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फिर तेली कूर्मि भाई-भाई का नारा

 यशवन्त धोटे

दुर्ग, अप्रैल। छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के बैनर तले लोकसभा चुनाव लड़ रहे  निवृतमान सांसद ताराचन्द साहू को जिले भर से अनुसूचित जाति जन जाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगो से मिल रहे स्वस्फूर्त समर्थन से दोनो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों व रणनीतिकारों को मानों सांप सा सूंघ गया हों। स्वाभिमान मंच की रैली के लिए ताराचन्द के बंगले पर लगने वाली भीड़ का अंदाजा स्वंय ताराचन्द को भी नही हैं। बकौल ताराचन्द ऐसा समर्थन उन्हे 20 साल के राजनीतिक जीवन में कभी नही मिला। दरअसल पिछले तीन दशकों से पिछड़े वर्ग के खाते में रही इस लोकसभा सीट को बचाने का जिम्मा ताराचन्द के मार्फत जिले की जनता ने लिया हैं। 
गौरतलब हैं कि भाजपा ने तेज तर्रार महिला विधायक व महापौर सरोज पांडे को व कांग्रेस ने तेजतर्रार नेता प्रदीप चौबे को मैदान में उतारकर जातिवाद का मिथक तोड़ने की कोशिश की हैं। पार्टीगत आधार पर देखे तो कांग्रेस के संगठन का कोई माई बाप नही हैं और भाजपा संगठनात्मक आधार पर काफी मजबूत हैं। स्वाभाविक तौर पर ऐसी स्थिति में भाजपा प्रत्याशी सरोज पांडे प्रचार प्रसार के लिहाज से सबसे आगे चल रही हैं। दूसरी ओर माउथ पव्लिसीटी में ताराचन्द साहू सबसेआगे चल रहे है जबकि कांग्रेस हर लिहाज से पिछड़ गई हैं। ताराचन्द साहू का स्वाभिमान मंच तीनों राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के लिए कितने नफे और नुकसान का हो सकता हैं। इस पर राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के रणनीतिकारों की भी पैनी निगाहे हैं। दरअसल इन दलों की चिन्ता यह हैं कि अब तक ताराचन्द की रैलियों में भीड़ भर जुटती थी लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा के बाद अब लोग उनसे सीधे जुड़ गये हैं। पिछले तीन महिने से स्वाभिमान मंच के बैनर तले अपने लोकसभा क्षेत्र की खाक छान चुके ताराचन्द का आत्मविश्वास बोलता है कि वे पिछले चुनावों की लीड़ बरकरार रखेंगे। 
ताराचन्द की अतीत के बारे में बात करने से पहले उनके प्रतिदवन्दी प्रत्याशियों के राजनीतिक अतीत पर भी एक नजर डालनी होगी। 1990 में भाजपा के रायसभा सासंद शत्रुध्न सिन्हा की आमसभा में कांग्रेस से भाजपा में आई सरोज पांडे ने अपने 20 साल के राजनीतिक कैरियर में किसी भी मुकाम पर असफलता नही पाई। अपने च्लेमर और तीक्ष्ण बुद्दि के बूते दो बार महापौर और एक बार विधायक चुनने के बाद वे सीधे लोकसभा की प्रत्याशी बन गई हैं। संगठन में राष्ट्रीय मंत्री, प्रवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पद पर वे अब भी है हालांकि उनकी ही पार्टी में उनके विरोधी इसकी शिकायत करते रहे है कि एक ही महिला को और कितने पद दिये जाए। राजनीतिक सूत्रों की यदि माने तो सम्पन्न विधानसभा चुनाव में भिलाई के पूर्व विधायक प्रेमप्रकाश पांडे को हराने के लिए ताराचन्द और सरोज पांडे के गठबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण रही। यह बात अलग है कि वैशाली नगर में भी सरोज पांडे को हराने के लिए प्रेमप्रकाश पांडे ने भी कोइ कसर बांकि नही रखी। लेकिन हारे प्रेमप्रकाश और ठीकरा फूटा ताराचन्द के सर। उन्हे पार्टी से निकाला और ताराचन्द ने छत्तीसगढ़ी और गैर छत्तीसगढ़ी,आतंक राज का जो अस्त्र प्रेमप्रकाश के लिए विधानसभा चुनाव में उपयोग किया था  वही अस्त्र लोकसभा चुनाव में पिछले तीन महिने से सरोज पांडे के लिए उपयोग कर रहे हैं। वे स्वाभिमान मंच के मार्फत सरोज को बाहरी बता रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप चौबे का राजनीतिक अतीत उनके जीत में रोड़े अटकाता रहा हैं। 1999 में इसी ताराचन्द के सामने मैदान में प्रदीप चौबे ,, तेली कूर्मी ,, गठजोड़ के शिकार हो गये थे । हालाकि पिछड़ा वर्ग की राजनीति करने वाले नेता स्व.वासुदेव चन्द्राकर अब नही रहे लेकिन उनका बोया बीज अब पौधा बन गया हैं। कमोबेश वैसी ही स्थिति इस बार आ गई हैं। चौबे के नाम की घोषणा होते ही ,, तेली कूर्मि -भाई भाई,, का यह नारा फिर बुलन्द हो गया हैं। दरअसल इस चुनाव में अखिलभारतीय कांग्रेस कमेटी को कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रविन्द चौबे की प्रतिष्ठा दाव पर लगी हुई हैं। अजीत जोगी को ठेगा दिखा चुके रविन्द्र चौबे अपने अग्रज को जिताने में कितने कामयाब होते हैं यह समय के गर्भ में हैं।  
अजीबोगरीब बात यह है कि  पिछड़े वर्ग की इस मुहिम इसकी अगुआई कोई नेता नही बल्कि स्वंय जनता कर रही हैं। ठीक उसी तरह जैसी बस्तर की जनता नक्सलवाद के खिलाफ सलवा जूडूम चला रही हैं। राजनीतिक हल्कों में इस मसले को भी जमकर प्रचारित किया जा रहा हैं कि यदि सरोज पांडे लोकसभा में पंहुच जाती हैं तो वैशालीनगर से प्रेमप्रकाश पांडे चुनाव लड़कर विधानसभा पंहुचेगें और सरकार ने मंत्री मंडल में ब्राम्हण के लिए जो एक पद सुरक्षित रखा हैं उस पर प्रेमप्रकाश पांडे विराजेंगे। लेकिन भाजपा का संगठन खेमा इस तर्क को सिरे से खारिज कर रहा हैं। ताराचन्द साहू के राजनीतिक अतीत पर यदि नजर डाले तो उनका उनका संसदीय कार्यकाल संगठन स्तर पर विवादों से घिरा रहा। वे पार्टी से यादा अपने सामाजिक वोट बैंक को मजबूत करते रहे और समय समय पर पार्टी का व्हीप फाड़ते रहे। इसके बावजूद वे हर बार चुनाव जीतते रहे और पार्टी उन्हे झेलती रही। राय बनने के बाद ही पहले प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बने और उनके ही कार्यकाल में पार्टी टूट गई। भाजपा के 13 विधायक पार्टी छोड़ गये। लेकिन उनका स्वाभिमान तब जागा जब उन्हे पार्टी से निकाला गया। और उनकी धूर विरोधी सरोज पांडे को ने टिकिट दिया । उनका चुनाव प्रचार तो पिछले तीन महिने से हो रहा है लेकिन उनके लिए चुनौती यह है कि वे अपना चुनाव चिन्ह ,,नगाडा,, मतदाताओं के बीच इतनी जल्दी कैसे पहुचा पाएंगे। 
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