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अभी भी कायम है राजशाही !

 प्रमोद कुमार

शायद ही भारत के किसी नागरिक को अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ईमानदारी पर कोई सन्देह हो। लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि उनके जैसे ईमानदार प्रधानमंत्री के शासनकाल में ही इस देश ने भ्रष्टाचार के उन सभी सीमाओं को पार कर लिया है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है और किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है। वास्तव में, हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह संकट ईमानदार व बेईमान नागरिकों का नहीं बल्कि ईमानदार व बेईमान व्यवस्था का संकट है। सच्चाई यह है कि हमारी यह व्यवस्था ही बेईमानी की नींव पर खड़ी की गई है जिसमें व्यक्ति की ईमानदारी पर व्यवस्था की बेईमानी हमेशा  भारी पड़ती रहेगी।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी बेईमानी यह है कि हम जिसे जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री मान रहे हैं वह वास्तव में जनता द्वारा नामांकित राजा है। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहॉ जनता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को नहीं राजा को निर्वाचित करती है। इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि यहॉं आजादी के बाद से ही अधिकांशतः राज्यों में सदैव मुख्यमंत्री नामक राजाओं का उनके दलों के हाईकमान द्वारा नामांकन होता रहा है और उसकी चरम सीमा अब यहॉ तक आ पहुंची  है कि स्वयं प्रधानमंत्री नामक राजा का भी नामांकन होने लगा है। आधुनिक विश्व में शायद ही कहीं इस प्रकार का लोकतंत्र कायम हो। 
अर्ािरहवीं सदी में पहली बार मान्तेस्क्यू ने राजा का विकल्प प्रस्तुत किया था। उसके अनुसार राजा वह होता है जो कानून को बना सके, अपने बनाये कानूनों को लागू कर सके तथा यह देख सके कि उसका कानून ठीक से लागू हो रहा है कि नहीं। इसी को उसने विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का नाम दिया था। इन्हीं तीनों संस्थाओं को उसने राजा का विकल्प बताया था। मान्तेस्क्यू के इस स्थापना के बाद जहॉ कहीं भी राजा और जनता में संघर्ष हुआ या क्रान्तिया हुई वहॉ-वहॉ राजा के स्थान पर यही विकल्प स्वीकार किया गया। अर्थात उन देशों में जनता द्वारा निर्वाचित विधायिका केवल कानूनों को बनाने व संशोधित करने का कार्य करती है। कानूनों को लागू करने में उसकी कोई भूमिका नहीं होती है। यह कार्य कार्यपालिका करती है जिसका सीधा निर्वाचन जनता अलग से करती है। कानूनों के निर्माण व संशोधन तथा उसके लागू किये जाने की प्रक्रिया पर अंकुश रखने का कार्य जनता द्वारा स्वतंत्र रुप से निर्वाचित न्यायपालिका करती है। यह तीनों सस्थाएं एक दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र होने के साथ-साथ एक दूसरे पर नियंत्रण रखने का कार्य भी करती हैं।    
इसके विपरीत भारत में आजादी के बाद जो संसदीय व्यवस्था स्वीकार की गई उसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के अधिकारक्षेत्रों तथा एक वास्तविक राजा के अधिकारक्षेत्र में कोई अन्तर नही होता। हमारे देश का प्रधानमंत्री संसद में बहुमत होने के कारण एक राजा की भॉति ही जो चाहे कानून बना सकता है; तथा इस बहुमत के कारण ही उसे प्रधानमंत्री के रुप में अपने बनाये कानूनों को लागू भी करने की जिम्मेदारी होती है; तथा काबीना के मुख्यिा के रुप में वह न्यायपालिका का भी मुखिया बन जाता है। इस प्रकार भारत का प्रधानमंत्री वास्तव में एक राजा के समस्त अधिकार क्षेत्रों का स्वामी होता है। उसे कहा तो प्रधानमंत्री जाता है परन्तु होता वह राजा ही है। यही बात प्रान्तों के मुख्ष्मंत्रियों के बारे में भी कही जा सकती है। 
