कोई रंग दिया सकती है ?
1974 के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करने वाले जय प्रकाश नारायण ने भारतीय संविधान के पिरामिडनुमा चरित्र को उजागर करते हुये उल्टे पिरामिड की परिकल्पना प्रस्तुत की थी। उनके इसी उल्टे पिरामिड की परिकल्पना ने देश भर के प्रतिभावान युवाओं को इस आन्दोलन की तरफ आकर्षित किया था। आश्चर्य नहीं कि शीघ्र ही पूरे देश में एक बार फिर स्वतंत्रता आंदोलन  की तर्ज पर ही एक अभूतपूर्व राष्ट्रीय आन्दोलन प्रारम्भ हो गया जिसने अन्त में केन्द्र की सत्ता से श्रीमती इन्दिरा गान्धी के अजेय वर्चस्व को धूल में मिला दिया था। जयप्रकाश नारायण इस अवसर का लाभ उठाते हुये केन्द्र में उन प्रतिभाशाली युवाओं की सरकार बना कर अपने उल्टे पिरामिड वाली अवधारणा को साकार रुप दे सकते थे। लेकिन इसके स्थान पर उन्होंने उन चूके हुये मोहरों को इकत्रित कर जनता पार्टी की स्थापना कर दी थी जिन्हें श्रीमती इन्दिरा गान्धी पहले ही पीट चुकी थीं। इन पिटे हुये मोहरों की सरकार ने अपने ढाई साल के सरकार में कभी भी भ्रष्टाचार या उल्टे पिरामिड की कोई बात नहीं की थी। इस प्रकार उस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन  की भ्रूण-हत्या ही हो गई थी।
 
जयप्रकाश नारायण के उल्टे पिरामिड की तरफ एक सधा हुआ कदम राजीव गांधी  ने अवश्य उठाया था जब उन्होंने संविधान में 73वां व 74वां सशांेधन कर भारत के स्थाई नौकरशाही की व्यवस्था पर चोट करने का प्रयास किया था। लेकिन इसे लागू करने का समस्त अधिकार राज्य सरकारों को दे देने से इसकी आत्मा ही मर चुकी थी। इसका परिणाम सामने है। देश के लगभग सभी राज्य सरकारों ने अपने अपने स्थानीय निकायों को स्थाई नौकरशाही के नियंत्रण में संचालित करना प्रारम्भ कर दिया। इसने पूरे देश में कमिशन पर आधारित एक अभूतपूर्व भ्रष्टाचार की व्यवस्था विकसित कर दी है। पूरी लोकतांत्रिक दुनिया के किसी भी देश में आज स्थानीय निकाय नौकरशाही के नियंत्रण में कार्यरत नहीं हैं। आज जो हाल भारत का है वही हाल 20वीं सदी के पहले दशक में अमरीका का भी था। उस समय वहॉ भी स्थाई नौकरशाही ;रिजर्व सिस्टमद्ध की व्यवस्था लागू थी तथा पूरे देश में पॉच प्रतिशत कमिशन का भ्रष्ट शासन स्थापित था। लेकिन उन्होंने उसी समय उस रिजर्व नौकरशाही के स्थान पर अस्थाई नौकरशाही  ;स्पॉयल सिस्टमद्ध लागू कर इससे मुक्ति पा ली थी। सवाल यह है कि क्या भारत में स्थाई नौकरशाही की इस गैर-सैद्वान्तिक व्यवस्था को जारी रखते हुये भ्रष्टाचार के वर्तमान शैतानी माहौल से राहत सम्भव है।
इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है कि आज केन्द्र सरकार की सर्वे-सर्वा सोनिया गान्धी तथा बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार स्वयं भ्रष्टाचार के विरुद्व फार्मूले पर फार्मूले सुझा रहे हैं और भ्रष्टाचार का बाल भी बांका नहीं हो पा रहा है। क्या इन दोनों महान नेताओं को नहीं मालूम है कि भारत में चल रहे ‘‘उत्तरदायित्व व अधिकार’’ के दोहरे शासन को समाप्त किये बिना इस राह में कोई बदलाव सम्भव नहीं है। इस दिशा में नितीश कुमार द्वारा विधायक निधि को समाप्त करने का निर्णय एक सैद्वान्तिक निर्णय है जिसका आशाजनक परिणाम अवश्य सामने आएगा। यह छोटा सा निर्णय तो सानिया गान्धी भी तत्काल ले सकतीं थी तथा सांसद निधि को समाप्त करने की दिशा में पहल कर सकती थीं। यदि ऐसा होता तो थोड़ी उम्मीद तो बंधती कि वास्तव में उनकी सरकार भी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के प्रति कुछ ईमानदार तो है। भ्रष्टाचार के विरुद्व आवाज उठाने वाले इन नेताओं को इतना भी नहीं मालूम है कि विधायक व संासद का कार्य केवल कानून बनाना और संशोधित करना होता है। इन्हे विकास से जोड़ देने का ही परिणाम है कि आज विधायक व संासद के चुनाव इतने महगें हो गये हैं। इन्हें जानना चाहिये कि जब तक विकास कार्य को पूरी तरह से स्थाई नौकरशाही से मुक्त स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी नहीं बनायी जाएगी तथा विधायकों और संासदों को केवल कानून बनाने व संशोधित करने तक सीमित नहीं किया जाएगा, भ्रष्टाचार के इस सर्वव्यापी शैतानी माहौल पर थोड़ा भी अंकुश सम्भव नहीं है।
 
भारत से भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करना फिलहाल एक सपना ही है। वास्तव में, इसकी जड़ हमारी उस व्यवस्था में है जो कार्यपालिका और विधायिका के अन्तर को महत्वहीन बनाये हुये है। हमारे यहॉ कानून को बनाने वाले को ही उस कानून को लागू करने का भी अधिकार मिला हुआ है। जो बात इस दुनिया ने 1789 में फ्रांस की क्रान्ति के समय ही समझ ली थी कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधि को मंत्री बनाया जाएगा तो भ्रष्टाचार होगा वह बात हम आज तक नहीं समझ पाये हैं और हमने अपने संविधान में अभी भी यह व्यवस्था बनाये रखी है कि निर्वाचित विधायक व सांसद को ही मंत्री बनाया जाएगा और यदि वह निर्वाचित नहीं है तो आगामी छः माह में निर्वाचित हो जाए। देखना यह है कि भारत की जनता को उस दल की प्रतीक्षा कबतक करनी होगी जो विधायिका व कार्यपालिका के इस विसंगति को समाप्त करने की दिशा में पहल करेगा तथा निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के मंत्री बनने पर रोक लगा कर भ्रष्टाचार के इस सर्वव्यापी शैतानी माहौल को समाप्त करने की दिशा में एक कदम उठाएगा? 
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • मीडिया में धूमते चेहरे
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.