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राख में बदल गया बारूद

अंबरीश कुमार 
लोधी रोड के शमशान घाट में आलोक तोमर को अंतिम विदाई के लिए पहुंचा तो जाम के चलते कुछ देर हो गई थी . उनकी चिता से लपटे निकल रही थी .वही खड़ा रह गया .करीब बीस साल का गुजरा वक्त याद आ गया .जनसत्ता में प्रभाष जोशी के बाद अगर कोई दूसरा नाम सबसे ज्यादा चर्चित रहा तो वह आलोक तोमर का था .जनसत्ता ने उन्हें बनाया तो जनसत्ता को भी आलोक तोमर ने शीर्ष पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .वे जनसत्ता रूपी तोप के बारूद थे.वह भी आज वाला जनसत्ता नही दो दशक पहले का जिसकी धमक और चमक के आगे अंग्रेजी मीडिया बौना पड़ गया था .शाम को देव श्रीमाली बोले - अब न तो वैसी हेडिंग आती है न भाषा में आक्रामकता है कुछ अपवाद छोड़कर .लगता है .मेरा जवाब था -यह समय का फेर है ,प्रभाष जोशी के समय की तुलना नही की जा सकती है .उन्होंने आलोक तोमर को तलाशा और तराशा भी .प्रभाष जोशी के बाद अब आलोक तोमर भी चले गए . बीस दिन पहले ही बात हुई तो उनकी तकलीफ को देखते हुए आगे बात करने से मना किया और कहा , सुप्रिया जी को सब बता दूंगा जो आपको समझा देंगी आपको बात करने के लिए काफी जोर डालना पड़ रहा है .वे कालाहांडी की मौजूदा हालत के बारें में मेरी जानकारी पर सवाल खड़ा कर बहस कर रहे थे .अंतत मैंने हथियार डाल दिए और उन्होंने चार पांच दिन में लिखने का वादा किया . फिर आलोक से बात नही हो पाई जो कहना होता था सुप्रिया से कहा जाता और उन्ही के जरिए जवाब मिल जाता .राख में बदलते आलोक तोमर को हाथ जोड़ पीछे लौटा तो सुप्रिया देखते ही फफक कर बोली -अब हम कभी रामगढ नही जा पाएंगे .हमारा घर नही बन पाएगा .देखिए आलोक चले गए .सुनता रहा बोलने को कुछ था ही नही .शमशान घाट से घर पहुंचे तो सुप्रिया का हाल और बुरा था .आलोक की फोटों को देख बार बार उन्हें आवाज दे रही थी .कुछ देर बैठा फिर बाहर निकल आया .छतीसगढ़ के वरिष्ठ अफसर आलोक अवस्थी ,हरीश पाठक ,देव श्रीमाली ,आलोक कुमार ,मयंक सक्सेना और राहुल देव आदि थे .करीब दो घंटे बाद कृष्ण मोहन सिंह के साथ दोबारा पहुंचा तो पद्मा सचदेव ,प्रणव मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा और टीवी के कुछ पत्रकार मौजूद थे .दो अप्रैल के कार्यक्रम पर बात हो रही थी .आलोक तोमर के वेब साईट डेटलाइन इंडिया को जल्द अपडेट करने पर पर भी चर्चा हुई .आलोक तोमर का मोबाइल फोन पहले से ही बंद कर दिया गया है और सुप्रिया का फोन फिलहाल अनिल गुप्ता के पास है और वही बात भी करेंगे क्योकि सुप्रिया सभी से बात कर सके यह संभव भी नही है .कुछ कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर बात होते होते अचानक सुप्रिया का ध्यान आलोक तोमर की फोटो पर जाता और वे फिर उन्हें पुकारने लगती .पद्मा सचदेव के सुप्रिया को गले से लगाकर कहा -आलोक कही नही गया है वह हम सबके साथ है .फिर उन्होंने आलोक तोमर के कई संस्मरण सुनाए और कहा -शादी के दौरान मैंने मजाक में कहा था मुझे बंगाली बहू नही चाहिए तो आलोक का जवाब था अब आपकी बहू तो यही बनेगी .
सुप्रिया बोली -ज्योतिष के जानकारों को आलोक झूटा साबित कर चले गए .आखिरी तक उनकी कलम चलती रही .१७ मार्च को उन्होंने जो लेख लिखा उसी के बाद बत्रा गए और फिर हमेशा के लिए चले गए . चितरंजन खेतान पिछले महीने जब विदेश जाने से पहले मिलने आए तो एक कविता लिखी जो अंतिम कविता बन गई .इस कविता की फोटो कापी अनिल गुप्ता ने कराकर सभी को दी .रात आठ बजे जब चलने को उठा तो सुप्रिया की आँखे फिर भर आई और बोली -दो अप्रैल को आ रहे है ना , मैंने इशारे से कहा हाँ .कुछ बोला नही गया .सामने बैठे आलोक तोमर के पिताजी को नमस्कार किया और फिर कमरे से बाहर आ गया .कृष्ण मोहन सिंह और विजय शुक्ल साथ थे . कुछ समझ में नही आ रहा था .समय ही हर घाव को भरता है और यहाँ भी यही होगा यह सोचकर दिलासा दे रहा हूँ .

 

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