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जिन्हें जंगल जिंदा रखता है

 रोमा

अधिकांश जंगल क्षेत्रों में बसे आदिवासी समुदाय आज भी अपने बलबूते पर ही जिंदा  हैं किसी सरकार के रहमोकरम पर नहीं । यूं तो इस सच्चाई से देश के किसी भी जंगल क्षेत्र में इनके बीच जाकर बड़ी आसानी से रू-ब-रू हुआ जा सकता है, लेकिन बिहार के कैमूरक्षेत्र में आने वाले भभुआ जिले के अधौरा ब्लाक का नाम इसके एक जीवन्त उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है।
( कैमूर ) भभुआ जिले का अधौरा ब्लाक, जो कि एक पहाड़ी पर बसा बेहद ही खूबसूरत वनाच्छित इलाका है सरकारी विकास की किरणों से आज तक कोसो दूर है। जिसे आज़ादी के बाद से आजतक तमाम सरकारों ने हमेशा नज़रअन्दाज़ किया है। वे कैसे अब तक ज़िन्दा बचे हुये हैं, ये अपने आप में एक हैरतअंगेज़ बात है। हांलांकि प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतिश कुमार कभी यह कहते हुये नहीं थकते कि ‘बिहार जो आज सोचता है, बाकी देश वो कल सोचता है‘। लेकिन बिहार का कैमूर वाला यह हिस्सा जैसा आज़ादी से पूर्व था, आज भी वैसा ही है। यहां किसी तरह का कोई सुधार नहीं हुआ है। जबकि बिहार के इस छोटे से हिस्से में बड़ी मात्रा में बेशकीमती जंगल व अमूल्य प्राकृतिक सम्पदा है। इस छोटे से क्षेत्र का अवलोकन करने पर बिहार की तरक्की को लेकर सरकारों द्वारा किये जा रहे दावों की कलई खुलती ही नज़र आती है। देश में एक बेहद ही महत्वपूर्ण कानून अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत ( वनाधिकारों को मान्यता ) कानून 2006 पारित हो जाने के 4 वर्ष बीत जाने के बाद आज तक इस कानून को इस क्षेत्र में लागू तक नहीं किया गया है। अभी भी यहां सांमतों, वनविभाग व माओवादियों की ही चलती है। लेकिन यहां के आदिवासी इस चुनाव से राजनैतिक पार्टीयों से तो सवाल करेंगे  ही पर माओवादियों से भी सवाल करेगें कि आखिर उनके विकास में तमाम रोड़े क्यों अटकाये जा रहे है। 
बिहार का जिला कैमूर, उ0प्र0 का जिला सोनभद्र व झाड़खंड का जिला गढ़वा से जुड़ा आदिवासी बाहुल्य और प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपुर इलाका है। इन तीनों इलाकों में देखा जाये तो यहां की बेशकीमती प्राकृतिक सम्पदा के दोहन के लिये ही विकास किया गया, ना कि यहां के लोगों के लिये। यहां रहने वाले आदिवासियों और अन्य गरीब तबकों की हर तरह से उपेक्षा ही की गई है।  
आज यहां पर आदिवासियों का टकराव सीधा सरकार से है, जो कभी वहां के स्थानीय दबंगों के साथ हुआ करता था। यहां के एक आदिवासी रामरूप  का कहना है कि ‘देश आज़ाद हुआ तो हुआ होगा, हमें तो अभी तक आज़ादी नहीं मिली है‘। यह आवाज़ केवल रामरूप की ही नहीं है, आज देश के तमाम वनक्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और अन्य वनाश्रित तबके मुखर होकर सरकारों से यही सवाल कर रहे हैं। इन समुदायों के लिये सरकार कितनी चिन्तनशील है यह सरकारों द्वारा आज़ादी के बाद से लेकर अब तक सरकारों द्वारा बनायी गयी नीतियों से और बनायी भी गयी हैं तो उनको लागू करने की स्थिति को देखने से स्पष्ट हो जाता है। कैमूर इसका जीता जागता उदाहरण है। 
