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गणतंत्र दिवस अब राष्ट्र दिवस

विनय कांत मिश्र
नेपाल में 29 मई के गणतंत्र दिवस को राष्ट्र दिवस के रूप में मनाने की तैयारी चल रही है। नेपाली प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल ने गणतंत्र दिवस को राष्ट्र दिवस के रूप में मनाने के लिए नेपाली जनता से आह्वान किया है। बाकायदा सरकार इसकी सफलता के लिए कवायद कर रही है।
गौरतलब है कि 28 मई 2011 ई तक नेपाली संविधान बनकर तैयार हो जाएगा। राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता से गुजरता हुआ नेपाल, देश के आवाम से शांति चाहता है। इसके लिए नेपाली जनता में राष्ट्रीयता की भावना के विकास के लिए नेपाली प्रधानमंत्री की पहल काबिले तारीफ है। नेपाल, मई 2008 में गणतंत्र के रूप में अस्तित्व में आया। पहले नेपाली सत्ता का संचालन राज दरबार से होता था। माओवादियों के प्रबल प्रतिरोध के बाद नेपाली राजा ज्ञानेन्द्र को सत्ता छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा। नेपाली संसद ने राजशाही के अंत का फैसला लेकर देश में चुनाव कराने का फैसला किया। इसके बाद अपै्रल 2008 ई में नेपाल में चुनाव हुए और माओवादी सबसे बड़े संसदीय दल के रूप में उभरे। फिर पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड ‘ नेपाल के पहले प्रधानमंत्री बने। इसी बीच नेपाली राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा गणतंत्र को कमजोर करने की साजिश जारी रही। आंतरिक मतभेदों के चलते बार-बार प्रधानमंत्री बदलते रहे। चूँकि नेपाल मे पहला चुनाव ही बहुदलीय व्यवस्था के तहत हुआ था इसलिए सत्ता स्थिर नहीं रह पाई। जबकि भारत में आजादी के बाद का पहला चुनाव दो प्रमुख दलों के बीच हुआ था इसलिए यहॉ सत्ता स्थिर रही और प्रधानमंत्री पद पर बहुत दिनों तक जवाहर लाल नेहरू काबिज रहे। दरअसल नेपाल की स्थिति अलग रही है। 1990 ई के दशक से शुरू हुआ संसदीय प्रयोग जिसके सत्ता की वास्तविक चाभी नेपाली राजा के हाथों में होती थी, उसमें कई प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए। भले ही वे ‘रबर स्टाम्प‘ वाले तर्ज पर प्रधानमंत्री रहे हों, वे सत्ता-सुख का स्वाद चख चुके थे। यही कारण है कि बार-बार नेपाली प्रधानमंत्री पद पर होड़ की लड़ाई जारी है। नेपाल में लोकतंत्र, गरीब बनाम अमीर की उपज है। माओवादियों के रूप में लड़ी नेपाली जनता गरीब, किसान और मजदूर रही है। सरकार में शामिल जिम्मेदारों को इस बात की समझ है। तभी वे नेपाली गणतंत्र को राष्ट्र दिवस के रूप में मनाने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं।
नेपाली संविधान सही ढंग से बनकर 28 मई तक तैयार हो जाए इसीलिए गृहमंत्रालय भी माओवादियों के दल यूपीसीएन माओवादी को सौंप दिया गया है जबकि प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल सीपीएनयूएमएल के प्रमुख हैं। प्रचंड का दल यूपीसीएन माओवादी ‘इक्स्ट्रीमिस्ट‘ रहा है। गौरतलब है कि पिछली बार बने हुए संविधान को नहीं माना गया था। गृहमंत्रालय मिलने से माओवादी नेता प्रचंड थोड़ से आश्वस्त हैं। दरअसल किसी भी सत्ता की वास्तविक सत्ता गृहमंत्रालय में ही निहित होती है। अब यूपीसीएन माओवादी को गृहमंत्रालय मिलने का मतलब नेपाल के राजनैतिक परिवेश में प्रचंड का सीधे हस्तक्षेप से है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल की दूरगामी सोच भी हो सकती है कि कम से कम 3 वर्षों के बाद देश का संविधान बनकर तैयार होकर संसद में अंतरिम रूप से पारित हो जाए। इसके लिए थोड़ा सा संतुलन भी बैठाना पड़े तो कोई बात नहीं। किसी भी देश की शुरूआती निर्माण में राजनेताओं को व्यक्तिगत हित की तिलांजलि देकर वास्तविक रूप से जनता के हित के लिए कार्य करना पड़ता है। फिलहाल नेपाली जिम्मेदारों ने सूझ-बूझ से काम लिया तो नेपाली संविधान भी 28 मई तक बनकर तैयार हो जाएगा और 29 मई को गणतंत्र दिवस को पूरे नेपाल में राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाएगा।



 

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