इस व्यवस्था का एक और बड़ा मजाक यह है कि यहॉ अधिकांशतः मुख्यमंत्री रुपी प्रान्तीय राजाओं का अपने-अपने दलों के हाई कमानों द्वारा नामांकन करने की ही परम्परा रही है। परिणामस्वरुप, ऐसे प्रान्तों को कभी भी अपना वास्तविक प्रतिनिधि निर्वाचन के द्वारा नहीं प्राप्त हो सका है। उदाहरणस्वरुप, देश के सबसे बड़े प्रान्त उत्तर प्रदेश को आजतक मुलायम सिंह यादव व सुश्री मायावती के अतिरिक्त कोई भी वास्तविक निर्वाचित मुख्यमंत्री नहीं मिला है। यह सच्चाई केवल कांग्रेस और भाजपा शासित राज्यों की नहीं रही है बल्कि 1977 में जब पहली बार केन्द्र में जनता पार्टी बनी थी तब उसने भी अपने प्रान्तों में मुख्यमंत्रियों का नामांकन ही किया था। उस समय उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव को मुख्यमंत्री नामांकित किया गया था। और तो और इस समय भारत का जो प्रधानमंत्री रुपी राजा मिला है वह भी निर्वाचित नहीं नामांकित है। 
पूरे राजतंत्र के इतिहास में महान राजाओं की उपलब्धियों का यदि अध्ययन किया जाए तो उसमें एक भी ऐसा राजा नहीं मिलेगा जिसे राजा का पद नामांकन से मिला हो। विश्व इतिहास में किसी को भी राजा का पद केवल युद्वों, उत्तराधिकारों या षडयंत्रों से ही मिलता रहा है। लोकतंत्रों के विकास ने जब राजतंत्र को समाप्त कर दिया तब केवल संवैधानिक राजतंत्र वाले देशों जैसे ब्रिटेन आदि को छोड़कर शेष सभी ने राजाओं को अन्तिम प्रणाम कर लिया। ब्रिटेन जैसे देशों में भी राजा है तो लेकिन वह शासन नहीं करता। आज की तारीख में अकेला भारत ही एक ऐसा देश है जहॉ राजा नाम का जीव तो नहीं पाया जाता लेकिन राजतंत्र की व्यवस्था पूरी तरह मुक्कमल है। सुनने में बहुत अजीब लगेगा लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में सही अर्थों में न केवल राजतंत्र कायम है बल्कि यहॉ प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री नामधारी राजाओं का नामांकन तक होने लगा है।
जबतक फ्रांस के महान दार्शनिक मान्तेस्क्यू की सुप्रसिद्व रचना ‘‘स्प्रिट ऑव लॉज़’’ जबतक प्रकाशित नहीं हुई थी इस दुनिया को राजा का विक्ल्प नहीं मालूम था। यही कारण है कि सत्रहवीं सदी के ब्रिटेन में जब राजा और संसद के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हुआ तथा गृह-युद्व के बाद राजा को मृत्युदण्ड दे दिया गया तब उनके पास सैनिक शासन व तानाशाही के अतिरिक्त अन्य कोई विक्लप शेष नहीं था। उस सैनिक शासन से शीघ्र ही उब  चुके ब्रिटेन के लोगों ने इसी लिये पुनः राजा को स्थापित कर संवैधानिक राजतंत्र की व्यवस्था कायम कर दी थी। ब्रिटेन में यह व्यवस्था आज भी इसलिये सफलतापूर्वक कार्य कर रही है क्योंकि ब्रिटेन एक अत्यन्त छोटा देश है और यहॉ प्रान्तीय सरकारें भी नहीं हैं। मुख्यमंत्रियों की यहॉ आवश्यक्ता ही नहीं है और प्रधानमंत्री के पास केवल रक्षा और विदेश जैसे महत्वपूर्ण मामले ही होते है। शेष तमाम मामलों में यहॉ की महापालिकाओं जैसी स्थानीय सरकारें ही पूर्ण प्रभुसत्तासम्पन्न होती हैं। 
आज का संयुक्त राज्य अमरीका भी भारत की ही भॉति ब्रिटेन का ही उपनिवेश रहा है लेकिन अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद उसने ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था को नहीं अपनाया, क्योंकि तबतक मान्तेस्क्यू की स्थापना प्रकाशित हो चुकी थी। आजाद अमरीका ने राजा के स्थान पर अपने यहॉ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग कर दिया। इसका परिणाम भी सामने है आज वह प्रत्येक क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर बना हुआ है। लेकिन भारत ने अपनी आजादी के बाद ब्रिटिश व्यवस्था की भौंडी नकल कर एक ऐसी व्यवस्था बना ली जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री निर्वाचित होने वाला व्यक्ति वास्तव में एक राजा की भॉति समस्त संवैधानिक शक्तियों का स्वामी बन जाता है। और तो और हमने औपनिवेशिक काल के सभी कानूनों को भी वैसे का वैसा ही स्वीकार कर लिया। आश्चर्य नहीं कि समस्त मौलिक अधिकारों के बाद भी एक भारतीय नागरिक को सरकार विरोधी मत रखने का अधिकार नहीं है। अरुन्धती राय व विनायक सेन का उदाहरण सामने है। इसका मूल कारण तो यही है कि भारत आज भी एक राजतंत्र में जीने के लिये तथा उसकी समस्त कमियों का खामियाजा भुगतने के लिये भी मजबूर है।वास्तव में, जबतक भारत को एक ऐसी व्यवस्था से मुक्ति नहीं मिल जाती है जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के रुप में हम राजाओं को निर्वाचित कर लेते हैं तब तक न भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलने वाली है न आतंकवाद और क्षेत्रावाद से।    
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