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संयुक्त राष्ट्र जाना भूल थी

जगमोहन 
जब मैं 26 अप्रैल 1984 को जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल के रूप में वहां पहुंचा, तो मुझे सीधे राजभवन ले जाया गया। यहां मुझे वह कॉम्प्लेक्स दिखाया गया, जहां से डल झील, शंकराचार्य पहाड़ी व हरि पर्वत का भव्य नजारा दिखता था। मेरा ध्यान एक खूबसूरत बरामदे की ओर गया। मुझे बताया गया जवाहरलाल नेहरू जब भी श्रीनगर आते थे, यहीं बैठकर सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा देखते थे। बाद मैं मैंने भी इस बरामदे से सूर्यास्त के जादुई सौंदर्य का अनुभव किया। नेहरू के पास नैसर्गिक सौंदर्य के प्रति एक बेहद संवेदनशील दृष्टि थी। मैंने कल्पना की कि वे इस नजारे को किस तरह निहारते होंगे। मुझे अक्सर उनका यह काव्यात्मक वर्णन याद आता है: ‘ऐसा लगता है कश्मीर की नदियों, घाटियों, झीलों और दरख्तों का सौंदर्य स्त्रियोचित है। एक ऐसी स्त्री की तरह, जिसका सौंदर्य निर्वैयक्तिक और मानवीय आकांक्षाओं से परे है। 
लेकिन दूसरी ओर कश्मीर के सख्त पहाड़ों और चट्टानों, बर्फ से ढंकी चोटियों और हिमखंडों व घाटी में बहती क्रूर-उग्र जलधाराओं का सौंदर्य पुरुषोचित भी है। मैं इस सतत परिवर्तनशील दृश्य को निहारता रहता और कभी-कभी ऐसा लगता जैसे उसके विशुद्ध सौंदर्य ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया है।’ जहां कश्मीर घाटी से नेहरू के निजी और काव्यात्मक लगाव ने मुझे रोमांचित किया, वहीं कश्मीर समस्या के संबंध में उनके द्वारा लगातार की गई गलतियों से कभी-कभी मुझे निराशा भी हुई। यह एक त्रासद विडंबना ही है कि नेहरू जैसे महान नेता ने, जिनकी अंतर्दृष्टि व इतिहास बोध अद्भुत था, महत्वपूर्ण अवसरों पर ऐसी दुखद गलतियां कीं।
पहली गलती तब हुई, जब नेहरू ने माउंटबेटन द्वारा 27 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के महाराजा को लिखे गए उस पत्र की विषयवस्तु पर आपत्ति नहीं ली, जिसमें उन्होंने उनके राज्य के भारत में विलय पर सहमति जताई थी।यह पत्र भारत में विलय होने वाली अन्य रियासतों के शासकों को भेजे गए पत्रों के अनुरूप ही होना चाहिए था। लेकिन माउंटबेटन ने इसमें अनावश्यक रूप से यह भी जोड़ दिया: ‘यह हमारी सरकार की इच्छा है कि जैसे ही जम्मू और कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल हो और उसकी धरती आक्रांताओं से मुक्त हो जाए, वैसे ही विलय की समस्या का समाधान उसके लोगों की इच्छा के मुताबिक हो।’ 
यह भूल तब और गंभीर हो गई, जब 28 अक्टूबर को राष्ट्र के नाम संबोधन में नेहरू ने ‘संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में हुए जनमत संग्रह’ शब्दों का इस्तेमाल किया। 1 जनवरी, 1948 को इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जाना एक और भूल थी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के चैप्टर 7 के स्थान पर चैप्टर 6 के तहत शिकायत दर्ज करने से यह भूल भी और गंभीर हो गई। जहां चार्टर का चैप्टर 7 पराधिकार के अधिनियमों से संबंधित है, वहीं चैप्टर 6 (अनुच्छेद 34 और 35) सुरक्षा परिषद को केवल इतना ही अधिकार देता है कि वह ‘विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए उपयुक्त प्रक्रियाओं और प्रणालियों की अनुशंसा करे।’ इसके आधार पर ही सुरक्षा परिषद ने यह निर्णय दिया कि ‘इस समस्या पर समग्र रूप से विचार किया जाए और युद्धविराम की स्थिति को विवाद के अंतिम समाधान की संभावनाओं से अलग नहीं माना जा सकता।’ 