कैमूर की प्राचीनतम पर्वतमालाओं के घनघोर जंगलो में एक समय सिर्फ आदिवासियों का ही राज हुआ करता था। अंग्रेज़ों के यहां आने से पहले तक इन जंगलों पर कोई बाहरी ताकत कब्जा नहीं कर पायी थी। यहां के इतिहास को अगर देखें तो यहां चन्देलों और राजपूतों ने अपने महल जरूर बनाये, लेकिन वे कभी इन जंगलों के मालिक नहीं बन पाये थे। जंगलों का असली मालिक हमेशा यहां का आदिवासी समाज ही रहा। इसके अलावा यहां के जंगल व ज़मीन किसी की व्यक्तिगत मिल्कियत भी नहीं रहे। अंग्रेजों ने भी अपना राज कायम करने के बहुत बाद इस इलाके में अपने कदम रखे। उसके बाद वनों का दोहन करने के लिये राज्य के अधीन करने का काम करके अंग्रेजों ने आदिवासियों को अपने घरों में ही बेगाना  कर दिया। अंग्रंजों की बनाई गई जमींदारी प्रथा के तहत राजा के साथ एक नया करारनामा  करके इन क्षेत्रों को रियासतों व जमीदारों के अधीन कर दिया। 
आज़ाद भारत में भी देश के आजाद होने के साथ ही नेशन-स्टेट यानि राष्ट्र-राज्य की अवधारणा  को लेकर किये गये नये राज्यों की स्थापना के समय में आदि काल से बने कैमूर जैसे अपने आप में एक नेशन को इस नये मिथक नेशन स्टेट ने दो राज्यों  उ0प्र0 और बिहार में अलग-अलग करके बांट दिया। अंग्रेजी शासन काल के पूर्व से ही यह इलाका वृहद झाड़खंड के नक्शे में था, लेकिन इस इलाके की भरपूर प्राकृतिक सम्पदा, खनिज व राजस्व की बंदरबांट दो राज्यों उ0प्र0 व बिहार में होती थी। इस बंटवारे में जो इलाका झाड़खंड में होना चाहिये था, वो सन् 2000 तक बिहार के नियंत्रण में रहा। झाड़खंड़ राज्य  के आस्तित्व में आने के बाद भी कैमूर वाला हिस्सा बिहार में ही छोड़ दिया गया। उ0प्र0 के तीन जिलों सोनभद्र, मिर्जापुर व चन्दौली में आने वाला कैमूरक्षेत्र आज़ादी के बाद अपने अस्तित्व में आने के समय से ही खून के आंसू रो रहा है। आज़ादी के वक्त इन इलाकों को केवल राजस्व अर्जित करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के इरादे से ही पूरे कैमूर क्षेत्र को बांट दिया गया। यहां की प्राकृतिक सम्पदा का ठीक उसी तरह से दोहन किया गया जैसा कि अंग्रेजी शासनकाल में होता रहा था। सरकारों द्वारा दोहन की यह पूरी प्रक्रिया राष्ट्र के विकास के नाम पर चलाई गयी, जो कि ना सिर्फ कैमूर में बल्कि पूरे देश में धड़ल्ले से चलाई गयी। इस तरह से आदिवासी समाज के साथ सबसे बड़ा धोखा आज़ादी के वक्त ही किया गया। आज़ादी की लड़ाई में  साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ सिधु-कान्हु, तिलका माझी, बिरसा़मुण्डा आदि अनेकों आदिवासियों के नेतृत्व में किये गये संघर्षों की एवज़ में राष्ट्र-राज्य के मिथक के तहत नयी नीतियां बनाकर इनके सभी मूल अधिकारों को इन नीतियों में ही समाहित कर दिया गया और पूरी शासन व्यवस्था उनके हाथों मंे चली गयी, जिन्होंने इन राज्यों को मेज पर बैठे-बैठे नक्शों की कुछ लकीरें खींचकर विभाजित करने का काम किया था। 
