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अभी जनता खामोश है

विनय कांत मिश्र

 देश की जनता खामोश है। वह चुपचाप सभी घटनाओं को देख रही है। भ्रष्टाचार का महापुराण दिनों-दिन लिखा जा रहा है। एक बार देश अथवा उसके किसी भी प्रदेश की जनता के वोट देने के बाद बहुमत ेकी सरकार बन जाए तो फिर पॉंच वर्षों तक जनता को सिर्फ खामोश ही रहना पड़ता है। देश में तोड़-फोड़ की बढ़ती राजनीति प्रव्त्ति ने अब सरकारों का चरित्र अनैतिक बनाया है। सत्ता से बेदखली की चिन्ता ने देश के सियासी रहनुमाओं के होश फाख्ता कर दिए हैं। किसी भी कीमत पर एवं देश की समस्याओं को ताख पर रखकर निर्वाचित होने की  प्रवृत्ति ने देश का बंटाधार किया है। ऐसे में देश की जनता सवालों के उत्तर खोजने के लिए साहित्यकारों अथवा कलाकारों की ओर मुखातिब होती है। धीरे धीरे जनता खामोशी के साथ मौन के कवि अज्ञेय के करीब पहुॅंचती है। तब अज्ञेय देश की तमाम जनता को समझाते हैं कि मौन भी अभिव्यंजना है, जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो। 
   गौरतलब है कि देश की तमाम मजदूर एवं किसान जनता खुद की सच्चाई की खोज के लिए जद्दो जहद कर रही है। उसका सच है- जीवन जीने के लिए दो वक्त की रोटी, तन को ढकने के लिए कपड़ा और सिर को छुपाने के लिए मकान। जबकि देश के तंत्र का सच अधिकाधिक धन-संचय एवं सत्ता सुख भोगना है। यह अजब संयोग है कि आर्थिक उदारीकरण के झंडाबरदार पूॅंजीवादी तत्वों का सत्ता के साथ व्यापक स्तर पर साठ-गॉठ हो चुका है। देश की प्रत्येक नीति अब उच्च वर्ग के लोगों के हित को साधने के लिए बनाई जाती है। देश के अमीर और गरीब तबके के बीच की खाई बहुत अधिक बढ़ती जा रही है। अज्ञेय की एक कविता है हमारा देश, जिसमें वे लिखते हैं-‘‘इन्हीं तृण-फूल-छप्पर में/ढके ढुलमुल गॅवारू/झोपड़ों में ही हमारा देश/बसता है।/इन्हीं के ढोल-मादल-बांसुरी के/उमगते सुर में/हमारी साधना का रस/बसता है।/इन्हीं के मर्म को अनजान/शहरों की ढकी लोलुप विषैली/वासना का सॉप/डॅसता है/इन्हीं में लहराती अल्हड़/अपनी संस्कृति की दुर्दशा पर/सभ्यता का भूत हॅंसता है।’’अपनी संस्कृति की दुर्दशा पर सभ्यता का भूत हॅसता है कितना सटीक व्यंग्य है। अज्ञेय ने यह भी लिखा है कि सॉप तुम सभ्य तो हुए नहीं/नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया/एक बात पूछॅं/उत्तर दोगे/फिर कहॉं से सीखा डसना/विष कहॉं से पाया? सॉंप के रूप में ही वे आताताइयों को देखते हैं। आज आताताई आतंकवादी ही तो हैं। बुधवार को मुम्बई बम्ब विस्फोट में आतंकियों ने मनुष्यता को शर्मशार करने का कार्य किया है। भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में आतंकयों द्वारा दहशतगर्दी फैलाई गई है। आतंकियों ने मानव सभ्यता को क्षतिग्रस्त करने का विध्वंसकारी कार्य किया है। इस समय मुम्बई की स्वप्निल दुनिया लहू लुहान है। मुम्बई जैसे दुनिया के दूसरे महानगर सदमें में हैं। नगरीय सभ्यता में वासना का सॉंप बहुत अधिक विष धारी हो चुका है, इसकी चिन्ता अज्ञेय को सालती है। सभ्यताओं की पवित्रता के लिए वे मानव धर्म को ही उपयुक्त समझते हैं। तभी तो वे साम्राज्ञी का नैवेद्य दान में लिखते हैं; हे! महाबुद्ध मैं आई हूॅं, रीते हाथ। रीते हाथ का मतलब खाली हाथ होता है। कहने  का मतलब है कि अज्ञेय के रचना आलोक में सिर्फ असाध्य वीणा ही नहीं है, जहॉं पर तमाम कलावंत साधक वीणा को साधने के लिए आते हैं। उनके यहॉं गरीबों-मजलूमों की समस्याओं को भी बहुत कायदे से उठाया गया है। हम अज्ञेय को याद करते समय उनके विस्तृत रचना संदर्भ को भूल जाते हैं। हम यह भी भूल जाते हैं कि अज्ञेय की रचनात्मक दुनिया में सिर्फ कवि ही नहीं बल्कि एक कथाकार, उपन्यासकार, आलोचक, डायरीकार, संपादक, अनुवादक और