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एअर इंडिया की मूर्छा टूटी

  प्रीतीश नंदी
आखिरकार एअर इंडिया की मूर्छा टूटी है और उसने सस्ती एयरलाइंस के मुकाबले अपनी टिकट दरों में 15 फीसदी तक की कटौती की है। इसी के साथ घरेलू विमानन सेवाओं में मूल्य दरों को लेकर होड़ की स्थिति निर्मित हो गई है। यह भी उम्मीद की जा सकती है कि इसके साथ ही मार्केटिंग के आक्रामक मानदंडों की भी शुरुआत होगी। अन्यथा यह लगभग तय है कि एअर इंडिया दिवालियेपन की ओर एक लंबी उड़ान भरने को तैयार है।
एअर इंडिया पहले ही अपना शीर्ष स्थान गंवा चुकी है। 15 फीसदी मार्केट शेयर के साथ वह फिलहाल चौथे नंबर पर है और अपना स्थान बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि 14 फीसदी शेयरों के साथ पांचवें नंबर पर स्थित स्पाइसजेट जल्द ही उससे आगे निकल जाएगी। एअर इंडिया पर यात्रियों का दबाव 60 फीसदी है, जो विमानन उद्योग में सबसे कम है। अन्य सेवाओं के यहां यात्रियों का 75 से 80 फीसदी दबाव रहता है। इसके बावजूद एअर इंडिया के पास सर्वाधिक संख्या में विमान हैं, क्योंकि 15 हजार करोड़ के कुल घाटे और लगातार बढ़ रहे सालाना घाटे के बावजूद नागरिक उड्डयन मंत्रालय उसे अधिक से अधिक विमान खरीदने के लिए बाध्य करता रहा। आखिरकार वह एक ऐसी स्थिति में पहुंच गई, जहां ऋण पर ब्याज की दरें लगभग उसके कुल राजस्व जितनी ही हो गई हैं। लेकिन इतने विमान क्यों खरीदे गए थे, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
लेकिन यह स्तंभ एअर इंडिया की समस्याओं के बारे में नहीं है। यह उसके समाधानों के बारे में है। एअर इंडिया दशकों से दुर्भाग्य के साये तले जी रही है। गैरईमानदार मंत्री, अक्षम नौकरशाह और तीसरे दर्जे का शीर्ष प्रबंधन उसकी त्रासदी साबित हुए हैं। हर व्यक्ति ने एअर इंडिया को लूटखसोट का जरिया समझ लिया। इनमें से कोई भी यह नहीं चाहता था कि एअर इंडिया दुनिया की श्रेष्ठतम विमानन सेवा बन जाए, जो कि वह बन सकती थी। एअर इंडिया की यूनियनें, परिचारिकाएं, योग्यता से अधिक वेतन पाने वाले विमान चालक और स्टाफकर्मी, सभी आलोचना के दायरे में रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इसके बावजूद एअर इंडिया कम से कम भारत के आसमान में तो नंबर एक पर रह ही सकती थी, यदि उसका नेतृत्व करने वाले व्यक्ति ईमानदार, सक्षम और प्रतिबद्ध होते। लेकिन एअर इंडिया को वास्तविक घाटा तो इन बुनियादी मूल्यों में ही हुआ है।
सच्चाई यह है कि सभी यही चाहते थे कि एअर इंडिया विफल हो जाए। इस राष्ट्रीय विमानन सेवा को बदनाम करने और उसे सस्ते में बेच डालने की स्पष्ट मंशा नजर आती है। खरीदारों की शॉर्टलिस्ट पहले से तैयार है। एअर इंडिया की व्यापक संपदा, उसकी अचल संपत्ति, उसके लिए कार्य कर रहे कर्मचारियों और तकनीक का बुनियादी ढांचा खरीदारों को आकर्षित करते हैं। नए मालिक को केवल इतना ही करना होगा कि वह एअर एंडिया के शीर्ष प्रबंधन को उसकी परेशानियों से मुक्त करे और उन्हें अपनी टीम को सौंप दे। और अगर आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगा कि ठीक इन्हीं कारणों से एअर इंडिया