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जारी है माओवादियों की जंग

दिवाकर मुक्तिबोध
रायपुर ,मार्च । छतीसगढ़ में माओवादियों की जंग जारी है । जो कभी पीछे हटते है तो कभी अपहरण की फिरौती में माओवादी मांगते है । वे बर्बरता से हत्या कर सकते है तो आदिवासी समाज के हित का सवाल उठाकर अपना मानवीय चेहरा भी दिखाने की कोशिश करते है । बस्तर का बड़ा इलाका उनकी गिरफ्त में जा रहा है और वहां वे ही सरकार बने हुए है । दुर्भाग्य यह है कि नक्सली समस्या पर अब बात करने के लिए विशेष कुछ नहीं रह गया है। पिछले दो-तीन वर्षों में जब से यह समस्या भयानक रूप से हिंसक हुई है, इस पर काफी बातें हो चुकी हैं। भूमि सुधार, शोषण, अत्याचार, सामाजिक न्याय, विकास कार्य, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपहरण, फिरौती, हत्या, मारपीट, जनअदालत, समानांतर सरकार, शांति वार्ता, शर्तें, निशस्त्रीकरण, ऑपरेशन ग्रीन हंट, सलवा जुडूम, जंगलवार, गुरिल्ला युद्ध, फौज की तैयारी, वायुसेना का उपयोग, मीडिया की भूमिका आदि-आदि पहलुओं को समेटते हुए विद्वजनों, राजनीतिकों, केंद्र सरकार के नुमाइंदों, मुख्यमंत्रियों, माओवादी विचारकों एवं मानवाधिकार के पक्षधरों ने जमकर विचार व्यक्त किए, एक-दूसरे को आरोपों के कटघरे में खड़ा किया एवं देश की इस भीषणतम समस्या को सुलझाने के रास्ते सुझाएं लेकिन इन बौद्धिक जुगालियों के अलावा विशेष कुछ नहीं हुआ। समस्या यथावत है बल्कि शह देने, बचने एवं मोहरे पिटने-पिटवाने खेल जारी है। मात किसी की नहीं हुई है। कभी ऑपरेशन ग्रीन हंट की वजह नक्सली पीछे हटते दिखाई देते हैं तो कभी अपहरण के जरिए राज्य सरकारों को ब्लैकमेल करते नजर आते हैं। अब केवल युद्धरत पक्ष ही बता सकते हैं कि ऐसा कौन सा फार्मूला शेष है जिस पर एकमतेन हुआ जा सकता है? लेकिन सवाल है, क्या ऐसा कोई फार्मूला संभव है जो न तेरी जीत न मेरी हार की तर्ज पर हो? गौतम नवलखा सरीखे सामाजिक कार्यकर्ता लगातार कहते आ रहे हैं कि नक्सलियों की कुछ शर्तें मान ली जाएं और उन्हें मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर दिया जाए। क्या केंद्र सरकार इसके लिए तैयार है? उत्तर नहीं में है लिहाजा जंग जारी है।
आजादी के 62 साल बीतने के बावजूद नौकरशाहों के दिमाग में यह ख्याल बना हुआ है कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी विकास की परिभाषा नहीं समझते। इसलिए शासन तंत्र उनके साथ जैसा चाहे वैसा सलूक कर सकता है। पर तंत्र मुगालते में है। आदिवासी व्यवस्था के खिलाफ उग्र नहीं हैं तो उसका यह अर्थ नहीं कि वे अपने अंधेरे एवं दूसरों के उजाले से बेखबर हैं। उनकी शांतिप्रियता का अर्थ उनकी कमजोरी नहीं है। अगरचे ऐसा होता तो वे नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन खड़ा नहीं करते। मलकानगिरी, उड़ीसा के कलेक्टर की रिहाई के लिए नक्सलियों पर दबाव नहीं बनाते। जुलूस एवं धरना प्रदर्शन नहीं करते। नक्सलियों को सबसे ज्यादा भय पुलिस अथवा अद्र्धसैनिक बलों से नहीं, ग्रामीण आदिवासियों की मानसिकता बदलने से है जिस पर उन्होंने कब्जा जमाए रखा है। मलकानगिरी के कलेक्टर विनील कृष्णन को नक्सलियों ने मात्र इसलिए नहीं छोड़ा कि उड़ीसा सरकार ने उनकी तमाम शर्ते मान ली, बल्कि उन्हें इसलिए आजाद किया क्योंकि आदिवासी भड़के हुए थे। विनील कृष्णन वह अधिकारी हैं जिन्होंने जिले के बेहद पिछड़े गांवों की सुध ली, उनके बीच गए, उनकी समस्याएं देखीं। आदिवासियों को महसूस हुआ कि कलेक्टर उनका अपना है, उनके कष्ट दूर करने आया है। उनका यह अहसास इतना पुख्ता था कि कलेक्टर के अपहरण की खबर मिलते ही वे