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प्रेमचंद आज भी ज़िंदा हैं

विनयकांत मिश्र 

प्रेमचंद आज भी ज़िंदा हैं। आज 31 जुलाई को उनकी जयंती है। वे आज 131 वर्ष के हो चुके हैं। प्रेमचंद इसलिए जिंदा हैं क्योंकि जिन समस्याओं पर उन्होंने लिखा आज भी वे जस की तस हैं। हॉं, उनका स्वरूप जरूर कुछ रूपांतरित हुआ है; थोड़ा संशोधित और थोड़ा परिवर्द्धित। प्रेमचंद की रचनात्मक दुनिया गद्य की है। उन्होंने गद्य विधा में कहानी और उपन्यास के क्षेत्र को चुना। उन्होंने कहानी और उपन्यास को मनोरंजन की चौहद्दी से निकालकर जीवन की समस्याओं के खॉंचे में फिट किया। जिस तरह भारतीय राजनीति और स्वाधीनता आंदोलन में महात्मा गॉधी  ने अंग्रेजी तिलिस्म और ऐय्यारी को तोड़ा था ठीक उसी तरह तिलिस्म और ऐय्यारी के खॉंचे से हिन्दी साहित्य को प्रेमचंद ने मुक्त कराया।  गॉंधी और कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का 20 वीं सदी का वह दौर दुनिया भर में अंग्रेजी साम्राज्य के बोल बाले का था। 21 वीं शताब्दी का वर्तमान दौर दुनिया भर में पूंजीवाद  की भयावहता का है। अभी तो 21 वीं शताब्दी के शुरूआती महज 10 वर्ष ही बीते हैं। पूंजीवाद  निर्मम होता है। वह संबंधों को कम अहमियत देता है। सामंतवाद और पूंजीवाद  दोनों का आधार अपने से दुर्बल औरों का शोषण करना होता है। आज की भारतीय राजनीति भ्रष्टाचार के तिलिस्म और दल बदल की ऐय्यारी में उलझी हुई है। अब न तो गॉंधी जी जैसे करिश्माई लीडर ही हैं और न ही प्रेमचंद की तरह भाषा के कुशल प्रयोगकर्ता ही। देश की आदर्श सियासत गॉंधी जी के करीब से होकर गुजरती है जबकि गद्य की भाषा का आदर्श स्वरूप प्रेमचंद से मुखातिब होता हुआ बहुत कुछ सीखता चलता है। प्रेमचंद हिन्दी प्रदेश के इकलौते ऐसे लेखक हैं जिन पर हिन्दी और उर्दू के दोनों लोग समान रूप से अपना दावा करते हैं। यदि भविष्य में हिन्दुस्तानी का कोई आदर्श स्वरूप सामने आया तो वह प्रेमचंद की भाषाई दुनिया होगी। उन्हें मानव मनोविज्ञान की गहरी परख और समझ है। एक आदमी जितने तरह के व्यवहार अपने पूरे जीवन में कर सकता है; उन सभी को प्रेमचंद ने अपने समूचे रचनात्मक साहित्य का अंग बनाया है।
                                           दरअसल प्रेमचंद पूरे भारत के गॉंवों में आज भी बसते हैं। गॉंवों में खेतों की मेढ़ों पर दिन रात खटता हुआ किसान आज भी गोदान के किसान पात्र होरी की जिन्दगी को बयॉं करता है। इस देश के किसान आजादी से पहले भी त्रासद् स्थिति में जीवन जीने को बाध्य थे, आज भी इस देश का किसान घुट घुट कर मरने को बाध्य है। किसानों का मजदूरों के रूप में रूपांतरण आजादी के पूर्व और आजादी के बाद इस देश की प्रमुख घटनाओं में से एक है। वर्गीय दृष्टि से बड़ी एवं छोटी जोत के किसानों के बीच के फर्क को भी प्रेमचंद  अपने साहित्य में दिखलाते हैं। पूरी व्यवस्था पर वे गहरी चोट करते हैं। जिस तरह से नोएडा और अलीगढ़ में किसानों की जमीन सरकार द्वारा हड़पने की कोशिश हुई उससे प्रेमचंद के रंगभूमि की याद ताजा हो गई। रंगभूमि उपन्यास में सूरदास भी अंग्रेजी साम्राज्यवादी ताकतों से अपनी जमीन के लिए लड़ता है, वह किसानी आंदोलन का नेतृत्व करता है। वर्तमान में नोएडा में किसान न्यायालय के आदेश द्वारा कब्जा पाने में सफल हुए हैं। कफ़न कहानी में दलितों का मुद्दा पुरजोर ढंग से उठाया गया है। गोदान में पं मातादीन के मुह में हरिजनों द्वारा हड्डी इूसने का प्रकरण, फिर गंगा जल द्वारा शुद्धिकरण का मामला; समाज में आज भी एक नवीन संदर्भ लोक रचता है। दरअसल प्रेमचंद का गद्य जीवन की कहानी कहता हुआ आगे बढ़ता रहता है। एक आदमी के जीवन के जितने भी आयाम हो सकते हैं उन सबको प्रेमचंद का गद्य ताकता हुआ चलता है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय केे हिन्दी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा वेद प्रकाश जनादेश संवाददाता