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गांधी, अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार

असगर अली इंजीनियर
अन्ना हजारे एक अन्य गांधी के रूप में उभर रहे हैं वो न कि सिर्फ सभी अखबारों की सुर्ख़ियों में है बल्कि वह समाचार पत्रिकाओं के हर पन्ने पर मौजूदगी दर्ज कर संयुक्त प्रगतिशील संगठन(यूपीए ) सरकार को लोक पाल बिल का ड्राट तैयार करने के लिये आठ सदस्यीय समिति में समाजिक संगठनों के प्रतिनिधित्व को शामिल करने की मुखर मांग भी कर रह है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास हज़ारे की मांग को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था जो कि इन दिनों कई घोटालों में बेनकाब हो चुकी है।
यूपीए सरकार के कुछ प्रमुख मंत्री व कुछ आला अफसर इस समय कई बड़े घोटालों जैसे 2जी व कामन वेल्थ खेल घोटालों में लिप्त होने की वजह से घेरे में और कमज़ोर विकट पर हैं। और वहीं दूसरी ओर आम जनता की तरफ से हज़ारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ भूखहड़ताल को अभूतपूर्व समर्थन मिलने से सरकार ने बहुत जल्दी ही हजारे की मांगों के आगे समर्पण कर दिया। अगर सरकार इस समय इन सब मुददों को लेकर घेरे में व कमजोर विकट पर न होती तो शायद हज़ारे के लिये यह समर्थन स्वभाविक तौर पर मिलना संभव न होता।
हज़ारे की प्रशंसा आज पूरे देश में हो रही है, वे हजारों समाजिक कार्यकताओं व नागरिक समाज के लिये प्रतीक बन गये हैं व उन्हें हज़ारे पर गर्व भी है। कुछ के द्वारा तो इस लड़ाई को आज़ादी की दूसरी लड़ाई की संज्ञा तक दे दी गई है। लेकिन यह सब प्रतिक्रियायें अल्प कालीन के लिये है जो कि एक भावुक माहौल में उत्पन्न हो रही हैं। हांलाकि इस जनउन्माद का भावनात्मक विशेलषण नहीं होना चाहिये। यहां इन तथ्यों को जांच करने की कोशिश तो की ही जानी चाहिये कि इस तरह के उदभावों के क्या दूरगामी असर होगें व क्या यह वास्तव में नैतिक जीत है जैसा कि इस आंदोलन को प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस जनउन्माद द्वारा हज़ारे को गांधीवादी की संज्ञा दी गयी है व उनके संघर्ष को भी गांधीवादी करार दिया गया है। मुझे लगता है कि सबसे पहले हमें संक्ष्प्ति में गांधीवादी मूल्य क्या हैं इसे दोहराना चाहिए और ठोस आधार पर गांधावादी संघर्ष कैसा होना चाहिये इस पर बात करनी चाहिए? गांधीवादी संघर्ष के मुख्य तौर पर तीन अंग हैं जिसमें सत्य, अहिंसा व बिल्कुल सादी जीवन शैली प्रमुख है। इन तीनों प्रकार में एक अंग हज़ारे के संघर्ष में जरूर शामिल है और वो हैं अहिंसा।
यह एक चर्चा का विषय है कि क्या अन्य दो प्रकार के गांधीवादी संघर्ष के मूल्य हज़ारे के संघर्ष में शामिल हैं या नहीं? अहिंसक आंदोलन भी लम्बे समय तक तभी ज़ारी रह सकता है जब उसका आधार केवल सत्य और सत्य के अलावा कुछ न हो। इसके साथ ही सत्य व अहिंसा को सतत बनाये रखने के लिये अत्यंत सादी जीवन शैली निहायत जरूरी है, इसके बिना सत्य किसी भी प्रकार से नहीं टिक पायेगा। इस लिहाज से देखा जाए तो दूसरा गांधी पैदा करना काफी कठिन है।
अब हज़ारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ मिल रहे इस अभूतपूर्व समर्थन पर आते हैं। भ्रष्टाचार तो बुनियादी रूप से महंगी जीवन शैली, लालच, झूठ और फरेब पर टिका हुआ है। अब सवाल ये उठता है कि अन्ना के संघर्ष को किन तबकों से प्रतिक्रिया मिली? मुख्य तौर पर यह तीन तबकें हैं: मध्यम वर्ग, जिनकी जीवन शैली सादे जीवन से कहीं आगे है, गांधी की सादगी की तो बात ही छोड़ दे। साथ ही यहीं वो मध्यम वर्ग है जो कि अपने बड़े बड़े कारोबार में, अपने काम में व अपने निजि जीवन में ही कई तरह के भ्रष्टाचार से लिप्त हैं। उदाहरण के तौर पर जैसे रेल में बड़ी आसानी से एक बर्थ लेने के लिये घूस दे देना, शहरों में नगरपालिका के कर्मचारीयों व अधिकारीयों को घूस देना अपने घरों के आस पास अवैध भूमि व निर्माण करने के लिए सांठ गांठ करना, यहीं नहीं एक सरकारी अफसर होने के नाते बड़ी आसानी से घूस ले कर अवैध काम कराना आदि इनकी जीवन शैली में शामिल है।