इन सबसे बढ़कर एक सफल पत्रकार का विस्तृत रचना-आस्वाद एवं संदर्भ है। जिस तरह से हम कविता की दुनिया में लोकवादी तुलसीदास का मूल्यांकन करते समय सिर्फ रामचरित मानस को ही ध्यान में रखते हैं उसी तरह अज्ञेय से रू-ब-रू होते समय आलोचकों को पता नहीं क्यों असाध्य वीणा और अपने अपने अजनबी की ही याद आती है। जनादेश संवाददाता के पूछने पर अज्ञेय को कवि जसवीर त्यागी गेय कहते हैं। वे कहते हैं कि उनकी समूची रचनात्मक दुनिया लयात्मक है। बस आप मौन धारण करते हुए उनके साहित्य को पढ़ते चले जाइए आपको नवीनता की अनुभूति होती रहेगी। 
        दरअसल अज्ञेय के यहॉं बड़बोलापन नहीं है। वे खामोशी अख्तियार करते हुए जन-मानस को सचेत करते हैं। वे हिन्दी के ऐसे कवि हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। आजादी के लिए संघर्ष करते हुए जेल की यात्रा के दौरान जैनेन्द्र कुमार ने प्रेमचंद की सलाह पर अज्ञेय उपनाम दिया था। अज्ञेय का पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय था। 7 मार्च 1911 ई को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद में जन्मे अज्ञेय ने 4 अप्रैल 1987 ई को दिल्ली में अंतिम सॉंस ली। उनके कविता संग्रहों में भग्नदूत, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभमय, ऑंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूॅं, सागर मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूॅं, महावृक्ष के नीचे, नदी की बॉक पर छाया और ऐसा कोई घर आपने देखा है, है; जबकि कहानी संग्रहों में विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल और ये तेरे प्रतिरूप है। उपन्यासों की दुनिया में आधुनिकता की शुरूआत शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप और अपने अपने अजनबी से होती है। यात्रा वृतांत में अरे यायावर रहेगा याद और एक बूॅंद सहसा उछली प्रमुख है। आलोचना और निबंध संग्रहों में सबरंग, त्रिशंकु, आत्मनेपद, आधुनिक साहित्य एक परिदृश्य और आलवाल है। भवंती, अंतरा और शेष उनकी डायरी के नाम हेैं जबकि संस्मरणों में स्मृति लेखा और स्मृति के गलियारों से मुख्य हैं। उन्होंने क्रमशः शरत चंद्र और रवीन्द्रनाथ टैगोर के बांग्ला उपन्यास श्रीकांत और गोरा का हिन्दी में अनुवाद किया जबकि जैनेन्द्र कुमार के त्यागपत्र का द रिजाइनेशन और धर्मवीर भारती के सूरज का सातवॉं घोड़ा का द सेवेंथ हॉर्स आफ द सन एवं अपने खुद के उपन्यास नदी के द्वीप का अंग्रेजी में अनुवाद किया। गौरतलब है किै अज्ञेय दिनमान, नवभारत टाइम्स, अंग्रेजी पत्र वाक् और एवरीमैंस के संपादक भी रह चुके हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र की तरह अज्ञेय ने भी हिन्दी साहित्य की समस्त आधुनिक विधाओं में लिखा। सन् 1964 ई में ऑगन के पार द्वार पर उन्हें साहित्य एकेडमी और सन् 1979 ई में कितनी नावांे में कितनी बार पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया।  भारतेंदु और निराला की तरह अज्ञेय मंे भी आधुनिकता बोध था। फिलहाल वर्तमान में देश की जनता अभी खामोश हेै। वह उलझन में है। सामाजिक विषमता देश को खाए जा रही है। अज्ञेय जीवन भर इन्हीं सामाजिक विषमताओं से टकराते रहे। विषमताओं से टकराहट के जज़्बे ने अज्ञेय को साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में चिरस्मरणीय बना दिया। जब जब हमारी मनुष्य सभ्यता को शर्मशार करने की कोशिशें होंगी तब तब अज्ञेय का रचना संसार हमें नई जीवन-दृष्टि प्रदान करेगा। इस वर्ष 2011 ई में उनकी जन्म शताब्दी मनाई जा रही है।  अज्ञेय को भी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।       
                                          
 
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