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उप्र से प्रतिभा का पलायन

अंबरीश कुमार 

लखनऊ , जुलाई । उत्तर प्रदेश से बड़े पैमाने पर प्रतिभा का पलायन हो रहा है । हर जिले में तेजी से खुलते इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कालेज और शिक्षा का गिरता स्तर प्रदेश के छात्रों को बाहर जाने  पर मजबूर कर रहा है । जिसके चलते इंजीनियरिंग कालेजों की सवा लाख से ज्यादा सीटों में से बीस पच्चीस फीसद सीटें ही भर पाने की उम्मीद है । उत्तर प्रदेश में करीब नौ सौ कालेजों में ज्यादा बुरा हाल निजी कालेजों का है जो मोटी फीस लेकर छात्रों को ऎसी डिग्री दे रहे है जिससे नौकरी मिलनी मुश्किल है । उत्तर प्रदेश में पिछले दो दशक से राजनीति में जितने अजीबोगरीब प्रयोग हुए उतने ही प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में भी हुए है । प्रदेश में शिक्षा का धंधा अब काले धन को सफ़ेद करने के साथ नए उद्योग के रूप में बढ़ रहा है । और इस धंधे में हर दल के नामी गिरामी नेता शामिल है तो नए व्यापारी भी कूद पड़े है । मुख्यमंत्री मायावती जो हर क्षेत्र में बहुजन का झंडा लहराने का प्रयोग करती रही है उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी दलित एजंडा को लागू करने का ऐसा प्रयास किया जिससे छात्रों की डिग्री फिलहाल ऐसे विश्विद्यालय की बन गई जिसका राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने नाम न सुना हो । ठीक उसी तरह जैसे उत्तर प्रदेश के कुछ नए नाम वाले जिलों मसलन छत्रपति साहूजी महाराज नगर ,ज्योति बा फुले  नगर ,रमाबाई नगर या महामाया नगर के सामने पहचान का संकट है । खास बात यह है कि इन जिलों के रहने वाले भी कई बार अपने जिले का नाम भूल जाते है क्योकि ये जिले अमेठी ,हाथरस ,अमरोहा और कानपुर देहात की जगह अस्तित्व में आए है । ऐसा ही संकट गौतम बुद्ध और महामाया प्राविधिक विश्विद्यालय और उनकी डिग्री लेने वाले कालेजों के भी सामने है । उत्तर प्रदेश के बाहर की नामी कंपनिया और  शिक्षा संस्थान तक इसके नाम से भ्रमित हो जाते है । दूसरी तरफ वे निजी विश्विद्यालय लखनऊ से लेकर नोयडा तक खुल गए है जो महंगी शिक्षा का नया रिकार्ड बना रहे है । अमूमन ऐसे विश्विद्यालय में बीटेक या इंजीनियरिंग के छात्र की चार पांच साल की पढाई का खर्च छात्रावास के खर्च को जोड़ने के बाद पंद्रह से अठारह लाख का है जितनी कीमत में लोग ग्रेटर नोयडा में फ्लैट बुक करा रहे है ।
महंगी पढाई के लिए बैंक अब आसानी से शिक्षा का कर्ज दे नहीं रहे और देते भी है तो तेरह से चौदह  फीसद ब्याज पर वह भी घर दुकान गिरवी रखवा कर । शिक्षा के इस नए गोरखधंधे में नेता है ,नौकरशाह है तो माफिया भी है । उत्तर प्रदेश के इसी क्षेत्र से जुड़े एक मंत्री महोदय ने इतनी कमाई की कि अब उनके पास कोई फ़ाइल न भेजने का निर्देश दिया जा चुका है । वे पांच करोड़ के रेट पर बीएड कालेज आदि को मान्यता देते थे । उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कांग्रेस के  एक वरिष्ठ नेता के दामाद का बड़ा कालेज है तो कांग्रेस के सांसद जगदंबिका पाल से लेकर बसपा सांसद अखिलेश दास का बाबू बनारसी दास कालेज काफी मशहूर है । भाजपा नेता भी पीछे नहीं है । यह तो एक जिले की जानकारी है हर जिले में यह परंपरा चल रही है । उत्तर प्रदेश में राजनीति को सड़क पर पहुंचाने  के बाद नेताओं ने शिक्षा के क्षेत्र में दखल दिया है ,अंजाम क्या होगा यह कुछ सालों में खुलकर सामने आ जाएगा । हर जिले में दर्जनों इंजीनियरिंग ,प्रबंधन और अन्य व्यावसायिक कालेज खुलते जा रहे है । यदि छात्रों ने इसी तरह किनारा किया तो आने वाले दिनों में ये शादी ब्याह स्थल या बारात घर में तब्दील हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योकि उसमे भी काफी पैसा मिलता है ।
शिक्षा के इस नए संकट के दायरे में सिर्फ इंजीनियरिंग कालेज ही नही है बल्कि मैनेजमेंट और कंप्यूटर शिक्षा का क्षेत्र भी शामिल है । यूपीटीयू की परीक्षा में इस बार कुल ८२००० छात्र पास हुए है जिसमे बीटेक के पचास हजार ,एमबीए के बीस हजार और एमसीए के करीब साढ़े चार हजार छात्र है । पर बीटेक की काउंसिलिंग  में सिर्फ अठारह हजार छात्रों ने अपनी सीटें आरक्षित की तो एमसीए में आधे से भी कम ने और एमबीए में एक चौथाई ने सीटें लाक की । इंजीनियरिंग ,प्रबंधन और कंप्यूटर का क्षेत्र अभी तक सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था  पर उत्तर प्रदेश के छात्रों ने यहां के कालेजों से किनारा कर लिया है । ऐसा नही कि  इन विषयों के प्रति रुझान ख़त्म हुआ हो ।सही बात यह है कि गली गली खुल रहे कालेजों की डिग्री का कोई भविष्य नजर नहीं आता ।  अपवाद के रूप में कुछ कालेज अलग है । पर निजी विश्विद्यालय छात्रों से मोटी फीस वसूल रहे है और प्रवेश की प्रक्रिया भी गोपनीय है । गुजरात जैसे कई राज्यों में प्रोफेशनल और तकनीकी शिक्षा देने वाले सभी कालेजों चाहे वे सरकारी क्षेत्र के हों या फिर निजी क्षेत्र के उनकी प्रवेश प्रक्रिया पर राज्य सरकर का नियंत्रण रहता है और मेरिट लिस्ट नेट पर उपलब्ध रहती है । उत्तर प्रदेश के निजी कालेज इस मामले में अपनी चलाते रहे है । जिसके चलते आज यह स्थिति आ गई है ।वाराणसी के  विनोद सिंह अपनी पुत्री के प्रवेश के लिए दर दर भटकने के बाद नोयडा के एक निजी कालेज में प्रवेश करने को मजबूर हुए  । उन्होंने  कहा - जब पैसा लेकर गली गली कालेज खोले जाएंगे तो यह नौबत आएगी ही  ।  दो चार साल में आधे कालेज बंद हो जाएंगे , बेहतर हो सरकार इसका इस्तेमाल देश का अनाज रखने के लिए करे जो बाहर साद जाता है  ।jansatta
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