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दीव का समुद्र चंचल का चैनल कोलकता में यहूदी और सायनागॉग मेधा ने पूछा ,ये जग्गी वासुदेव हैं कौन ?
क्या तुम धार्मिक हो?

खुशवंत सिंह
अपनी सालाना भारत यात्रा के दौरान मुझसे मिलने आए झाबवाला दंपती से मैंने पूछा : ‘हम एक-दूसरे को कितने सालों से जानते हैं?’ वे दिल्ली में कई साल रहे हैं। उनकी तीनों बेटियों का जन्म भी दिल्ली में ही हुआ था। झाबवाला आर्किटेक्ट हैं, जबकि उनकी पत्नी रूथ सुविख्यात उपन्यासकार हैं। रूथ के सभी उपन्यास मध्यवर्गीय लोगों के जीवन पर आधारित हैं। उनका सबसे चर्चित उपन्यास है हीट एंड डस्ट, जिसके लिए उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। उनके अधिकांश उपन्यासों पर इस्माइल मर्चेट और जेम्स आइवरी ने फिल्में बनाई हैं। इस्माइल की मौत से रूथ को गहरा आघात पहुंचा था।
फिर एक दिन अचानक उन्होंने अमेरिका जाने का फैसला कर लिया। उनके इस फैसले की वजह मैं नहीं जान पाया। उन्होंने न्यूयॉर्क में बसेरा बनाया। लेकिन उनकी बड़ी बेटी रेनाना ने भारत नहीं छोड़ा। वे अहमदाबाद चली गईं और इला भट्ट की संस्था ‘सेवा’ (सेल्फ एंप्लाइड वूमेन्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) के लिए काम करने लगीं। उन्होंने हरीश खरे से विवाह किया, जो कई प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबारों में काम कर चुके हैं और फिलहाल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार हैं। झाबवाला दंपती अपनी बेटी और अन्य मित्रों से मिलने अपनी सालाना यात्रा पर भारत आए थे। एक समय नीरद चौधुरी, उनकी पत्नी, मैं और मेरी पत्नी उनके बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते थे। अब इनमें से मेरे सिवाय कोई जीवित नहीं है। लिहाजा वे मुझसे मिलने चले आते हैं। मेरे घर पर एक शाम बिताते हैं। मेरी बेटी माला दयाल और नातिन नैना दयाल को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पर डिनर कराने ले जाते हैं।
मैंने एक बार फिर अपना सवाल दोहराया : ‘हम एक-दूसरे को कितने सालों से जानते हैं?’ झाबवाला ने हाथों को हिलाकर इशारा किया कि उन्हें याद नहीं। लेकिन रूथ के मन में कोई संदेह नहीं था। उन्होंने जवाब दिया : ‘इक्यावन साल।’ इसका मतलब यह था कि हम एक-दूसरे से आधी सदी से भी अधिक समय से परिचित थे। मुझे पता था कि रूथ यहूदी परंपरा से बहुत जुड़ाव महसूस करती हैं, इसलिए मैंने उनसे पूछा : ‘क्या तुम धार्मिक हो?’ उन्होंने जवाब दिया : ‘शायद नहीं।’ मैंने फिर पूछा : ‘क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखती हो?’ इस बार उन्होंने कुछ टालमटोल करते हुए जवाब दिया : ‘पता नहीं।’ मैंने पूछा : ‘मृत्यु के बाद हम कहां चले जाते हैं?’ इस बार झाब ने अपनी पारसी आस्था के आधार पर जवाब दिया कि मृत्यु के बाद हम एक पुल पर एकत्र होते हैं, जहां यह जांचा जाता है कि हम एक अच्छे व्यक्ति थे या बुरे और उसी के आधार पर हमें स्वर्ग या नर्क भेजा जाता है। जाहिर था कि उन दोनों में से कोई भी पूरी तरह इस बात के प्रति आश्वस्त नहीं था। इसके बावजूद जब वे मेरे यहां से विदा हुए तो मैंने देखा कि रूथ जाते-जाते मेरे दरवाजे पर रुक गईं। उन्होंने वहां स्थित पवित्र मजूजा धर्मलेख को गहन आस्था के साथ चूमा और फिर बाहर चली गईं।

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हमारे राष्ट्र के निर्माता :
रातोंरात अमीर हो जाने में
भला क्या हर्ज है?
क्या हर्ज है आखिर
ऐशोआराम की जिंदगी जीने में?
हमारे इर्द-गिर्द ही कुलांचे भर रहे हैं
ढेरों अवसर।
मिसाल के तौर पर
कागज पर बनाएं एक कॉलोनी
या चलाएं एक फर्जी कंपनी
और चंपत हो जाएं लेकर
लोगों की मेहनत की कमाई।
या राजा के साथी बाचा की तरह
शामिल हो जाएं हत्या या
आत्महत्या के सौदे में।
हमारा देश एक मुक्त राष्ट्र है,
इसलिए यह है हमारे लिए
एक बेहतरीन अवसर।
घपले करें, घूस खिलाएं
और पहुंच जाएं
सौभाग्य के वृक्ष के शीर्ष पर।
समय आ गया है
एकजुट हो जाएं देशभर के जालसाज।
वे संघर्ष करें संसद के परिसर में
अपनी प्रतिमाएं लगवाने के लिए।
वे ईश्वर की महान कृतियां हैं
और हमारे राष्ट्र के निर्माता।
(सौजन्य : कुलदीप सलिल, दिल्ली)

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दवाई का प्रिस्क्रिप्शन : एक भद्र महिला एक फार्मेसी में गई और सीधे जाकर फार्मासिस्ट से कहा : ‘मैं सायनाइड खरीदना चाहती हूं।’ फार्मासिस्ट ने पूछा : ‘क्यों?’ उसने जवाब दिया : ‘मैं अपने पति को सायनाइड खिला देना चाहती हूं।’ फार्मासिस्ट हैरान रह गया। उसने कहा : ‘मैं आपको सायनाइड नहीं दे सकता। यह गैरकानूनी है। अगर मैंने आपको सायनाइड दिया तो मेरा लाइसेंस छिन जाएगा। पुलिस हम दोनों को जेल में कैद कर देगी। मैं बरबाद हो जाऊंगा।’ महिला चुप रही। फिर उसने अपने पर्स में हाथ डाला और उसमें से एक फोटो निकाला। फोटो में उसका पति फार्मासिस्ट की पत्नी के साथ था। फार्मासिस्ट ने फोटो देखा और कहा : ‘आपने पहले क्यों नहीं बताया कि आप दवाई के लिए प्रिस्क्रिप्शन भी लेकर आई हैं!’
(सौजन्य : विपिन बख्शी, दिल्ली)

खुशवंत सिंह
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 

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