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असम पर लटकी उल्फा की तलवार

 रीता तिवारी 

गुवाहाटी , अप्रैल। असम में लोकसभा चुनावों में एक बार फिर उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम यानी उल्फा की तलवार लटक रही है। राज्य में चुनाव हर बार उल्फा की हिंसा के साए तले ही होते रहे हैं। इस बार भी तस्वीर अलग नहीं है। राज्य के विभिन्न इलाकों में आतंकवादी हमले भी तेज हो गए हैं। इसी कारण चुनाव प्रचार में सभी दल आतंकवाद के मसले को प्रमुखता से उठा रहे हैं। अब खुद मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी खुफिया रिपोर्टों के हवाले कहा है कि  उल्फा ने चुनावों के दौरान गड़बड़ी फैलाने की योजना बनाई है और इसके लिए उसने कुछ राजनीतिक ताकतों के साथ भी सांठगांठ की है। अब तमाम राजनीतिक दल उग्रवाद को ही अपना प्रमुख मुद्दा बना रहे हैं।
असम के विभिन्न इलाकों में बीते हफ्ते चार बम विस्फोटों और तीन ग्रेनेड हमलों में आठ लोग मारे गए थे। इनमें से दो धमाके गुवाहाटी में हुए थे। इन हमलों में 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इसके अलावा दूसरी छिटपुट वारदातों में भी कई लोग मारे जा चुके हैं।
तरुण गोगोई ने चुनाव के दौरान सीमा पार से आतंकवादी हमले का भी अंदेशा जताया है। की उनका कहना है  कि कांग्रेस के सभी उम्मीदवार उग्रवादियों के निशाने पर हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उल्फा कुछ राजनीतिक दलों के साथ मिलकर चुनाव में बाधा डालने की साजिश कर रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि उग्रवादी चुनावों के दौरान बांग्लादेश की सीमा के अलावा अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मेघालय की सीमा से सटे इलाकों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी फैला सकते हैं।  गोगोई उल्फा से सांठगांठ करने वाले राजनीतिक दलों के बारे में खुलासा तो नहीं करते, लेकिन कहते हैं कि इनके बारे में आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। ये वे दल हैं जिनका उल्फा के प्रति रवैया नरम रहता है और जो उसकी हिंसक गतिविधियों की निंदा तक नहीं करते। गोगोई का दावा है कि कांग्रेस को हराने के लिए कुछ राजनीतिक दलों ने उल्फा से हाथ मिला लिया है। वे कहते हैं कि इस मामले की जांच चल रही है। पुख्ता सबूत मिलते ही उन राजनीतिक दलों के नामों का खुलासा कर दिया जाएगा।
चुनाव अभियान के दौरान उग्रवादी हिंसा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जा रहा है। राज्य की मुख्य विपक्षी असम गण परिषद (अगप) के अध्यक्ष चंद्रमोहन पटवारी कहते हैं कि सरकार को सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। राज्य में सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई है। लेकिन गोगोई राज्य में हिंसक घटनाएं बढ़ने के विपक्ष के आरोपों को निराधार करार देते हुए कहते हैं कि वर्ष 1996 से लेकर 2001 तक असग गण परिषद (अगप) के शासनकाल में हिंसा की जितनी वारदातें हुई थी, उसके मुकाबले कांग्रेस के शासनकाल में ऐसी घटनाओं में कमी आई है और मरने वालों की तादाद भी पहले के मुकाबले कम हुई है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि सुरक्षाबलों की कमी के कारण असम में उग्रवाद पर काबू पाने में दिक्कत हो रही है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राज्य में उग्रवादी हमलों का असर मतदान पर पड़ सकता है। इन हमलों से आम लोग सहमे हुए हैं। तमाम राजनीतिक दल इन आतंकवादी हमलों का राजनैतिक फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे स्थिति और जटिल हो गई है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि असम में उग्रवाद के मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।
 
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