हालांकि कैमूर क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य होने के कारण इसे पॉचवी अनुसूचि के तहत घोषित किया जाना चाहिये था, लेकिन सरकारों द्वारा यह भी नहीं किया गया। ये अलग बात है कि इस क्षेत्र के भी पॉचवी अनुसूचि में दर्ज होने के बाद भी यहां के हालात में कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं था। चूंकि देश के अन्य पॉचवी अनुसूचि में घोषित किये गये क्षेत्रों में भी आदिवासी समुदाय अभी तक सरकारी  उपेक्षा के शिकार ही हैं। 
इन क्षेत्रों में एक लम्बे समय से काम कर रहे जनसंगठन जैसे; भारत जन आंदोलन, जन मुक्ति आंदोलन आदि कैमूर की स्वायत्तता, कैमूर की भौगोलिक स्थिति, संस्कृति व भाषा शैली आदि के मुद्दों पर इसके व आदिवासी बाहुल्य इलाका होने के कारण लगातार सवाल उठाते रहे हैं और इस क्षेत्र को संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल करने की मुहिम चलाते रहे हैं। लेकिन सरकारों ने इस ओर आज तक कोई ध्यान नहीं दिया। उदाहरण के तौर पर अगर उरांव झाड़खंड़ में अनुसूचित जनजाति में घोषित हैं तो उत्तर प्रदेश में उन्हें अनुसूचित जाति में घोषित किया गया है। यही स्थिति कोल और कुछ अन्य जनजातियों की भी है। किन जनजातियों की कहां किस रूप में घोषणा की जानी है, ये तय करने के पीछे भी सरकारों की राजनैतिक चाल ही रही। क्योंकि इन इलाकों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर दिये जाने से यहां की प्राकृतिक संपदा का दोहन नहीं किया जा सकता था और न ही फिर यहां राष्ट्रीय विकास के नाम पर बड़े-बड़े बांधों, कोयला खदानों और अन्य खदानों को स्थापित करने के लिये रास्ता खुल सकता था। दरअसल इन नीतियों को लागू ही इस लिये किया गया था, कि वनसम्पदा और खनिज के भंडार से परिपूर्ण देश के तमाम आदिवासी क्षेत्र राजसŸाा के ही नियंत्रण में रहें। 
आदिवासियों द्वारा दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ जो गौरवमयी संघर्षों का इतिहास रचा गया, उसकी पहचान आजादी के बाद हुये सत्ता के हस्तांतरण में पूरी तरह से गुम होकर रह गयी। जबकि देश के संविधान में इन तबकों के लिये कई तरह के प्रावधान किये गये थे। इनके विकास के लिये, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करके इन क्षेत्रों का समग्र विकास किये जाने के लिये संविधान में जबकि पूरी व्यवस्था दी गयी है। लेकिन आधुनिक भारत व राष्ट्र- राज्य की अवधारणा में आदिवासियों की कभी कहीं गिनती ही नहीं की गई और न ही इन क्षेत्रो की महŸाा पर ध्यान दिया गया। सरकारों को ज़रूर लगता रहा है कि राष्ट्र का विकास आदिवासियों के विकास के बिना ही संभव है, इसलिये आज़ादी के समय से ही राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को केन्द्र में रखकर ही विकास का पैमाना तय किया गया। आदिवासी क्षेत्रों में ही नव राष्ट्र निर्माण के मंदिर यानि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में विकास के मंदिरों बड़े बांध, बिजली परियोजनाऐं, औद्योगिक नगरों आदि के निर्माण को ही विकास का पैमाना बनाया गया। यही परिदृश्य कैमूर के आदिवासी इलाकों में भी दिखाई देता है। उ0प्र0 कैमूर का जिला सोनभद्र तो औद्योगिक नगर के रूप