1 जनवरी 1949 को, जब भारतीय सेनाएं छापामारों और पाकिस्तानी सैन्य टुकड़ियों को निकाल बाहर करने की स्थिति में थीं, तब ‘सीजफायर’ के लिए सहमत होना भी एक और बड़ी भूल थी। लेकिन सबसे गंभीर भूल जो उन्होंने की, वह यह थी कि वे शेख अब्दुल्ला की प्रच्छन्न महत्वाकांक्षाओं को समझ नहीं पाए।
वे समझ नहीं समझ पाए कि अब्दुल्ला अपने और अपनी मंडली के लिए एक स्वतंत्र ‘शेखिस्तान’ के निर्माण के लिए लालायित हैं। फ्रैंक मॉरेस ने वर्ष 1951 में ही अपनी किताब विटनेस टु एन एरा में लिख दिया था कि ‘सत्ता का मोह अब्दुल्ला के सिर चढ़कर बोल रहा है.. वे बेहद अहंकारी व्यक्ति हैं.. वे नईदिल्ली के प्रति अवमाननापूर्ण रुख रखते करते हैं.. लगता है कि उनका दिमाग श्रीनगर घाटी की आजादी के बारे में सोच रहा था और वे स्वयं कश्मीर के शहंशाह बनना चाहते थे।’
लेकिन नेहरू ने इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय उन्होंने भारतीय संविधान में धारा 370 को शामिल करने से लेकर राज्य के लिए अलग ध्वज अपनाने जैसी अब्दुल्ला की तमाम मांगों पर सहमति जताई। इन सबसे अब्दुल्ला की सत्ता की भूख और बढ़ी तथा उन्होंने आजादी के लिए ‘पूर्ण स्वायत्तता’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
अब्दुल्ला ने पश्चिमी ताकतों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों से गुपचुप संपर्क किया, जो उनकी छलकपट की राजनीति का नया आयाम था। तत्कालीन भारत में अमेरिकी राजदूत लॉय हैंडरसन की सितंबर 1950 की रिपोर्ट पढ़ने के बाद किसी को इस पर संदेह नहीं होना चाहिए।
हैंडरसन ने इसमें लिखा, ‘भविष्य के कश्मीर के बारे में चर्चा करते वक्त अब्दुल्ला का जोर इस बात पर था कि यह स्वतंत्र होना चाहिए।’ 3 मई, 1953 को एडलाई स्टीवेंसन ने श्रीनगर आकर शेख अब्दुल्ला से भेंट की। इसके तुरंत बाद द न्यूयॉर्क टाइम्स में घाटी का एक नक्शा प्रकाशित हुआ, जो उसकी स्वतंत्र स्थिति की ओर इशारा करता था।
हालांकि नेहरू को इस बारे में आगाह किया गया था, फिर भी वे आंखें मूंदे रहे। लेकिन ठोस सच्चाइयों को ज्यादा दिन तक छुपाया नहीं जा सका। अगस्त 1953 के पहले हफ्ते में शेख अब्दुल्ला का एक भाषण खुफिया एजेंसियों के हाथ लग गया। इसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में कश्मीर के भारत से बदलते रिश्ते पर सवाल उठाया था।
इसके बाद तो नेहरू भी अब्दुल्ला को मदद नहीं कर सकते थे। उन्हें पद से हटा दिया गया, हिरासत में लिया गया और बाद में उन पर मुकदमा भी चलाया गया। लेकिन जनवरी 1962 में नेहरू ने राज्य सरकार को कश्मीर षड्यंत्र के इस केस को वापस लेने के लिए राजी कर लिया।
नेहरू अपने पीछे एक ऐसे कवि-राजनेता की विरासत छोड़ गए, जिनका आदर्शवाद घाटी की छल-प्रपंच की राजनीति के साथ मेल नहीं खाता था। आज भी मैं यह तय नहीं कर पाता कि घाटी में बहने वाले खून के लिए किसे दोष दिया जाए- अति महत्वाकांक्षा, अति विश्वास या जमीनी हकीकतों की लगातार अनदेखी?

 

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