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डगर कठिन है इस बार भाजपा की गुजरात में एक नेता का उदय तिकड़ी से घिरे तो बदल गई भाषा ! यहां अवैध शराब ही आजीविका है
यह चौहत्तर आंदोलन की वापसी है !

अंबरीश कुमार 
लखनऊ ,अप्रैल । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन को जयप्रकाश आंदोलन की ताकतों ने समर्थन कर इसे चौहत्तर आंदोलन की वापसी बताया है । उत्तर प्रदेश की राजधानी समेत कई जिलों में अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में अभियान शुरू हो गया है । अब विश्वविद्यालयों में इसकी आंच पहुंचने लगी है । अन्ना हजारे के आंदोलन और जयप्रकाश आंदोलन में कई समानताएं भी है । तब भी केंद्र में कांग्रेस थी और आज भी कांग्रेस है । चौहत्तर में जयप्रकाश नारायण तिहत्तर के थे तो मंगलवार को दिल्ली में धरना पर बैठने वाले अन्ना हजारे बहत्तर साल के है । न तो जेपी चुनाव लड़े और न ही अन्ना । भ्रष्टाचार के खिलाफ जेपी ने ही सबसे पहले १९७४ में स्वीडन की तर्ज पर भारत में लोकपाल की बात कही तो आज अन्ना भी लोकपाल की मांग कर रहे है । यह वह बातें है जो यहां गोमती नदी के किनारे अन्ना आंदोलन के समर्थन में चल रहे धरना में चर्चा का विषय बनी हुई है । यहाँ आज धरना पर वकीलों और डाक्टरों का भी एक जत्था पहुंचा जिनकी एकता से यह आंदोलन और तेज होने वाला है । लखनऊ में जो लोग धरना पर बैठे है उनमे दो लोग १९७४ आंदोलन में भूमिगत होकर काम कर रहे थे । इनमे एक राजीव हेम केशव है जो उस दौर में आईआईटी की शिक्षा छोड़ आंदोलन में कूद गए और बाद में जयप्रकाश नारायण की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े । इसी तरह चौहत्तर आंदोलन के ही अखिलेश सक्सेना भी कई दशक बाद फिर उस दौर को याद करते हुए धरना पर बैठे हुए है । मामला सिर्फ यही तक नही सीमित है बल्कि और आगे जाने वाला है भले ही दिल्ली में सरकार से बातचीत होकर यह आंदोलन समाप्त हो जाए । इसकी मुख्या वजह यह है कि देश के विभिन्न इलाकों में चल रहे आंदोलन को अब एक नया और मजबूत चेहरा मिल गया है अन्ना हजारे का ।जेपी आंदोलन से निकले छात्र युवा संघर्ष समिति के आंदोलनकारियों ने इस साल के शुरू में जो संघर्ष वाहिनी मंच बनाया था उसने समूचे देश में अपने कार्यकर्ताओं से अन्ना हजारे के समर्थन में धरना और प्रदर्शन का एलान किया है । मंच के प्रतिनिधि के रूप में राकेश रफीक खुद अन्ना हजारे के साथ दिल्ली में धरना पर बैठे हुए है । मंच की ११ अप्रैल को बिहार के मुज्जफरपुर में होने वाली बैठक में इस आंदोलन को लेकर चर्चा भी होगी और आगे की रणनीति बनाई जाएगी ।दूसरी तरफ वाम तकते भी इस आंदोलन से जुड़ गई है । जन संघर्ष मोर्चा ने कई जिलों में अन्ना हजारे के समर्थन में धरना दिया और आगे भी जारी रखने का एलान किया है । मंच के संयोजक अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने कहा - अन्ना हजारे की मांग पर केंद्र सरकार का नजरिया अलोकतांत्रिक है । केंद्र का जवाब संसदीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाने वाला है ।
लखनऊ के झूलेलाल पार्क स्थित धरना स्थल पर अन्ना हजारे के समर्थन में नौजवान से लेकर बुजुर्ग तक शामिल है । इनमे ज्यादातर विश्विद्यालय के शिक्षक ,छात्र ,वकील ,सरकारी कर्मचारी ,डाक्टर और सामाजिक कार्यकर्त्ता है जिन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की लडाई से उम्मीद की नई किरण नजर आ रही है । लखनऊ विश्विद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव राजेंद्र बहादुर सिंह धरना पर बैठे है और उन्हें आंदोलनों का दौर याद आ रहा है । अस्सी के दशक में लखनऊ विश्विद्यालय थिंकर्स काउंसिल ने बदलाव की जो राजनीति शुरू की उसमे बड़ी संख्या में छात्र और छात्राए जुड़ी । तब कई आंदोलन भी हुए पर बाद में छात्र राजनीति में अपराधियों की दखल बढ़ी और इस तरह की गतिविधिया बंद हो गई ।इसमे भाजपा से लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सभी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया । अन्ना हजारे के आंदोलन से फिर छात्रों में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है । यदि परिसर में इम्तहान न चल रहे होते तो माहौल और गर्म हो जाता ।सिर्फ लखनऊ ही नहीं कई जिलों में अन्ना हजारे को लेकर आंदोलन शुरू हुआ है ।गोरखपुर ,वाराणसी ,इलाहाबाद जैसे कई शहरों से आंदोलन की ख़बरें आ रही है । दरअसल देश को जिस एक चेहरे की तलाश थी वह सामने आ चुका है । जेपी आंदोलन के राजीव हेम केशव जो इस समय संघर्ष वाहिनी मंच के राष्ट्रीय संयोजक है वे अन्ना हजारे और जयप्रकाश आंदोलन में कई समानताए देख रहे है । राजीव ने कहा - जयप्रकाश नारायण १९७४ में अगस्त के महीने में जब लखनऊ आए तो उनकी दो सभाएं हुई जिनमे एक लखनऊ विश्विद्यालय छात्र संघ भवन परिसर में तो दूसरी बेगम हजरत महल पार्क में जिसमे काफी लोग आए थे । तब भी जेपी ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए स्वीडेन के ओम्बड्समैन की तर्ज पर लोकपाल की बात कही थी ।आज अन्ना हजारें ने भी यह मुद्दा उठाया है जिसको उसी तरह से व्यापक समर्थन मिल रहा है । बिहार में नितीश कुमार की सरकार की छवि अलग है इसलिए यह मुद्दा वहा उस तरह से नहीं उठ रहा जैसे अन्य राज्यों में उठ रहा है ।इसे चौहत्तर आंदोलन की वापसी मानना चाहिए जो इस बार और आगे तक जा सकता है । क्योकि उत्तर से दक्षिण तक भ्रष्टाचार का सवाल लोगों को मथ रहा है ।अन्ना हजारे ठीक जेपी की तरह सामने आए है जिससे लोगों को काफी उम्मीद भी नजर आ रही है ।
विभिन्न जन संगठन अन्ना के आंदोलन को ताकत देने में जुट गए है तो राजनैतिक दलों को भी देर सबेर सामने आना ही पड़ेगा । उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार और वसूली के चलते कुछ जान दे रहे है तो कुछ की जान ले ली जा रही है। ऐसे में कर्मचारियों से लेकर छात्र ,शिक्षक ,डाक्टर ,वकील और सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं का एक मंच पर आना एक बड़े आंदोलन का साफ़ संकेत दे रहा है । यह कांग्रेस के साथ बसपा के लिए भी खतरे की घंटी है ।jansatta

 

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