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जंगल का कानून नहीं चलेगा

 रजनीश

पिछले दिनों केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री ने नक्सलवाद की समस्या का हल वनाधिकार कानून में देखते हुये भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा 68 में संशोधन करने का बयान दिया है। वनाधिकार कानून की समीक्षा के लिये वन-पर्यावरण और जनजातीय मंत्रालय की तरफ से बनाई गई  संयुक्त समीक्षा समिति की रिपोर्ट आने के बाद जनजातीय मंत्री कांतीलाल भूरिया की उपस्थिति में दिए गए  इस बयान को वनाधिकार कानून और इसके राजनैतिक महत्व को सत्ता के गलियारे में स्वीकार करने के संकेत के रूप में तो देखा ही जाना चाहिये, इसके अलावा इसे हमेशा हाशिये के लोग समझे जाने वाले आदिवासी, दलित व  पिछड़े वर्गों की करीब 25 करोड़ की संख्या का राजनैतिक महत्व सरकार की समझ में आने के रूप में भी देखा जा सकता है। मीडिया के सामने दिए गए  इस बयान में उन्होंने स्वीकार किया कि देश के  180 जिलों में जंगल है और करीब 25 करोड़ लोग जंगल पर अपनी आजीविका के लिये निर्भर करते हैं। हम अब और लम्बे समय तक आदिवासियों और अन्य वनाश्रितों को जंगल के दुश्मन के रूप में नहीं देख सकते। उन्होंने कहा कि यह देखने में आया है कि देश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में वनविभाग ने  लोगों पर भारतीय वन अधिनियम के तहत मुकदमे किए  हैं, जिनके बारे में गृह मंत्रालय ने भी रिपोर्ट दी है, यही वजह है कि हम वन अधिनियम में संशोधन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वनविभाग की तरफ से वन अधिनियम के तहत इस तरह से वन समुदायों पर गलत मुकदमे थोपे जाने की व्यवस्था समाप्त हो जानी चाहिये जो कि अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए  जंगल का इस्तेमाल करते हैं। हम वन अधिनियम में सशोधन इस लिये ला रहे हैं कि वनसमुदायों पर इतनी बडी संख्या में फर्जी  मुकदमो को नहीं थोपा जाना सुनिश्चित किया जा सके। जिनके बारे में वनविभाग के खिलाफ बड़ी तादाद में शिकायतें मिल रही हैं। जंगल क्षेत्रों में उनपर निर्भरशील समुदाय कभी भी जंगल को नुकसान पहुंचाने नहीं जाते बल्कि वे वनों को बढ़ाने के लिये एक सहयोगी की भूमिका ही निभाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अब वनक्षेत्रों में वनाधिकार कानून-2006 के तहत एक जनवादी व्यवस्था कायम होनी चाहिये और वनविभाग को अपनी मानसिकता अब वनाधिकार कानून के आधार पर प्रबन्धन कायम करके बदलनी होगी। 
गौरतलब है कि गतवर्ष वनाधिकार कानून के क्रियान्यवयन की प्रक्रिया में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय तथा आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने वनाधिकार कानून की समीक्षा के लिये एक संयुक्त समीक्षा समिति का गठन किया था। इस समीक्षा समिति ने देशभर के करीब        वनक्षेत्रों वाले राज्यों का दौरा करके वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया के बारे में करीब 300 पन्नों की एक रिपोर्ट तैयार की। जिसके आधार पर देशभर में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन में सबसे बड़ा बाधाकारी वनविभाग व वन मंत्रालय पाया गया। 20 सदस्यों की इस समिति में जनसंगठनों से जुड़े कुछ लोगों को भी शामिल किया गया था। ये सभी मुकदमे  खारिज करने की मांग व प्रस्ताव समिति द्वारा प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट में भी पूरी मजबूती के साथ रखे। समिति द्वारा तैयार की गयी यह रिपोर्ट तीन दिन पहले जब पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को सौंपी गयी तो केन्द्रीय वनमंत्री को यह बयान देने के लिये बाध्य होना पड़ा। निश्चित रूप से यह देशभर के वन समुदायों के लिये एक बड़ी जीत की ओर रखा गया कदम है।
हालांकि भारतीय वन अधिनियम-1927 जिसकी अंग्रेजी हुकूमत द्वारा संरचना ही इस उदेश्य के साथ की गयी थी कि वनों का विदोहन और राजस्व की वसूली को किस तरह से प्रोत्साहन दिया जा सके। सन् 1861 में अंग्रेजों द्वारा ही कायम किए गए  वन विभाग ने इस काले कानून का इस्तेमाल हमेशा जंगल क्षेत्रों से वन समुदायों की बेदखली, उत्पीड़न और जंगल की लूट के लिए जम कर किया और जो कि आज भी बादस्तूर जारी है। 