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एशिया से गाजा तक कारवां

संदीप
मुम्बई के एक गांधीवादी पृष्ठभूमि के युवा कार्यकर्ता फिरोज मीठीबोरवाला ने एक सपना देखा। भारत से गाजा, फिलीस्तीन, के लोगों के संघर्ष के समर्थन में एक यात्रा निकाली जाए। 27 दिसम्बर, 2008, को इजराइल ने गाजा पर एक हमला किया जो 22 दिनों तक चला और उसमें 1366 फिलीस्तीनी मारे गए। उसके बाद से इजराइल ने गाजा की नाकेबंदी कर रखी है। तब से दुनिया के कोने-कोने से इस नाकेबंदी को तोड़ने के उद्देश्य से फिलीस्तीनी लोगों के समर्थन में कई कारवां आयोजित किए गए हैं। इसमें कुछ गाजा पहुंचने में नाकाम भी रहे। 31 मई, 2010, को तुर्की से पानी के जहाजों से जो राहत सामग्री गाजा ले जाई जा रही थी उस पर इजराइल ने हमला कर दिया। मावी मारमारा नामक जहाज पर सवार 560 लोगों में से 9 मारे गए व एक अभी भी कोमा में है।
एशिया से आयोजित किया गया यह पहला कारवां था। 2 दिसम्बर, 2010, को राजघाट से इस कारवां को कांगेस नेता दिग्विजय सिंह व मणि शंकर अय्यर, योजना आयोग की सदस्या सईदा हमीद व राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हर्षमंदर ने हरी झंडी दिखा कर रवाना किया। पाकिस्तान ने कारवां के सभी सदस्यों को पाकिस्तान आने के लिए वीजा नहीं दिया और न ही कारवां को बलूचिस्तान से गुजरने की अनुमति। चूंकि कारवां में सबसे ज्यादा, पचास से ऊपर, हिन्दुस्तानी ही थे और पाकिस्तान का यह आरोप है कि भारत की खुफिया संस्था रॉ बलूचिस्तान में स्वायत्ता के लिए चल रहे आंदोलन का सहयोग कर रही है, भारतीयों को बलूचिस्तान से गुजरने देना एक संवेदनशील विषय था। अतः कारवां के एक जापानी सदस्य साकागूची को छोड़ कर शेष भारतीय सदस्य लाहौर से भारत वापस लौट आए। साकागूची ने तय रास्ते से एक पाकिस्तानी सह-यात्री नियाज अहमद के साथ कारवां का पाकिस्तानी हिस्सा पूरा किया। शेष भारतीय साथी हवाई मार्ग से तेहरान व वहां से जाहेदान पहुंचे। पाकिस्तान में बलूचिस्तान से होता हुआ मार्ग ईरान में जाहेदान में ही निकलता है। जाहेदान ईरान के सिसतान व बलूचिस्तान राज्य की राजधानी है।
जाहेदान, केरमान, एसफहान व कुम होते हुए कारवां सड़क मार्ग से 12 दिसम्बर को तेहरान पहुंचा। तेहरान विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद शामिल हुए। उन्होंने कहा कि फिलीस्तीन का मुद्दा सिर्फ अरब व इजराइल अथवा मुसलमानों व यहूदियों के बीच का मसला नहीं है बल्कि मानवाधिकार हनन का एक वैश्विक स्तर का मुद्दा है जिसकी चिन्ता हरेक लोकतंत्र पसंद व संवेदनशील इंसान को होनी चाहिए। राष्ट्रपति अहमदीनेजाद कई कारवां सदस्यों के साथ गर्मजोशी से गले मिले। उनकी सादगी ने सबको प्रभावित किया। आज भी वे एक सामान्य से घर में रहते हैं जो उन्हें इंजीनियरिंग के प्रोफेसर के रूप में मिला था। फिर ईरान की संसद मजलिस-ए-शूरा में एक बैठक हुई जिसमें ईरान के नौ संासदों को महात्मा गांधी की आत्मकथा की प्रतियां भेंट की गईं। ईरान के सांसदों ने अपनी तनख्वाह से तथा वहां बने फिलीस्तीन राहत कोष से करीब सत्तर लाख रुपयों की मदद कारवां के माध्यम गाजा भेजने का फैसला किया। ईरान में जनता ने जगह-जगह सड़कों पर कारवां का स्वागत किया। नौजवान कुछ दूर तक अपनी मोटरसाइकिलों व गाड़ियों में फिलीस्तीन के झंडे लिए कारवां के साथ चलते थे। ईरान में कारवां के प्रति लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। ईरान से मोहर्रम के समय इस कारवां के निकलने के कारण उसका महत्व बढ़ गया। चूंकि इस कारवां पर इजराइल के हमले की आशंका थी लोग इसे इमाम हुसैन की शहादत से जोड़ कर देखने लगे।