में ही जाना जाता है, यहां केवल दो ही वर्ग दिखाई देते है एक सभी तरह से सम्पन्न सामंत और पूंजीपति वर्ग और दूसरा दो जून की रोटी को भी तरसता वंचित वर्ग। यहां की पहचान कोयला खदानों, उर्जा संयंत्रों, एल्यूमीनियम हिंडालको कारखाना, पत्थर खदानें, बालू खदानें, सीमेंट कारखाना ही रह गई है। वनों और प्राकृतिक संसधानों से जुड़े आदिवासियों के जीने का आधार जो जंगल बचे थे, उनको भी वनविभाग के अधीन कर दिया गया। यही स्थिति कमोबेश कैमूर के अन्य क्षेत्रों की भी बनी हुई है। 
आदिवासी समुदाय कभी किसी सत्ता के भरोसे नहीं जिये। अनादिकाल से ही उन्होंने अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहते हुये स्वयं नये-नये अविष्कार किये हैं। आज़ादी के बाद भी वे अपना विकास स्वंय ही कर लेते अगर आज़ादी के समय भूमि सुधार कानूनों को सही तरीके से लागू कर उन्हें उनके जंगल सौंप दिये जाते। लेकिन वनों के अंदर उपनिवेशिक हितों को ही बरकरार रखते हुये आज़ाद भारत की सरकार ने संविधान की मंशा के खिलाफ वनविभाग को ही देश का सबसे बड़ा ज़मींदार बना दिया। गौर तलब है कि एक तरफ आज़ादी की लड़ाई में खास तौर पर उ0प्र0 और बिहार में जमींदारी उन्मूलन एक बहुत बड़ा मुददा था। लेकिन इन दोनेां प्रदेशों में जमींदारी विनाश कानून और भूमि सुधार कानून के लागू होने से पहले ही आज़ादी के महज एक वर्ष बाद सन् 1948 में बिहार व उ0प्र0 प्राईवेट वन कानून बनाकर दोनांे राज्यों की विधान सभा में पारित किया गया। जिसके तहत रियासतों, जमींदारों के अंतर्गत आने वाले वनों को बिना लोगों के हक हकूक निर्धारित किये इन वनों की देखरेख के  नामपर वनविभाग के अधीन करके अघोषित रूप से वनों का स्वामी बना दिया गया। भूमि सुधार कानूनों को बनाने में राज्यों को पांच वर्ष लग गये व अंततः 1952 में भूमि सुधार कानून तो बना लेकिन इसे लागू होने में दोनों राज्यों में कई वर्ष लग गये। ज्ञातव्य हो कि जिन  वनों या वनभूमियों को प्राईवट वन कानून के तहत वनविभाग के अधीन किया गया वे सब राजस्व विभाग की ज़मीनें थी। अंग्रेज़ों ने 1864 में वनविभाग नाम की संस्था बनाकर इसे उपनिवेशिक फायदों के लिये स्थापित किया था। भूमि सुधार कानूनों के अंतर्गत वनविभाग को भूमि हस्तांतरित करने का कोई भी प्रावधान नहीं है, फिर भी प्रदेश सरकारों ने गजट नोटिफिकेशन कर ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक उपयोगो की भूमि, ग्राम वन, पत्थर, चटट्ान, बंजर भूमि, झाड़ झाड़ीयां, आखेट, रियासतों व जमींदारों के द्वारा आखेट के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले जंगलों को भारतीय वन अधिनियम-1927 के अधीन अर्जित कर लिया। पहले प्राईवेट वन कानून बनाकर इन्हें संरक्षित वन की श्रेणी में डाला गया, फिर भारतीय वन कानून-1927 बनाकर इस कानून की धारा 4 के तहत अर्जित कर लिया गया। जोकि गैर कानूनी और गैर संवैधानिक था। एक तरफ भूमि सुधार कानून बनाये गये और दूसरी तरफ एक अलग प्रक्रिया व उपनिवेशिक कानून को लागू कर जंगलों को भूमि सुधार की प्रक्रिया से अलग रखा गया व केन्द्रीय कानून के तहत रखा गया। वनविभाग