लामबंद हो गए। माओवादी इस खतरे को समझते थे क्योंकि सरकारी अधिकारियों का आदिवासियों के दिल में जगह बनाने का अर्थ है अपनी जड़ों से उखडऩा। नक्सली इस स्थिति को कबूल नहीं कर सकते इसलिए विकास कार्यों में रोड़े अटकाते हैं और आतंक का ऐसा माहौल पैदा करते हैं ताकि दूरदराज के गांवों में जाने का दुस्साहस कोई अधिकारी या नेता न करें। विनील कृष्णन नक्सली आतंक की परवाह न करते हुए गांवों में पहुंच गए। एक रणनीति के तहत नक्सलियों ने उन्हें कब्जे में किया और एक तीर से दो शिकार किए। सरकार से शर्तें भी मनवायी तथा आदिवासियों के विश्वास को टूटने नहीं दिया। यद्यपि नक्सली फंदे से मुक्त होने के बाद कृष्णन ने दूरस्थ क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान से पीछे न हटने का ऐलान किया है पर अब संभावना कम ही है कि बिना सुरक्षा इंतजाम के वे नक्सल प्रभावित वनग्रामों का दौरा करेंगे। दरअसल अपहरण का आतंक इतना जबरदस्त है कि मुक्त हुए तमाम अपहृतों जिनमें पुलिस जवान भी शामिल हैं, के लिए नक्सलियों के खिलाफ खड़े होना या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना मुश्किल है।
यह तो तय है नक्सली समस्या का समाधान बंदूक की गोली से नहीं हो सकता। सरकारों का ऐसा सोचना है, बुद्धिजीवी तबका भी यह महसूस करता है कि विकास कार्यों के माध्यम से धीेरे-धीरे इस समस्या का अंत हो जाएगा बशर्ते नक्सली विकास कार्यों में बाधा न डालें। लेकिन क्या विकास के जरिए सचमुच ऐसी क्रांति लायी जा सकेगी? क्या किसी वनग्राम में या कस्बेनुमा गांवों में जीवनोपयोगी तमाम सुविधाएं उपलब्धकराने मात्र से नक्सली आतंक का सफाया हो जाएगा? क्या सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलने से आदिवासियों का हौसला बढ़ जाएगा और वे नक्सलियों को शरण देना बंद कर देंगे? क्या उन्हें उनके गांवों में भी रोजगार मिलेगा ताकि जंगल में जाना ही न पड़े? क्या जंगलों के बिना वे जी सकेंगे? दरअसल विकास की यह परिकल्पना तो अपनी जगह ठीक है पर नक्सली आतंक से मुक्ति उन्हें तब तक नहीं मिलेगी जब तक कि खुद नक्सली नहीं चाहेंगे। यह सच कड़वा जरूर है पर अकाट्य है। दरअसल आतंक के खिलाफ असंगठित विरोध के कोई मायने नहीं होते। लडऩे के लिए समूह की ताकत चाहिए। जब शहरों में गुंडे - बदमाशों से मोहल्ला कांपता है तो दूरदराज में बैठे आदिवासी से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह नक्सली आतंक का डटकर मुकाबला करेगा। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि नक्सलियों को आदिवासी ग्रामीणों की सहानुभूति भी हासिल है जो इनकी पुलिस से रक्षा भी करती है। अत: यह स्पष्ट है कि नक्सली आतंक का खात्मा तभी होगा जब नक्सली चाहेंगे। लेकिन सवाल है नक्सली ऐसा क्यों करने चले? आदिवासियों को स्थानीय सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, व्यापारियों और नेताओं के शोषण से बचाते-बचाते वे खुद ही शोषक बन गए हैं। अब विचारधारा से उनका कोई लेना-देना नहीं है। लिहाजा आदिवासियों की यथास्थिति ही उनके जीवन की गारंटी है इसलिए इस गारंटी पर किसी प्रकार का आघात कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? लिहाजा यह कहना कि विकास कार्र्यों के माध्यम से नक्सलियों के खिलाफ जंग जीती जा सकेगी, खुशफहमी ही है। यकीनन विकास कार्यों से गांवों की तस्वीर जरूर बदल सकती है पर तकदीर नहीं जो नक्सलियों के रहमोकरम पर टिकी है। इसलिए इस समस्या का केवल एक ही समाधान है, नक्सलियों को घेरकर वार्ता की टेबिल पर लाना और इसके लिए वे अपने आपको तैयार बताते हैं। लेकिन न तो नक्सल प्रभावित राज्य सरकार की इसमें दिलचस्पी है और न केंद्र की। हालांकि वार्ता का राग जोरशोर से अलापा जाता रहा है। यह गूढ़ प्रश्न है कि कथनी और करनी में फर्क क्यों है? क्या इसकी राजनीतिक वजहें हैं या फिर कोई और कारण? आखिरकार समस्या को जिंदा रखने में किस पक्ष का भला है? जबकि बीते महीनों में मीडिया के माध्यम से दोनों ओर से शर्तों का उल्लेख होता रहा है।