इसके बाद कारवां ने तुर्की में प्रवेश किया। कारवां तुर्की के कुर्द इलाके से गुजरा। तुर्की में कारवां का स्वागत एक गैर सरकारी संस्था इंसानी यर्दिम वक्फी ने किया। यह वही संस्था है जिसने पांच पानी के जहाजों से तुर्की से गाजा राहत का सामान भेजा था और 31 मई को इस कारवां के मावी मारमारा नामक जहाज पर इजराइली सैनिकों ने हेलीकॉपटर से उतर कर नौ तुर्की नागरिकों को मार डाला था और कइयों को घायल कर दिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग ने इस घटना में छह तुर्की नागरिकों को तो इजराइली सैनिकों द्वारा सीधे मौत के घाट उतारे जाने की बात कही है। इसके बाद तुर्की व इजराइल के सम्बन्ध खराब हो गए। तुर्की इजराइल से इस हमले के लिए माफी मांगने को कह रहा है तथा जो मारे गए हैं उनके परिवार वालों को मुआवजा देने को। किन्तु इजराइल इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है। दियारबाकिर नामक शहर में कारवां अली हैदर बेंगी की कब्र पर भी गया जो 31 मई को इजराइली हमले में मारे जाने वालों में से एक था।
तुर्की से कारवां सीरिया पहुंचा। सीरिया में भी कारवां का काफी गर्मजोशी से स्वागत हुआ। सीरिया में कारवां का स्वागत वहां रह कर काम कर रहे फिलीस्तीनी नेता खालिद मेशाल ने भी किया। खालिद मेशाल हमास नामक संगठन जिसने फिलीस्तीन में हुआ पिछला चुनाव जीता था और जिसकी गाजा में सरकार है के बड़े नेता हैं। खालिद मेशाल ने महात्मा गांधी के अंग्रेजों की औपनिवेशिक हुकुमत के खिलाफ संघर्ष को याद किया। उन्होंने उन दो हिन्दुस्तानी व पाकिस्तानी परिवारों को धन्यवाद दिया जो कारवां का हिस्सा थे व साथ ही उन परिवारों को भी धन्यवाद दिया जिनके सदस्य कारवां में चल रहे थे। उन्होंने कारवां का डमैस्कस में स्वागत करते हुए उम्मीद जताई कि वे एक दिन कारवां का स्वागत मुक्त गाजा में व अंततः मुक्त फिलीस्तीन में जेरूसलम में करेंगे। उन्होंने कहा कि फिलीस्तीन में यहूदी, मुस्लिम व ईसाई तीनों मिल कर समान नागरिक अधिकारों के साथ रहेंगे। डमैस्कस में कारवां को यरमूक शरणार्थी शिविर भी ले जाया गया जहां करीब एक लाख फिलीस्तीनी शरणाथीै रहते हैं। सीरिया में कुल 5-6 लाख फिलीस्तीनी शरणाथीै रहते हैं।
23 दिसम्बर, 2010 को कारवां दो दिनों की यात्रा पर लेबनान पहुंचा। इजराइल ने 1975 में लेबनान पर हमला किया था व 1982 में बेरूत पर कब्जा कर लिया था जो 1948 में जेरूसलम के बाद दूसरी अरब राजधानी थी जिसने इजराइल के सामने घुटने टेके। पंद्रह साल बाद ही इजराइल ने लेबनान से हटना शुरू किया और 2006 में ही जाकर हिजबुल्ला नामक गैर-सरकारी सेना ने इजराइल को पीछे ढकेला। लेबनान की खुद की सेना उसकी सुरक्षा कर पाने में नाकाम रही।
30 दिसम्बर को सीरिया के लताकिया नामक बंदरगाह पर सलाम नामक एक समुद्री जहाज पर गाजा ले जाया जाने वाला राहत का सामान लादा जाने लगा। इसमें चार एम्बुलेंस व पंद्रह ट्रक दवाइयां, खाने का सामान, बच्चों के लिए खिलौने व किताबें शामिल थे। लताकिया के राज्यपाल व स्थानीय बाथ राजनीतिक दल के प्रमुख, जो पहले भारत में सीरिया के राजदूत भी रह चुके हैं, ने इस जहाज को 1 जनवरी, 2011, को मिस्र के लिए रवाना करवाया।
मिस्र ने 120 कारवां सदस्यों को अपनी सीमा में प्रवेश की अनुमति दी। उसने ईरान के किसी भी सदस्य, जिसमें सात सांसद भी शामिल थे, और जॉर्डन के छह नागरिकों को यह अनुमति नहीं दी। मिस्र के ईरान से पिछले तीस सालों से सम्बन्ध खराब हैं। कारवां के सामने एक धर्म संकट खड़ा हो गया। कुछ सदस्यों को छोड़ कर कारवां आगे कैसे बढ़ सकता था? किन्तु अन्त में ईरान के साथियों की ऐसी राय थी कि फिलीस्तीन के लोगों के दुख-दर्द को देखते हुए वहां पहुंचना अत्यंत आवश्यक है। अतः उनकी राय थी कि कारवां को आगे बढ़ना चाहिए।
