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देशवासियों से भी क्षमायाचना

 राजदीप सरदेसाई

पिछले सप्ताह एलके आडवाणी ने कुछ ऐसा किया, जिसे भारतीय राजनीति में बहुत अप्रत्याशित माना जाता है। आडवाणी ने कहा था : ‘सॉरी’। ऐसे सौजन्य से अनभिज्ञ राजनीतिक परिवेश में भाजपा नेता की क्षमायाचना बहुत चर्चित साबित हुई, जिसमें उन्होंने काले धन से संबंधित विवाद में सोनिया गांधी का नाम घसीटने के लिए खेद व्यक्त किया था। भाजपा ने स्वयं को शब्दों के अर्थो तक ही सीमित रखते हुए कहा कि खेद जताने का अर्थ क्षमायाचना करना नहीं होता, जबकि कांग्रेस ने आडवाणी के इस खेद को अपने नेतृत्व की विजय की तरह लिया। अलबत्ता यह तो किसी को नहीं पता कि आडवाणी ने अचानक खेद व्यक्त करने का निर्णय क्यों लिया, लेकिन उनकी मंशा चाहे जो रही हो, इस घटना ने कम से कम सार्वजनिक जीवन में बुनियादी शिष्टाचार की वापसी की ओर एक संकेत तो किया ही है। आखिर यदि पर्याप्त सबूतों के बिना भी व्यक्तिगत आरोप लगाए जा सकते हैं, तो शिष्टाचार का यही तकाजा है कि पर्याप्त सबूतों के अभाव में क्षमायाचना भी की जाए।
विडंबना है कि आडवाणी स्वयं अपने राजनीतिक विरोधियों के अमर्यादित आचरण के शिकार रहे हैं। कुछ साल पहले जब उनकी आत्मकथा का विमोचन हुआ था, तब शरद पवार को छोड़कर यूपीए गठबंधन के किसी सदस्य ने कार्यक्रम में शिरकत नहीं की थी। विमोचन समारोह के ‘अनधिकृत’ बहिष्कार ने यही सिद्ध किया था कि भारतीय राजनीति में राजनीतिक ‘अस्पृश्यता’ की प्रवृत्तियां किस हद तक जा चुकी हैं। सोनिया गांधी को भी ऐसी ही अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। खासतौर पर तब, जब उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी।
लेकिन ऐसा हमेशा से नहीं था। जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट में डॉ बीआर आंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे कांग्रेस की नीतियों के आलोचक शामिल थे। महात्मा गांधी भारत के पहले प्रधानमंत्री को लगातार यह याद दिलाते थे कि ‘स्वतंत्रता भारत को मिली है, कांग्रेस पार्टी को नहीं!’ अपने पूरे कार्यकाल के दौरान नेहरू ने इस नेक सलाह को याद रखा। वर्ष 1959 में जब राजाजी, जो तब तक नेहरू की नीतियों के कटु आलोचक बन चुके थे, दिल्ली आए तो नेहरू ने उनसे भेंट करते हुए उन्हें पर्याप्त सम्मान दिया था।
यह सब कब बदल गया? कई राजनीतिक चिंतक मानते हैं कि आपातकाल एक टर्निग पॉइंट था। इंदिरा गांधी द्वारा राजनीति के ‘निजीकरण’ के प्रयासों का यह अर्थ था कि उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को ‘दुश्मनों’ की तरह देखना शुरू कर दिया था। जयप्रकाश नारायण के साथ नेहरू परिवार के गहरे ताल्लुकात थे। इंदिरा की मां कमला जेपी की पत्नी प्रभावती की बहुत अच्छी दोस्त थीं। लेकिन इंदिरा के लिए जेपी दुश्मन नंबर एक हो गए। आपातकाल के दौरान उन्हें और विपक्ष के अन्य नेताओं को कैद करते हुए श्रीमती गांधी ने एक ऐसी राजनीति की बुनियाद तैयार कर दी, जिसमें लोकतांत्रिक नियमों के अनुसार संघर्ष करने की कोई जगह नहीं थी।
