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अन्ना हजारे की कर्मशाला

एमजे अकबर
हम विशाल वट वृक्ष की छांह तले बैठे थे। एक अचंभे की तरह का यह वृक्ष ईंटों की एक तल्ले वाली इमारत और मंदिर के ऊपर छाया हुआ था। पुणो से कार के सफर में करीब 90 मिनट दूर, रालेगणसिद्धि गांव में यही अन्ना हजारे की कर्मशाला है। हमारी बातचीत के दौरान उन्होंने बार-बार यह सवाल पूछा, कुछ बार मुझसे और कुछ बार लगा कि खुद से : अंग्रेजों के खिलाफ दीर्घकालीन, अहिंसक संघर्ष का मतलब आखिर क्या था? क्या हमने यह सब गोरे उपनिवेशवादियों को हटाकर ज्यादा गहरी चमड़ी वालों को रखने के लिए किया था?
दोपहर में हमने स्थानीय मकई, दही और रोटी वाला सादा खाना खाया, जो उनके एक जोशीले शुभचिंतक लेकर आए थे। हमारी बातचीत की जगह से कुछ दूर, यह एक छोटी, पर बहुत बढ़िया इमारत थी, जिसमें सोफों से अटा एक बंद-बंद-सा लिविंग रूम, डाइनिंग टेबल से जरा ही बड़ा डाइनिंग रूम और तुलनात्मक रूप से ज्यादा जगह वाला बाथरूम था। इसका निर्माण अन्ना के ट्रस्ट ने नहीं, बल्कि महाराष्ट्र सरकार ने कराया था।
ये तमाम सुख-सुविधाएं अन्ना के लिए नहीं जुटाई गई थीं, बल्कि महामहिम राज्यपाल के लिए थीं, जिन्होंने महाराष्ट्र के सबसे मशहूर गांव पर व्यक्तिगत कृपा बरसाने का निर्णय लिया था। स्पष्ट है कि उनके गौरव को ध्यान में रखकर गवर्नर के कार्यालय ने तय किया कि प्लास्टिक की कुर्सी या चारपाई राज्यपाल के लिए बहुत कष्टदायक हो जाएगी, इसलिए इस मकान को खड़ा किया गया, ताकि वे यहां दो घंटे का समय बिता सकें।
जब-जब अन्ना यह कहानी दोहराते हैं, उनके स्वर में इस अपव्यय की पीड़ा झलकती है। जब उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि आखिर वे क्यों जनता के धन को इस तरह बर्बाद कर रहे हैं, तो अधिकारियों ने प्रोटोकॉल का हवाला दिया। अन्ना कहते हैं, ऐसे प्रोटोकॉल को अंग्रेज सरकार के दौरान अनिवार्य माना जा सकता था, लेकिन आजाद भारत में भी इसके लिए जगह क्यों है?
अन्ना बताते हैं, युवावस्था के दौरान एक पल ऐसा भी आया था, जब उन्होंने बड़ी गंभीरता से आत्महत्या के बारे में सोचा था, क्योंकि वे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं ढूंढ़ सके थे। फिर संयोग से रेलवे बुकस्टॉल पर स्वामी विवेकानंद की एक किताब के पन्ने पलटते हुए उन्हें अपने अस्तित्व का उद्देश्य मिला : सेवा। निराला? निष्कपट? वह संसार, जो अगले प्रमोशन, अगली छुट्टी और कुछ अतिरिक्त आय की पतली गली पाने के लिए भयंकर संघर्ष में डूबा हुआ है, ऐसे संसार के लिए कुछ ज्यादा ही पुण्यात्मा?
उनकी मुस्कान निराशावाद के लिए औषधि की तरह है। संभवत: यही कारण है कि क्यों दिल्ली (जहां ज्यादातर मुस्कानें कालिख में डूबी होती हैं) ने उन्हें या तो बगुला भगत पाखंडी या और बेहतर, ‘सीधा-सादा’ कहते हुए खारिज कर दिया। दूसरा नाम दोस्तों का दिया हुआ है। यहां पर यह गौर करने की जरूरत है कि ताकत की दीवानी दिल्ली में सादगी कोई तारीफ वाला शब्द नहीं है। रालेगणसिद्धि में, जहां भावनाएं अभी खुदगर्जी से अछूती हैं, अन्ना को बहुत प्यार मिलता है, क्योंकि वे छल-कपट से अछूते हैं। उनका प्रथम नाम ‘अन्ना’ नहीं है।
अन्ना का मतलब होता है, बड़ा भाई। यह पदवी उनके प्रति सम्मान और लगाव का मिला-जुला रूप है, जिसमें उनके चरित्र की सुगंध समाई है। जब अन्ना अनशन पर गए, तो उनकी इस सुगंध ने शहरी भारत के युवावर्ग में बहुप्रतीक्षित आग प्रज्वलित कर दी, क्योंकि युवाओं ने सहजता से तत्काल समझ लिया कि अन्ना का पारितोषिक इस बात में निहित है कि वे क्या दे सकते हैं, न कि वे क्या ले सकते हैं।
उनकी लद्दू गाड़ी में जो टोली है, उसकी बेशक एक अलग कहानी है। हिंदी लोकोक्ति ‘शिवजी की बरात’ का अनुवाद कर अंग्रेजी में ‘लॉर्ड शिवाज वेडिंग’ कहने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इन दोनों के अर्थ में खाई बहुत चौड़ी है। यह कहना ही काफी है कि गंभीर, परवाह करने वाले और ईमानदार के साथ ही हर चालबाज अपनी ढपली के साथ सामने आया और हर मोर-मोरनी नृत्य में शामिल होने के लिए पहुंच गई है।
नेताओं की यह खूबी है कि उनके बारे में अनुमान लगाए जा सकते हैं। किसी आंदोलन के साथ अगर वोट भी जुड़े होते हैं, वे उसकी रफ्तार तेज कर उस पर सवार हो जाते हैं, बेशक, हमेशा सेफ्टी बेल्ट पहनकर। किसी भी आसन्न दुर्घटना की स्थिति में वे मौत, यहां तक कि चोट के जोखिम से भी बचना पसंद करते हैं। राजनीति का अस्पताल बहुत असह्य हो सकता है।
ईमानदार राष्ट्रीय लोकपाल, जो दौलतमंदों और अधिकार संपन्न लोगों के आरामदायक ठिकानों को तहस-नहस करने के हथियार रखता हो, के निर्माण के सफर में इक्का-दुक्का दुर्घटनाएं तो होंगी ही। प्रस्तावित लोकपाल बिल के मसविदे में कुछ कटौतियां इसके आगमन के लिए जरूरी भी हो सकती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठाया मायावती ने, भले ही वे खुद को अपने सवाल का राजनीतिकरण करने के प्रलोभन से नहीं रोक पाईं। भारतीय भ्रष्ट हैं या भारतीय संविधान भ्रष्ट है? जिनके पास सत्ता-शक्ति है, उन्होंने इस संविधान का सम्मान करना छोड़ दिया है, क्या महज इसीलिए हमें अपने संविधान का महान ढांचा ढहा देना चाहिए? अन्ना, टब के गंदे पानी को तो फेंक दो, पर कृपया बच्चे को थामे रखो।

एमजे अकबर
लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।

 

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