15 दिसम्बर 2006 को केन्द्रीय वनाधिकार कानून-2006 संसद में पास हुआ और एक जनवरी 2008 को इसे देशभर में लागू भी कर दिया गया, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह रही कि न तो इस कानून को वास्तविक रूप में लागू करके समुदायों को उनके अधिकार सौंपने में केन्द्र सरकार ने कोई रुचि दिखाई और ना ही इक्का दुक्का छोड़ कर राज्य सरकारों ने ही इसे अमल में लाने की ओर कोई विशेष घ्यान दिया। नतीजतन वनक्षेत्रों में वनाधिकार कानून के वास्तविक रूप में लागू हो जाने के बाद अपने अस्तित्व पर मंडरा रहे ख़तरे को भांपते हुये वन विभाग ने समुदायों पर किये जाने वाले हमलों को अप्रत्याशित रूप से तेज़ कर दिया। जंगल से प्राप्त होने वाली रोज़मर्रा की ज़रूरतों जैसे घर बनाने के लिये फूस व जलौनी लकड़ी आदि पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी गयी। उ0प्र0 के जनपद खीरी में स्थित दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में बसे 46 थारू आदिवासी बहुल गांवों को वर्ष 2008 में करीब 3 करोड़ रुपयों के गल्ला आदि सामान व नगद रुपयों की वसूली के बावज़ूद लोगों को फूस न लेने देकर वनकर्मियों द्वारा आग लगा दी गयी, जिससे क्षेत्र के हजारों परिवार बरसात के मौसम में बरबाद होकर बेघर होने की स्थिति में आ गये। फूस व जलौनी लकड़ी लेने जंगल गये लोगों पर भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत बेशुमार फर्जी मुकदमे लाद दिये गये। लगभग यही प्रक्रिया वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिए  वनविभाग की तरफ से  पूरे देश में तेज़ की गयी। संगठन के  एक अध्ययन में यह बात खुल कर सामने आई  कि अकेले उत्तर प्रदेश में आजादी के बाद के समय से लेकर अब तक वनअधिनियम 1927 को ही हथियार बनाकर लोगों की खेती-काश्त, निवास व यहां तक की सामुदायिक इस्तेमाल आदि की करीब 25 लाख एकड़ भूमि का बिना किसी कानूनी प्रक्रिया को पूरा करते हुये वनविभाग को हस्तांतरण कर दिया गया। यह प्रक्रिया भी सरकारों द्वारा देश भर में चलाकर वनविभाग को देश के सबसे बड़े ज़मीदार के रूप में स्थापित कर दिया। इसके अलावा देशभर में वन्य जन्तु सुरक्षा अधिनियम-1972 के तहत स्थापित किये गये पार्क सेंचुरी आदि वाले क्षेत्रों से वहां पीढ़ियों से रह रहे लोगों की बेदखली की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया गया।
वनाधिकारों की मांग को लेकर देश भर में चल रहे आंदोलनों के दबाव में जब वनाधिकार कानून-2006 पास हुआ तो लोगों में एक उम्मीद जगी कि अब न्याय मिलने का रास्ता साफ होगा। लेकिन यहां भी वन विभाग, सामंती प्रवृतियों से ग्रस्त सरकारें व प्रशासनिक अधिकारीगण इस क्रान्तिकारी कानून के लागू होने के रास्ते मंे सबसे बड़ा रोड़ा साबित होने लगे। जिसके परिणाम स्वरूप वन क्षेत्रों में सरकारों के प्रति तीव्र आक्रोश बढ़ने लगा और लोगों ने सड़क पर उतर कर अपने गुस्से का इजहार करने को और तेजी़ दी। लम्बे समय से उत्पीड़न का शिकार हो रहे वन समुदायों ने भी सीधे टकराव की चुनौती को स्वीकार करते हुये आक्रामक रुख अख्तियार करना शुरू कर दिया। वनक्षेत्रों में वनकर्मियों और वन समुदायों के बीच होने वाले संघर्ष और तेज़ होने की संभावनायें लगातार प्रबल होती साफ देखी जा सकती हैंे। सरकार को शायद इन्हीं सब परिस्थितियों के मद्देनज़र वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया की समीक्षा के लिये संयुक्त समीक्षा समिति का गठन करना पड़ा। चूंकि इसमें जनसंगठनों के लोग भी शामिल किये गये जिसका असर यह रहा कि जहां एक तरफ समिति के दौरों के दौरान विभिन्न वनक्षेत्रों में समुदायों ने अपने प्रतिनिधियों को देख कर एक अलग तरह की ताकत का अहसास किया वहीं दूसरी और इस समिति के द्वारा आयोजित जनसुनवाईयों में लोगों ने इसे महज एक सरकारी समिति न मानते हुये विश्वास के साथ खुलकर अपनी तकलीफ का इज़हार किया। हालांकि समिति के  प्रस्तावों में वनक्षेत्रों में पुराने सभी वन संबन्धी कानूनों को निष्प्रभावी कर वनाधिकार कानून के तहत व्यवस्था कायम करने की बात मजबूती से की गयी है। ज़मीनी हकी़कत भी यही है कि वनाधिकार आंदोलनों के द्वारा एक लम्बे समय से भारतीय वन अधिनियम सहित सभी पुराने काले कानूनों को रद्द करने की मांग लगातार उठायी जा रही है। ऐसे में  इस विध्वंसकारी कानून की महज किसी एक धारा में संशोधन करने की बात जो सरकार ने  की  है वह निश्चित रूप से ऊंट  के मुंह में जीरा ही साबित होगी। दूसरी तरफ वनाधिकार कानून में भी अभी कई तरह के संशोधनों की ज़रूरत है। जैसे अन्य परंपरागत वननिवासियों के लिये 75 वर्ष के प्रमाण की अनिवार्यता के सवाल पर भी लोगों में खासा रोष पनप रहा है। ऐसे में अगर सरकार (जैसा कि पर्यावरण मंत्री ने जो अपने बयान में भी कहा है) वास्तव में चाहती है कि वनक्षेत्रों में वनाधिकार कानून के तहत एक जनवादी व्यवस्था कायम हो, इसके लिये पुराने कानूनों को रद्द करके वनाधिकार कानून में कुछ ज़रूरी संशोधन करके और इसे ज़मीनी तौर पर वास्तविक रूप से लागू कराने की प्रक्रिया में तो जाना ही होगा।      
                                                        
 
 
                                               
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