120 में से आठ कारवां सदस्य पानी के जहाज पर राहत के सामान के साथ थे। इसमें चार हिन्दुस्तानी, एक जापानी, एक इण्डोनेशिया से, एक मलेशिया से तथा एक अजरबाईजान से थे। हिन्दुस्तानी में महाराष्ट्र से दो बार सांसद रहे ब्रिगेडियर सुधीर सावंत व पत्रकार अजीत साही शामिल थे। शेष लोग हवाई मार्ग से मिस्र में अल अरिश पहुंचे। मिस्र हवाई अड्डे पर कारवां को चार घंटे रोके रखा गया। अंत में जब कारवां के सदस्यों ने धरना दिया और नारेबाजी की तब कारवां को गाजा जाने दिया गया। कारवां ने 2 व 3 जनवरी की मध्य रात्री गाजा में प्रवेश किया। गाजा पहुंचने पर कारवां का जोरदार स्वागत हुआ तथा मध्य रात्रि को ही राफा सीमा पर एक प्रेस वार्ता हुई।
पानी के जहाज से राहत का सामान ले कर पहुंचे कारवां सदस्यों को ज्यादा कष्ट झेलना पड़ा। दो दिनों तक उनको अल अरिश बंदरगाह पर ही रोके रखा गया। सिर्फ बंदरगाह पर उतरने के लिए पांच हजार डॉलर की घूस मांगी जा रही थी। आठों सात्रियों के पास कुल मिला कर 2100 डॉलर ही निकले। वही देकर वे छूटे। उन्हें चार एम्बुलेंसें देकर कहा गया कि उन्हीं से वे निकल जाएं। इसके दो दिनों के बाद चार ट्रक दवाओं के राफा सीमा से गाजा के अंदर ले जाने के लिए मिस्र के अधिकारियों ने दलालों के माध्यम से साढ़े बारह हजार डॉलर घूस ली।
इजराइल की नाकेबंदी से निपटने के लिए मिस्र के रास्ते ही सुरंगों से मिस्र के अधिकारियों को घूस देकर सारा जरूरी सामान गाजा के अंदर पहुंचाया जाता है हलांकि मिस्र व गाजा के औपचारिक रिश्ते काफी खराब रहे हैं।
गाजा के अंदर कारवां का काफी स्वागत हुआ। प्रधान मंत्री इस्माइल हानिया ने पूरे दल का अपने कार्यालय में स्वागत किया तथा भोज दिया। उन्होंने कहा कि इस किस्म के कारवां के गाजा पहुंचने से फिलीस्तीन के लोगों का मनोबल और मजबूत होता है। सिवाए कुछएक ध्वस्त भवनो को छोड़ दें या विभिन्न परिवारों में शहीद हुए सदस्यों की तस्वीरें छोड़ दे ंतो फिलीस्तीन में मालूम नहीं होगा कि यहां इजराइल इतने लम्बे अर्से से कहर बरपा रहा है। फिलीस्तीन के बहादुर लोगों ने पूरे स्वाभिमान के साथ जन-जीवन को सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया है। विद्यालय, अस्पताल, कार्यालय, बाजार सब कुछ सामान्य रूप से चल रहे होते हैं। ये भी फिलीस्तीन के लोगों का एक प्रतिरोध का तरीका है। इजराइल के सामने वे कतई समर्पण करने को तैयार नहीं हैं। हमास नामक संगठन जिसकी गाजा में सरकार है के एक वरिष्ठ नेता महमूद अल जहार के दो बेटे इजराइल के साथ संघर्ष में शहीद हो चुके हैं। फिलीस्तीन के लोगों ने अपने स्वाभिमान के खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है।
कारवां के गाजा में अंतिम दिन अमरीका के भूतपूर्व एटर्नी जनरल विलियम रामसे क्लार्क ने विश्वविद्यालय में अपने भाषण में कहा कि फिलीस्तीन के लोगों की लड़ाई जायज है तथा उन्हें उनके कानूनी अधिकारों से वंचित रखा गया है। उन्होंने हमास, जिसे अमरीका व इजराइल आतंकी संगठन मानते हैं, की चुनाव में जीत कर आने की वजह से फिलीस्तीन की सरकार चलाने की वैधता को स्वीकार किया। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि फिलीस्तीन के लोग अपने मकसद में कामयाब हों इसके लिए हमास व फतह के वर्तमान में चल रहे मतभेद दूर होने जरूरी हैं।
 

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