जाहिर है, वार्ता के प्रति कोई पक्ष गंभीर नहीं है। इसलिए दोनों के बीच सिर्फ आंख मिचौली का खेल खेला जा रहा है। कभी कोई चित होता है तो कभी कोई। कलेक्टर का अपहरण करके नक्सलियों ने अपनी 14 शर्तें उड़ीसा सरकार से मनवा लीं जिसमें कुछ हार्डकोर नक्सली नेताओं की जेल से रिहाई भी शामिल है। नक्सली इतिहास की यह ऐसी पहली घटना है जिसमें किसी राज्य सरकार को इस हद तक झुकना पड़ा है। निश्चित ही मामूली व्यक्तियों के अपहरण पर राज्य सरकार वैसी चिंता नहीं करती जैसी कलेक्टर के अपहरण की घटना पर की गई। यह इस देश में व्यक्ति-व्यक्ति के स्तर, हैसियत एवं दृष्टि का फर्क है। आम आदमी की यदि इतनी ही चिंता की जाती तो एक वर्ष के भीतर छत्तीसगढ़ में ही हिंसक घटनाओं में 150 नागरिक नहीं मारे जाते। कलेक्टर के अपहरण की घटना के बाद उड़ीसा या छत्तीसगढ़ में यद्यपि अपहरण की कोई घटना नहीं हुई है पर इसमें संदेह नहीं कि नक्सली मौके की ताक में हैं। उन्होंने भले ही ऐसी किसी घटना को अंजाम न दिया हो किंतु उनके द्वारा की जा रही हिंसा थमी नहीं है। 14 मार्च को उन्होंने दंतेवाड़ा और बीजापुर में पुलिस की सर्चिंग पार्टियों पर घात लगाकर हमले किए। आंध्रप्रदेश से लगे चिंतलनार इलाके में घंटों मुठभेड़ चली जिसमें तीन जवान मारे गए और करीब एक दर्जन घायल हुए। बस्तर का नक्सल प्रभावित कोई इलाका प्रतिदिन हिसंक वारदात से अछूता नहीं है। मुठभेड़ के एक दिन पूर्व ही दल्ली-राजहरा रावघाट रेलवे लाइन निर्माण कार्य में ले 11 वाहनों को तथा सोनेकन्हार में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना के 7 वाहनों को फूंक दिया। निर्माण कार्यों में निरंतर बाधाएं खड़ी करके नक्सली न केवल आतंक फैला रहे हैं वरन विकास का रास्ता भी रोक रहे हैं। अस्तित्व की रक्षा के लिए उनके पास बस्तर का विराट जंगल है और वनों के बीच बसे हुए छोटे-छोटे गांव। यह तय है राज्य सरकार का अमला लाख कोशिश कर ले पर वनांचल से नक्सलियों को खदेडऩा अथवा उनका समूल नाश करना लगभग नामुमकिन है। ऐसी स्थिति में उनकी कुछ एक शर्तों को मानते हुए उन्हें हिंसा त्यागने तैयार करना ही एकमात्र उपाय नजर आता है।
यह समझ से परे है कि वार्ता की वकालत करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता, माओवादी विचारक एवं विभिन्न प्रसंगों पर मध्यस्थता करने वाले वे लोग मसलन स्वामी अग्निवेश, गौतम नवलखा, हरगोपाल, आर. राव, हिमांशु कुमार आदि कहां हैं? क्यों नहीं ये प्रकांड बुद्धिजीवी एवं मानवतावादी अपनी पूरी ताकत के साथ सरकार एवं नक्सली कमांडरों पर दबाव बनाते? जब नक्सली मध्यस्थता के लिए अपनी ओर से नाम देते हैं तो जाहिर है नक्सली उन पर विश्वास करते हैं। अत: वार्ता के लिए अनुकूल माहौल बनाना उनके लिए मुश्किल नहीं है। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि यह काम मीडिया को करना चाहिए। उनका ऐसा सोचना उचित ही है। यकीनन प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय मीडिया, मानवाधिकार कार्यकर्ता और विचारक यदि एक प्लेटफार्म पर आ जाए तथा इस दिशा में संयुक्त प्रयास करें तो एक ऐसी समस्या से राष्ट्र उबर सकता है जो हिंसा के जरिए अराजकता को बढ़ावा दे रही है।
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