से बातचीत में कहते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश रहा है। आज भी उसकी अर्थव्यवस्था कृषि एवं गॉवों पर टिकी हुई है। प्रेमचंद ने गॉंवों की समस्याओं को सबसे अधिक उठाया है। वे ऐसे लेखक हैं जिन्होंने भाषा को गढ़ा है। डा वेद बातचीत में आगे कहते हैं कि जो बड़ा लेखक होता है वह जनता का आस्वाद बदलता है। प्रेमचंद ने साहित्य का आस्वाद बदला। हिन्दी की जहॉं जहॉं पहुँच  होगी बिना प्रेमचंद के वहॉं हिन्दी का कोई मतलब नहीं होगा। आज समाज में नई तरह की विषमता है। जिसके पास बहुत पैसा है वह भी अपराधी है और जिसके पास पैसा नहीं है वह भी अपराधी है। आज का लेखक प्रेमचंद से सीखता हुआ नई तरह की विषमताओं और विसंगतियों पर लिख रहा है। गॉवों के नगरीकरण को प्रेमचंद संदेह की दृष्टि से देख रहे थे। वे चाहते थे कि देश का विकास हो लेकिन अपसंस्कृति न पनपे। जबकि हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रो पुरूषोत्तम अग्रवाल से जनादेश संवाददाता ने पूछा कि कबीर और प्रेमचंद में आप किस तरह की समानता देखते हैं? तब प्रो अग्रवाल संक्षिप्त में बतलाते हैं कि न्यायपूर्ण समाज एवं विवेक आधारित और प्रेम आधारित मानवीय संबंधों की इच्छा, दोनों में यही प्रमुख समानता है। वे कहते हैं कि कबीर और प्रेमचंद हिन्दी के सर्वाधिक बड़े लेखकों में हैं।  
      गौरतलब है कि प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 ई को वाराणसी के लमही गॉव में हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल एवं माता का नाम आनंदी था। माता पिता ने उन्हें धनपत राय नाम दिया तो उनके चाचा महावीर ने उन्हें नवाब के नाम से पुकारा। जबकि साहित्य जगत में वे प्रेमचंद के लोकप्रिय नाम से नवाजे गए। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मदरसा में मौलवी के सानिध्य में हुई थी। 1899 ई से 1921 ई तक प्रेमचंद ने गोरखपुर में स्कूल मास्टरी की थी। महात्मा गॉधी के उद्बोधन पर उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। बाद में उन्होंने मर्यादा  पत्रिका का संपादन किया था। हंस उनकी अपनी पत्रिका थी। प्रेमचंद ने लगभग 300 कहानियॉं और 14 उपन्यास लिखे। उनके उपन्यासों में गोदान, कर्मभूमि, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, ग़बन और सेवासदन हिन्दी में उर्दू में बाजार-ए-हुश्न है। जबकि मंगलसूत्र को वे पूरा नहीं कर सके। उनकी कहानियों में पंच परमेश्वर, ईदगाह, मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, बूढ़ी काकी, बड़े भाई साहब, बड़े घर की बेटी, नमक का दारोगा, रामलीला, चोरी, जुर्माना, सवा सेर गेहॅंू, अलग्योझा, वज्रपात, ठाकुर का कुऑ, दूध का दाम और कफ़न आदि प्रमुख हैं। उनके नाटकों में कर्बला व तजुर्बा हैं। वे एक सफल पत्र लेखक एवं पत्रकार थे। उनकी मजदूर कहानी पर 1934 ई में फिल्म बनी थी। सेवा सदन उपन्यास पर 1938 में फिल्म बनी। दो बैलों की कथा पर आधारित 1959 ई में हीरा मोती  आई। गोदान पर 1963 ई में फिल्म बनी। ग़बन पर 1966 ई में फिल्म बनी। सद्गति पर 1981 ई में टी वी सीरियल का निर्माण हुआ। शतरंज के खिलाड़ी पर 1977 ई में फिल्म बनी। 1977 ई में ही कफ़न पर आधारित ओका ओकी कथा फिल्म बनी। मतलब यह है कि यदि प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों पर आजादी के बाद फिल्में बनती हैं और  जनता उन्हें बार पसंद करती है तो सिर्फ इसलिए कि उन रचनाओं का आम आदमी से गहरा सरोकार है। आज भी आप किसी गॉंव और गरीब बस्ती की तरफ चले जाइए तो वहॉं प्रेमचंद आपका इंतजार करते हुए मिल जाएंगे। वे आपसे गरीब किसानों और मजदूरों की तरफ से जिरह करते हुए नज़र आएंगे। वैसे तो प्रेमचंद 08 अक्टूबर 1936 ई को सशरीर हमें छोड़ कर चले गए लेकिन स्वयं के रचनात्मक साहित्य की वजह से वे आज भी ज़िन्दा हैं।                  
 
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