यहीं मध्यम वर्ग अपने बच्चों को किसी प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल या प्राइवेट कालेज में भर्ती कराने के लिए बहुत बड़ी रकम रिश्वत के रूप में देता है। देखा जाये तो शायद ही ऐसा कोई काम है जिसमें यह मध्यम वर्ग भ्रष्टाचार में लिप्त न हो। इन वर्गो का तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का कोई नैतिक आधार व अधिकार भी नहीं बनता।
दूसरा तबका है, राजनैतिक वर्ग, जो कि हज़ारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ इस बिगुल में अपनी सुर से सुर मिला रहा है( हांलाकि किन्हीं कारणों से यह वर्ग अदृश्य रहा) जिसने नेपथ्य में रह कर नागरिक समाज के अपने केडर के तहत यूपीए सरकार को कमज़ोर करने के लिए लोगों को लामबंद किया। जो कि सच्ची मंशा नहीं है। तीसरे इस संघर्ष में वो तबका जुड़ा है जो कि भ्रष्टाचार की यह लड़ाई वास्तव में लड़ना चाहते हैं जिन्हें कहीं न कहीं गांधीवादी दर्शन व मूल्यों के नज़दीक कहा जा सकता है। लेकिन यहीं वर्ग इस जनगोल बंदी में सबसे कम संख्या में शामिल था।
यहां पर अन्ना हज़ारे और गांधी में क्या फर्क है उसको भी समझना जरूरी है। अन्ना के बारे में कहा जा सकता है कि वे ज्यादा से ज्यादा गांधीवादी है न कि गांधी। उन्होनें गांधी की पद्धति को अपनाया है न कुछ ज्यादा और न ही कुछ कम। गांधी सही रूप से एक विचारक थे व उनके पास एक गहरी समझदारी थी जिनकी इन मुददों के प्रति सच्ची मंशा थी और वो हमेशा अपने अंतरआत्मा की आवाज़ को सुनते थे। जिनकी मंशा सच्ची होती है केवल वे ही अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ सुन सकते है। इस आधार पर अन्ना की गांधी से कोई तुलना नहीं की जा सकती। अन्ना के पास वह गहरी समझदारी नहीं है और न ही प्रचंड बुद्धि और सच्ची मंशा।
ऐसा कहीं कोई रिकार्ड नहीं मिलता जहां अन्ना ने सामप्रदायिक हिंसा की भर्त्सना की हो। वे गुजरात दंगों के दौरान भी खामोश रहे। गुजरात में किये गये जातिय संहार ने भारत जैसे देश को दुनिया के आगे शर्मशार किया है। अगर गांधी जिंदा होते तो वे बेहिचक उन दंगों के दौरान भूख हड़ताल पर बैठ चुके होते चाहे उन्हें नागरिक समाज का समर्थन मिलता या नहीं। अहिंसा तो गांधी के लिये एक सिंद्धांत व दर्शन था न कि सिर्फ रणनीति।
यही नहीं हज़ारे ने मोदी के विकास कार्यो के माडल की तरीफ की। यहां यह सवाल उठता है कि क्या विकास जो हिंसा का कारण है उसे हिंसा से अलग किया जा सकता है? क्या विकास अपने आप में संपूर्ण है? अगर कोई भी विकास देश के कमज़ोर, वंचित तबको को मदद नहीं करता है तो ऐसे विकास के माडल का क्या मतलब है। गांधी चाहते थे कि देश में विकास का फायदा पायेदान में बैठे नीचले व्यक्ति तक पहुंचे, लेकिन मोदी द्वारा किये जा रहे विकास का फायदा केवल ताकतवर व अभिजात वर्गो, टाटा, रीलायंस व कारपोरेट घरानों को ही हो रहा है। तभी तो बड़े उद्योगपति उनमें प्रधानमंत्री बनने की क्षमता देखते हैं।
हज़ारे ने मोदी की तारीफ के बाद उठे विवाद की सफाई में सांप्रदायिक उन्माद के बारे में पूछे जाने पर कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि अपने एक साथी के उकसाने के बाद ही वे बोले की वह सांप्रदायिक सौर्हाद के पक्ष में है व सभी समुदाय खासतौर पर मुस्लिम समुदाय भी भ्रष्टाचार की इस मुहिम में शामिल हैं। यह वक्तव्य भी बाद में सोचने के बाद दिया वो भी उनके साथीयों के सुझाव पर जो कि उनसे ज्यादा र्धमर्निपेक्ष सोच रखते हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ नागरिक समाज से यह बड़ी गोलबंदी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी व फिरकापरस्त ताकतों जैसे बाबा रामदेव की साजिश का हिस्सा है, जो कि इस बात से आहत थे कि उनको ड्राफटिंग कमेटी में शामिल नहीं किया गया। फिरकापरस्त ताकतों के राजनैतिक दृष्टिकोण से इस तरह की जनगोलबंदी देश की सेक्यूलर स्वास्थ के लिये ठीक नहीं है। यह बेहद ही हानिकारक हो सकता है। हम लोग जानते है कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन जिसमें से मोदी भी निकले है का क्या नतीजा हुआ, जबकि जय प्रकाश नारायण अन्ना हजारे से बहुत ऊंचे थे।
