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बच्ची पढ़ती तो पूरा परिवार पढ़ता

सुषमा स्वराज 
हम जब नारी सशक्तीकरण की बात करते हैं तो जन्म से लेकर मरण तक कहां-कहां उसे शक्तिशाली बनाना है, उसके आयाम तय किए गए हैं। कन्या के जन्म से बात करें तो हमें कन्या भ्रूण हत्या की बुराई को हटाना होगा ताकि बच्चियां अजन्मी न रह जाएं और वे जन्म ले सकें। उसके बाद जो पहली चीज आती है, वह शिक्षा ही है। शिक्षा उसके सशक्तीकरण में बड़ी भूमिका अदा करती है। महात्मा गांधी ने भी कहा था - जब एक बच्ची पढ़ती है तो पूरा परिवार पढ़ता है। ज्ञान का कोई विकल्प नहीं है। कल दुख सिर पर आ पड़े या पति का साया न रहे, तो शिक्षित होना उसका आत्मविश्वास नहीं टूटने देगा। जब तक उसे यह पता नहीं होगा कि क्या राजनीतिक मुद्दे हैं, तब तक वह सही फैसला नहीं ले सकती।
आज हम जिन क्षेत्रों में महिलाओं को बढ़ता देखते हैं, वे पहले लड़कियों के लिए वर्जित थे। इन वर्जित क्षेत्रों में आज वह शिक्षा के कारण ही पहुंची हैं और ऊंचाई छू रही हैं। एक सूत्र है - सा विद्या या विमुक्तये। विद्या वह है जो मुक्ति देती है।
वैसे देश में इस मानसिकता को बदलना अभी भी चुनौती बना हुआ है कि पढ़ा-लिखाकर क्या करेंगे? हमें कौन-सी नौकरी करानी है? पढ़-लिखकर जाएगी तो ससुराल में नहीं निभाएगी। शिक्षा के साथ ये धारणाएं जो जुड़ गई हैं, इनको तोड़ना बहुत मुश्किल है। भले यह मानसिकता बड़े शहरों में नहीं दिखे, लेकिन जब आप गांवों में जाकर देखेंगे तो यह चुनौती दिखेगी। गांवों में एक समस्या और देखने को मिलेगी। भले ही आप इसे छोटी-सी बात कहें। गांवों में लड़कियों के पांचवीं के बाद स्कूल की पढ़ाई छोड़ने का एक बड़ा कारण स्कूलों में कन्या शौचालय नहीं होना है। इसलिए मैं जब उत्तराखंड से सांसद थी तो सांसद निधि का पूरा पैसा स्कूलों में कन्या शौचालय बनाने के लिए दिया। लड़कियों की शिक्षा के लिए चुनौतियां तो बहुत हैं, लेकिन उन्हें ठीक तरह से चिह्न्ति करना भी जरूरी है।
सुरक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। वातावरण की असमानता तो आज भी है। देश की राजधानी क्राइम कैपिटल बनकर रह गई है। सुरक्षा के बिना महिलाओं का सशक्तीकरण अधूरा है।


 

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