के पास देश की कुल 23 प्रतिशत भूमि का कब्ज़ा है। सन् 1980 तक आते-आते इन तमाम भूमियों को बिना बन्दोबस्त किये आरक्षित वनों की श्रेणी में डाल दिया गया। यहीं भूमि विवाद आने वाले दिनों में आदिवासियों और राज्य के मध्य टकराव के मुख्य कारण बने। कैमूर में यह विवाद बेहद ही पेचीदा हैं, जिनका भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति और जाति आयुक्त की 28वीं और 29वीं रिपोर्ट में विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। 
वनविभाग की लूट को वैधानिकता की मोहर लग गयी और जंगल की वनोपज जिसपर आदिवासियों का गुज़ारा चलता था, उनको हकों से सुविधा में तब्दील कर दिया गया, जो कि सन् 1990 तक आते आते समाप्त ही कर दिये गये। देखा जाये तो दोनों राज्यों में लाखों है0 भूमि पर वनविभाग का अवैध कब्ज़ा है। कैमूर जैसे इलाके में सांमतों, पुलिस, वनविभाग, माफियाओं और राजनेताओं के गठजोड़ ने आदिवासियों और दलितों का जीना मुहाल कर दिया है, इन इलाकों में आज भी थाने सांमतों द्वारा ही संचालित किये जाते हैं। यहीं वजह रही कि सन् 1990 के बाद से इस क्षेत्र में हथियार बंद संगठनों का दख़ल हुआ और पहली टक्कर सांमतों से हुई व पहली बार ही सांमती ताकतों के वर्चस्व को चुनौती मिली।    
लेकिन यह हथियार बंद संगठन भी अपने गैर जनवादी तौर-तरीकों के कारण  अलगावाद के शिकार हैं। इन संगठनों के केन्द्र में वंचित तबका नहीं है और न ही उनसे जुड़े भूमि व वन के मुददे हैं। उनके लिये मुख्य केन्द्रबिन्दु सरकार है और वे हिंसा से  ही सभी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। इसलिये देखा जाये तो इन इलाकों के वंचित तबकों के अंदर भी आज इन हथियार बंद संगठनों की कोई मज़बूत पकड़ नहीं रही है। ये संगठन एक दस्ते की तरह इन क्षेत्रों में भ्रमण कर रहे हैं। जबकि इन क्षेत्रों में जनवादी संगठन ज्यादा मजबूत हैं और उनका फैलाव बड़ी तेज़ी से हो रहा है। वंचित समुदायों के अंदर जिस तरह की राजनैतिक चेतना का संचार हो रहा है, उससे सरकार काफी भयभीत है तथा इन सभी जनवादी संघर्षो को माओवादी गतिविधियों की संज्ञा देकर इनका दमन करने में लगी हुई है। 
आज़ादी के बाद से लेकर आजतक सरकारों द्वारा अपनाई गई आदिवासी विरोधी नीतियों के कारण पूरे कैमूर क्षेत्र में अन्दर ही अन्दर एक जबरदस्त ज्वालामुखी फूटने के लिये तैयार हो रहा है, पिछले एक दशक से लगातार चल रहे यहां के संघर्षों में जिसकी झलक भी दिखाई दे रही है। लेकिन इसका अंदाज़ा शायद सरकारों को नहीं है। इन इलाकों में आज ये संघर्ष  बहुत ही व्यापक रूप ले चुके हैं। इन्हीं संघर्षो की देन है कि पिछले एक दशक के दौरान यहां के आदिवासियों और दलितों ने अपनी छिनी हुई हजारों हैक्टेयर भूमि पर अपना पुनर्दखल कायम किया है। यह दखल न तो किसी राजनैतिक पार्टी के भरोसे किया गया और न ही माओवादी संगठनों के भरोसे किया गया है। सरकारों द्वारा इन इलाकों की उपेक्षा का हिसाब-किताब लेने के लिये अब आम जनता लामबंद हो रही है, जिसकी अगली कतार में हैं-  महिलाए और नौजवान।
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