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राज खोलेगी बात ही

विनय कांत मिश्र

कविता प्रत्येक युग में युग-सत्य को उद्घाटित करती है। शमशेर के यहॉं तो बाकायदा वह काल से होड़ लेती हुई चलती है। काल से होड़ वही ले सकता है जिसमें गहरा आत्म विश्वास होता है। काल अथवा समय से होड़ लेने की वजह से ही मुक्तिबोध ने उन्हें कवियों का कवि कहा है। मतलब शमशेर शीर्षस्थ कवि हैं। सचमुच शमशेर पूरी तैयारी के साथ कविता की दुनिया में कदम रखते हैं। कविता के प्लाट को बनाने के लिए उर्दू और अंग्रेजी की उनकी समझ सहायक सिद्ध होती है। ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ कवियों के लिए ही लिखते ह,ैं जो लोग ऐसा सोचते हैं उन्हें शमशेर की बैल कविता से रू-ब-रू होना चाहिए। युवा कवि जसवीर त्यागी जनादेश संवाददाता से कहते हैं कि शमशेर की पहुॅच किसानों की दुनिया तक है। बैल किसानों के संघर्ष का प्रतीक है। जिस बात को शमशेर कविता की भाषा में कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट उसी बात को कानून की भाषा में कहता है। उनकी कविताएं नवीन संघर्ष लोक रचती हैं। जब जनादेश संवाददाता ने हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि में योगदान देने वाली  याज्ञवल्क्य से बहस, रचना की कवियत्री सुमन केसरी अग्रवाल से एक स्त्री की दृष्टि से शमशेर के बारे में जानना चाहा तब उन्होंने कहा कि शमशेर स्त्रियों को भी बराबरी का दर्जा देते हैं। उनके यहॉं स्त्री सचमुच सहचरी है। उनके यहॉं जिन देह के बिम्बों में अश्लीलता की बात की जाती है दरअसल वहॉं कवि का गहरा अवसाद बोध दिखलाई पड़ता है। सुमन केसरी बात को आगे बढ़ाती हुई कहती हैं कि शमशेर परंपरा को नए ढंग से देखते हैं। चाहे वह कविता की परंपरा हो, जीवन की परंपरा रही हो अथवा अन्यान्य परंपराएं हों; सभी स्थलों पर शमशेर की नवीन जीवन-दृष्टि कार्य करती है। वे शमशेर को पंक्तियॉं-सच कहा कवि ने/रखते पग वीर ही/अदेखे पथ पर/प्रेरित हो प्रेम से/साहस ही देखता है स्वर्ण मृग को/खोजता है वन वन वन उस अप्रतिम धन को/लॉंघता सीमाएं/चुनता पथ दुर्गम/कठिन भविष्य; समर्पित करते हुए कहती हैं कि कविता की उम्र 10 अथवा 20 वर्ष नहीं होती बल्कि कविता की उम्र एक हजार वर्ष होती है। 
   सूर्यास्त कविता में शमशेर लिखते हैं- अमित आकांक्षा उभार/दाह का आलोक है केवल/धैर्य कितना धैर्य/औ संतोष कितना। गौरतलब है कि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून में मध्यवर्गीय जाट परिवार में सन् 1911 ई में हुआ था। नई कविता के उन्नायकों में शमशेर का नाम बहुत अदब के साथ लिया जाता है। उन्होंने अंग्रेजी में एम ए की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हासिल की थी। बाद में उन्होंने रूपाभ में सहायक के तौर पर कार्य किया। रूपाभ पत्रिका के संपादक सुमित्रानंदन पंत थे। त्रिलोचन के साथ शमशेर ने कहानी पत्रिका के लिए योगदान दिया। सन् 1948 ई में माया प्रेस, इलाहाबाद में बतौर सहायक संपादक के रूप में 6 वर्षों तक नौकरी की। 1965 ई से 1976 ई तक दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में हिन्दी उर्दू शब्दकोश के संपादक के रूप में रहे। उनकी पहली कविता सरस्वती पत्रिका में 1931 ई में छपी थी। उनके कविता संग्रहों में कुछ कविताएं, कुछ और कविताएं, चुका भी नहीं हूँ  मैं, इतने पास अपने, बात बोलेगी और उदिता हैं। चुका भी नहीं हूँ  मैं पर शमशेर को 1977 ई में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। उनके दोआब को नई कविवता का मेनीफेस्टो माना जाता है। शमशेर ने गज़लें भी लिखीं। अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरे सप्तक के प्रमुख कवियों में शमशेर का नाम लिया जाता है। उन्हें चित्रकला की भी जानकारी थी। आज जब कविता और कविता के इतर की अधिकांश दुनिया लीक पीट रही है तब शमशेर राहों के नए अन्वेशी हो सकते हैं। जनादेश की पॉंच कवियों की शताब्दी वर्ष में शमशेर को भी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।                         
 
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