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सौतेला बेटा है  पुरूलिया

  पूर्णेंदु शुक्ल 

मेरा नाम पुरूलिया है। सौतेला ही सही मैं बंगाल के 19 बेटों (जिलों) में से एक हूं। खैर, मेरा नाम सुर्खियों में दिसम्बर 1995 के दौरान आया था जब एक लातिवियाई एयरक्राफ्ट ने हथियारों का जखीरा हवा से मेरी ज़मीन पर फेंका था। मुझ से  लगे हुए धनबाद, बर्धमान और जमशेदपुर औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित हैं। पर मैं उनसे घिरा होकर भी औद्योगिक विकास से कोसों दूर हूं। मेरे बच्चे छोटी-छोटी नौकरियों के लिए मारे-मारे फिरते हैं। परिसीमन से पहले मेरे अन्दर विधानसभा की 11 सीटें थीं, अब घटकर 9 हो गई हैं। फिलहाल 11 सीटों में से 9 पर वाममोर्चे का कब्जा 30 सालों से भी ज्यादा समय से लगातार बना हुआ है। 34 सालों से वाममोर्चे की सरकार है। पर मुझे आज भी विकास का इंतजार है। मेरे अंदर 20 ब्लॉक हैं। 2001 में मेरी कुल आबादी 25 लाख से ज्यादा थी। मेरे पांच बच्चों में पहला दलित और दूसरा आदिवासी है।  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मेरे 55 फीसदी से ज्यादा बच्चे साक्षर हैं। पर सच बताऊँ ये सफेद झूठ है। मेरे ज्यादातर बच्चों के लिए काला अक्षर भैंस बराबर है। मेरे पांच बच्चों में 2 बच्चों को दो जून की रोटी के लाले हैं। मेरे 90 फीसदी बच्चे गांवों में रहते हैं। मेरा एक तिहाई क्षेत्र जंगल है। 9 में से 3 विधानसभाएं माओवादी हिंसा से प्रभावित है और सीपीएम समर्थित गुण्डावाहिनी (हरमद) से भी। मेरे आदिवासी बच्चे (खासकर संथाल) हाथों में आग के गोले लिए घूम रहे हैं। उन्हें  बतलाया गया है कि सीपीएम के स्थानीय नेता तुम्हारे पिछड़ेपन के जिम्मेदार है। मेरे आदिवासी बच्चे बदला लेने के लिए उनकी तलाश में घूम रहे हैं। मेरे धरती रोज-बरोज लहूलुहान हो रही है। बीते साल 17 दिसम्बर को झालदा में फॉरवर्ड ब्लॉक के 7 लोग मौत के घाट उतार दिए गए। इन आदिवासी बच्चों की तलाश में अर्द्धसैनिक बलों की टुकड़ियां दिन-रात खाक छान रही हैं। जो इलाके दुर्गम बताए जाते थे, जो आजा़दी के छह दशक बाद भी विकास से दूर थे वहां अब अर्द्धसैनिक बलों के आने-जाने के लिए सड़कें बनाई जा रही हैं। सीपीएम ने भी आत्मरक्षा के नाम पर एक गुण्डावाहिनी (हरमद कैम्प) बनाई है जिसे पार्टी और सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त है।
इन घटनाओं से सबसे ज्यादा दुखी मैं (पुरूलिया) हूं। मुझे पता था ये सब होगा एक दिन। सड़क, पानी, बिजली, रोज़गार का दशकों से इंतजार कर रहे आदिवासी किसी ना किसी दिन तो अपना धैर्य खोते ही। और हुआ भी वही। पर इससे भी ज्याद दुखद ये है कि वो जिस राह पर हैं उससे हासिल कुछ नहीं होने वाला। स्थानीय सीपीएम नेताओं को मारकर कौन सी क्रांति हो जाएगी।
हर समय गरीबी और गरीबों की बात करने वाले सीपीएम के लोग इस हालात के ज़िम्मेदार हैं। पूरे जिले में पार्टी की सत्ता चलती है। पुलिस थाने में केस दर्ज करने से लेकर तमाम दूसरी चीज़ों के लिए भी पार्टी के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ती है। पुलिस और प्रशासन सब कुछ सीपीएम पार्टी की मर्जी से चलता है।अगर आप पुरूलिया के बदहाली पर सवाल उठाएंगे तो जवाब में आपको यूपी, बिहार के और ज्यादा बदहाल जिलों की सूची थमा दी जाएगी। सवाल उठता है कि अगर सीपीएम का शासन इतना बुरा रहा है तो लगातार चुनाव जीतने का क्या राज है\ पुरूलिया के लोग जानते हैं कि सीपीएम चुनावों को किस तरह साम, दाम, दण्ड, भेद से जीतती आई है। पुरूलिया के लोग तृणमूल से प्यार नहीं करते पर सीपीएम को इस बार सत्ताद में आते हुए देखना नहीं चाहते।
   
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