जयप्रकाश नारायण के भष्टाचार विरोधी आंदोलन व उसके बाद वीपी सिंह द्वारा शुरू किये गये भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दूर गामी असर नहीं रहे, अगर होते तो हमें एक और अभियान की जरूरत नहीं होती। ये दोनेा प्रबुद्ध नेता अन्ना हजारे से काफी आगे थे। इसलिए अन्ना हज़ारे के आंदोलन को आज़ादी की दूसरी लड़ाई कह कर जश्न मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। मीडिया का भी अपना एक मकसद है हज़ारे के इस अभियान को खड़ा करने में।
देखा जाए तो हजारे पूरी तरह से मोदी के विकास माडल से प्रभावित है और वहीं दूसरी ओर मीडिया को बड़े उद्योगपतियों द्वारा नियंत्रण किया जा रहा है। और आजकल तो गांधी के नाम से कुछ भी किया जा सकता है तभी मीडिया को हजारे में गांधी नज़र आता है। गुजरात के जाने माने गंाधीवादी नेता श्री चुन्नीभाई वेदया ने भी हज़ारे द्वारा दिए गए मोदी के विकास कार्यो की प्रशंसा की काफी भर्त्सना की है। आखिर यह गामीण विकास है कहां? उन्होंने पूछा है। उनका कहना है कि अगर सही प्रकार से ग्रामीण विकास होता तो गुजरात की 10 फीसदी जनसंख्या शहरों में पलायन न करती। श्री वेदया ने 2011 की जनगणना के अनुसार कहा कि ‘ इन परिस्थियों में मोदी की तारीफ करना कहां तक औचित्यपूर्ण है।’
मल्लिका साराभाई द्वारा भी हज़ारे द्वारा मोदी की तारीफ की काफी आलोचना की गई है। उन्होंने कहा कि उल्टा मोदी के शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे कम विकास हुआ है, गांवों के चरागाह व किसानों के सिंचित जमींनों को छीन कर मोदी सरकार ने बड़े उद्योगपतियों को कोड़ीयों के भाव बेच दिया गया है। यहीं नहीं मोदी सरकार के द्वारा ग्रामीण इलाकों में ग्रामीणों का काफी उत्पीड़ बड़ा है।
उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार के अंदर ही राज्य में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ है जैसे सुजलाम-सुफलाम के तहत 1700 करोड़ का भ्रष्टाचार, जल संरक्षण घोटाला, बोरी बंद चैक डैम घोटाला व 600 करोड़ का मछली विभाग का घोटाला। इस समय मोदी सरकार द्वारा उद्योगपतियों को वजह से बहुत बड़ा कर्ज राज्य सरकार पर बकाया है।
गुजरात के अन्य समाजिक कार्यकर्ताओं जो कि विभिन्न मानवाधिकार संगठनों के साथ जुड़े हैं जैसे जुज़र बंदूकवाला, प्रजापति व अन्य ने भी गुजरात में किये गये विकास के भयानक तथ्यों को उजागर किया है व उन्होनें भी हजारे द्वारा मोदी की तारीफ किये जाने पर हजारे को चुनौती दी है। गांधीजी का ग्रामीण विकास पर बुनियादी रूप से ज़ोर था लेकिन हजारे द्वारा एक ऐसे व्यक्ति की तारीफ की जा रही है जिसने न सिर्फ अल्पसंख्यक तबके के नरसंहार को होने दिया बल्कि जिसने उद्योगों को ग्रामीण क्षेत्रों के एवज में प्राथमिकता दी है। साथ ही गांधीजी ने इंसानों खासतौर पर उस व्यक्ति को जो कि पायेदान पर सबसे नीचे खड़े हैं के सम्मान को सबसे ज्यादा महत्व दिया, जबकि मोदी के गुजरात में दलितों व अन्य दबे कुचले जातियों का कोई सम्मान नहीं है। आज भी मोदी द्वारा शासित गुजरात में प्राईमरी स्कूलों में दलित बच्चों को मध्यान्न भोजन अलग से परोसा जाता है व अगर कोई अध्यापक उन्हें साथ बिठाने की कोशिश करता है या तो उसका स्थांतरण हो जाता है नहीं तो उसे निलम्बित कर दिया जाता है। इन सब कड़वी सच्चाईयों के बारे में शायद हजारे सहाब वाकिफ नहीं है।
इन सब के बावजूद भी हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का हम स्वागत करते है व इसकी तारीफ होनी चाहिये पर अगर वे इस लड़ाई को लम्बे समय तक ज़ारी रखना चाहते हैं तो उन्हे उनका साथ छोड़ना होगा जो विभिन्न तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। गांधी जैसी निर्मलता व पवित्रता इस चुनौतीपूर्ण संघर्ष के लिए अनिवार्य है।
अनुवाद: रोमा

Centre for Study of Society and Secularism
Mumbai.
E-mail: csss@mtnl.net.in

 

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