दुर्भाग्यवश इसके बाद कोई प्रधानमंत्री इस परिपाटी को बदल नहीं पाया। राजीव गांधी के कार्यकाल में एक तरफ भारी बहुमत और दूसरी तरफ संगठित विपक्ष ने ऐसी विस्फोटक परिस्थितियां पैदा कर दी थीं कि इसकी परिणति 1989 के आम चुनाव से पहले बोफोर्स मामले पर भारी संख्या में दिए गए इस्तीफों के रूप में हुई। नरसिंह राव के कार्यकाल में राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करना बचाव की रणनीति बन गया। अटल बिहारी वाजपेयी का रुख जरूर थोड़ा नेहरूवादी रहा, लेकिन सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उनके विरुद्ध जो निंदा अभियान छेड़ा गया था, उसे रोकने के लिए उन्होंने बहुत कम प्रयास किए। क्षेत्रीय राजनीति में ये प्रवृत्तियां तो और बढ़-चढ़कर नजर आती हैं। मायावती और मुलायम सिंह कभी एक साथ बैठकर चाय पीने के लिए राजी न होंगे। 
ममता बनर्जी उस सम्मेलन में कभी शामिल नहीं होंगी, जिसकी अध्यक्षता बुद्धदेब कर रहे हों। गुजरात कांग्रेस के लिए नरेंद्र मोदी निषिद्ध हैं। करुणानिधि व जयललिता एक-दूसरे को कैदखाने में ही देखना चाहते हैं। दुख की बात यह है कि ऐसे ध्रुवीकृत राजनीतिक परिवेश में महत्वपूर्ण मसलों पर सर्वसम्मति का निर्माण मुश्किल हो जाता है। जब श्रीलंका की नौसेना द्वारा तमिलनाडु के मछुआरों पर हमला बोला जाता है तो यह किसी पार्टी विशेष का नहीं, पूरे राज्य का मसला होता है। इसके बावजूद दोनों द्रविड़ पार्टियों द्वारा साझा मोर्चा बनाने की दिशा में न के बराबर प्रयास किए गए। जब बंगाल सरकार टाटा नैनो को बंगाल में ही रोके रखने का प्रयास कर रही थी, तो यह राजनीतिक बढ़त दर्ज करने का अवसर नहीं था। यह इस पर विचार करने का अवसर था कि यह निवेश राज्य के हित में है या नहीं। दुख की बात है कि गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्वर्ण जयंतियों पर भी राजनीतिक दांवपेच खेले जाते रहे।
शायद राज्यों की विधानसभाएं संसद से ही सबक सीख रही हैं। बीते कुछ माह से 2जी घोटाले के कारण विपक्ष व सरकार के संबंधों में तनातनी दिख रही है। विपक्ष चाहे यह सोचे कि जेपीसी के गठन की मांग को लेकर शीतकालीन सत्र का बहिष्कार करना जरूरी था, लेकिन इसने एक खतरनाक उदाहरण भी पेश किया है। वह यह कि यदि विपक्ष को सत्तारूढ़ पार्टी के फैसले मंजूर नहीं हैं तो संसद में गतिरोध को उसके विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसीलिए जरूरी है कि कटुताओं को दरकिनार करते हुए संसद अपने वैधानिक दायित्वों का निर्वाह करे। राजनीतिक नेतृत्वों के लिए भी यह जरूरी है कि व्यक्तिगत एजेंडों को भुलाकर महत्वपूर्ण मसलों पर दोतरफा सहमति बनाई जाए। कोलाहलपूर्ण लोकतंत्र और निष्क्रिय लोकतंत्र के बीच अक्सर बहुत पतली रेखा होती है।
पुनश्च : अब जब आडवाणी ने एक स्वस्थ परंपरा स्थापित कर दी है, क्या हम आगे भी ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं? केवल आपसी क्षमायाचनाएं ही नहीं, बल्कि देशवासियों से भी क्षमायाचना, जो लंबे समय से भ्रष्टाचार और हिंसा को बर्दाश्त कर रहे हैं।
 
लेखक आईबीएन 18 के एडिटर-इन-चीफ हैं।
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