की आज यह स्थिति है। यह इसलिए है, ताकि उसकी प्रतिद्वंद्वी विमान सेवाओं में से कोई एक चुपचाप उस पर काबिज हो जाए। और यह कार्य भी प्रतिनिधियों और मध्यस्थों की इतनी जटिल भूलभुलैया के मार्फत किया जाए कि किसी को पता ही न चले कि उसे किसने खरीदा है। कुछ सालों बाद जब मामला ठंडा हो जाएगा, तब दोनों सेवाओं का विलय कर भारत के आकाश में एकछत्र राज करने वाली विमानन सेवा स्थापित की जा सकती है। मालूम होता है कि बहुत सारे लोग इस धूर्ततापूर्ण गेमप्लान में मुस्तैदी से शामिल हैं।
लेकिन अब भी पूंजी या दीर्घकालीन ऋण, शीर्ष प्रबंधन की मरम्मत, नियोक्ताओं द्वारा थोड़ा समायोजन और बैंकों व तेल कंपनियों के समर्थन के साथ यह राष्ट्रीय विमानन सेवा दो साल के भीतर पुन: अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है और यह सब आसानी से हो भी सकता है, क्योंकि एअर इंडिया राज्यशासित है। लेकिन बदलाव के लिए उसे स्पष्ट कदम उठाने की जरूरत है। उसे लैंडिंग अधिकारों से संबंधित हाल के कुछ निर्णयों को बदलना होगा, ज्यादा आक्रामक मार्केटिंग और मूल्य निर्धारण नीतियां अख्तियार करनी होंगी और स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों का सामना करने के लिए फ्रीहैंड प्राप्त करना होगा। महज छह माह के भीतर एअर इंडिया अपने प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटा सकती है। इनमें वे प्रतिद्वंद्वी भी शामिल होंगे, जो उसे जमींदोज करने के लिए मुस्तैदी से जुटे हुए हैं।
यह पूरी तरह तर्कपूर्ण प्रबंधन, आक्रामक मूल्य निर्धारण नीति और एअरक्राफ्ट के प्रभावी उपयोग पर आधारित खेल होगा। यही वे तीन मोर्चे हैं, जिन पर एअर इंडिया अपने प्रतिद्वंद्वियों से संघर्ष कर रही है। समस्या यह है कि एअर इंडिया के प्रतिद्वंद्वियों को उन्हीं लोगों का समर्थन प्राप्त है, जिनके हाथों में एअर इंडिया की बागडोर है और जो उसके सभी महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं। ऐसे में वह कैसे प्रतिस्पर्धा कर पाएगी? 60 फीसदी से कम यात्री दबाव होने पर वह मूल्य निर्धारण के लिए किसी भी तरह के फैसले ले सकती है, जो उसके प्रतिद्वंद्वियों को मैदान से बाहर करने के लिए काफी हैं। लेकिन क्या उसे ऐसा करने दिया जाएगा? क्या उसे अपने सर्वाधिक मुनाफे वाले हवाई मार्गो को पुन: प्रारंभ करने दिया जाएगा, जिन्हें जानबूझकर बंद करते हुए दूसरी एयरलाइनों के हवाले कर दिया गया? एअर इंडिया को फंड की एक तगड़ी खुराक और बिना किसी हस्तक्षेप के अपने व्यावसायिक फैसले लेने की स्वतंत्रता के सिवा वास्तव में और कुछ नहीं चाहिए।
लेकिन क्या राजनीतिक नेतृत्व और एअर इंडिया के व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी ऐसा होने देंगे? खैर, एक नए मंत्री ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय का जिम्मा संभाला है और संभव है कि वे अभी तक मौजूदा स्थितियों से अप्रभावित ही हों। शायद वे उचित कदम उठाएं और हमारी राष्ट्रीय एयरलाइन की रक्षा कर पाएं।

प्रीतीश नंदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।
 

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