ताजा खबर
राहुल गांधी अमेठी सीट छोड़ेंगे ? सत्यदेव त्रिपाठी को निपटाने में जुटे राजबब्बर ! एक ढोंगी बाबा के सामने बेबस सरकार डेरा सच्चा सौदा का यह कैसा सफ़र
कौन हैं ये लोग?

 मस्तराम कपूर

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार-विरोधी तथा लोकपाल विधेयक समर्थक आंदोलनों के पक्ष में मीडिया द्वारा ऐसा माहौल बनाया गया गोया भारत की समूची जनता इन आंदोलनों के पक्ष में भ्रष्टाचार के विरोध में खड़ी हो गई। इस माहौल को बनाने में जहां मंडल-विरोधी, आरक्षण-विरोधी, जातिवार जनगणना-विरोधी और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों द्वारा हाशिए पर फेंकी गई दो-तिहाई आबादी-विरोधी मीडिया तंत्र और बौद्धिक तंत्र बड़े उत्साह के साथ सक्रिय रहा,वहां यूपीए सरकार की मूर्खताएं और उजड्डताएं भी इसके लिए जिम्मेवार रहीं।
इसका प्रमाण चार कैबिनेट मंत्रियों द्वारा बाबा रामदेव का हवाई अड्डे पर स्वागत करने के बाद रामलीला मैदान में रामदेव तथा उनके समर्थकों की भीड़ पर आधी रात को पुलिस और सशस्त्र बलों का हमला, जिसने लोगों के दिलों में इमरजेंसी की याद ताजा कर दी। सोनिया गांधी द्वारा नियंत्रित और प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह तथा गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा संचालित यूपीए सरकार के बीच मतभेदों के उजागर होने के बावजूद इस उद्दंड कार्रवाई का कलंक सरकार के माथे पर लग चुका है, जिसका धुलना आसान नहीं होगा। किंतु मीडिया तंत्र ने जिस तरह का माहौल बनाया, वह चिंताजनक भी और खतरनाक दोनों रहा।
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव आंदोलन के कटु आलोचक अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’के संपादक शेखर गुप्ता ने ११ जून के अपने लेख में वर्तमान के इन आंदोलनों की तुलना विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय के मंडल-विरोधी और आरक्षण विरोधी आंदोलन से की। ‘तहलका’ने भी आंदोलन करने वाले मध्य वर्ग को वही मध्य वर्ग बताया जो मंडल और आरक्षण के विरोध और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पक्ष में जुटा था।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इन सब अन्ना-बाबा समर्थकों को भारत की जनता (पीपुल्स आफ  इंडिया) कहा, गोया आरक्षण व्यवस्था का समर्थन करने वाली दो-तिहाई आबादी, जिसके प्रतिनिधि भारतीय संसद में दो-तिहाई बहुमत में हैं, भारत की जनता नहीं, कीड़े-मकोड़े हैं- जिन्हें भारत राष्ट्र या उसके संविधान से कुछ लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि जो लोग भ्रष्टाचार के विरोध में खड़े हुए हैं, वे अपने बच्चों के लिए न्याय और बराबरी का हक मांगते हैं (भले ही दो-तिहाई आबादी न्याय और बराबरी के हक से वंचित रहे)। वे चाहते हैं कि राजनीति उनकी आकांक्षाओं की तरफ  मुखातिब हो।
दूसरे शब्दों में नवउदारवादी नीतियों से पोषित एक-तिहाई आबादी का सारी व्यवस्था पर कब्जा हो, ताकि उसका सारा लाभ इस एक-तिहाई आबादी को ही मिले, इसलिए अन्ना हजारे और रामदेव के साथ भीड़ उमड़ती चली गयी। गौरतलब है कि इन मांगों में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं आदि के उन अधिकारों को बहाल करने का जिक्र नहीं है जिनमें एक के बाद एक सरकार घोर तिरस्कार का रवैया अपनाए रही। यहां तक कि उपेक्षित वर्गों को सत्ता में आनुपातिक हिस्सेदारी देने वाले संवैधानिक प्रावधानों को भी ठीक से लागू नहीं किया गया।
इन उपेक्षित वर्गों की समस्याओं का जिक्र केवल राशन कार्ड, बीपीएल कार्ड और मनरेगा आदि योजनाओं के संदर्भ में ही होता है, जिसका उद्देश्य इनको भिखमंगेपन के स्तर पर (बीस रुपये रोज पर) मात्र जिंदा रखना है या फिर विशेष पहचान पत्र जैसी योजनाओं के संदर्भ में जिनका उदेश्य इस दो-तिहाई आबादी को पुलिस-थानों या खुफिया एजेंसियों के रिकार्ड में अपराधियों के रूप में दर्ज करना है ताकि उनकी अंगुलियों के निशानों और पुतलियों के चित्रों आदि के माध्यम से अपराधियों की शिनाख्त जल्दी से जल्दी की जा सके।
जहां इन गरीबों को पेशेवर अपराधी मानने वाली इस योजना पर (जो अंग्रजों के वक्त के क्रिमिनल ट्राइब्स कानून की तरह है)40,000·रोड़ रुपये की तत्काल व्यवस्था की गई है, जातिवार जनगणना कराने और सभी जातियों का वर्गी·रण संविधान-सम्मत चार श्रेणियों में (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग और अगड़े) करने के प्राथमिक काम के लिए (जो छह हजार जातियों को चार वर्गों में बांटने का क्रांतिकारी काम है)सरकारें साठ साल से टालमटोल कर रही हैं,बल्कि संसद में आश्वासन देने के बाद भी मुकर रही हैं। जबकि यही योजना इस उपेक्षित जनता को संविधान की पहचान देकर और जाति की परंपरागत पहचान को खत्म कर उसे राष्ट्र का जिम्मेदार और भागीदार नागरिक बना सकती है।
ये वे लोग हैं जिन्हें साम्प्रदायिक दंगों और सामूहिक जनसंहारों से कोई तकलीफ नहीं होती,क्योंकि वे ऐसे नेताओं की प्रशंसा के गीत गाते हैं जिनके हाथ बेगुनाहों के खून से रंगे होते हैं। वे एक राज्य से दूसरे राज्य में आकर बसने और मेहनत-मजदूरी करने वालों के खिलाफ जिहाद चलाने वालों के भी प्रशंसक हैं और शराब जैसी बुरी लत के रोगियों को पेड़ से बांधकर पिटवाने वालों को गांधी और जयप्रकाश की पंक्ति में बिठाते हैं। किंतु भ्रष्टाचार के मूल स्रोतों की पूजा करते हैं और उनकी तरफ से मिली शाबाशी को अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियों और धर्म-संस्थानों के मालिक जो हर रोज अरबों-खरबों रुपयों की हेराफेरी करते हैं,इनके पूज्य हैं। राजनेताओं में भी उन नेताओं पर उनकी अंगुली नहीं उठती जो उनकी अपनी बिरादरी के हैं। उनका निशाना वही होते हैं जो अपनों से अलग होते हैं ।
गांव सभा और अन्य ग्रासरूट की संस्थाओं को विधानसभा जैसी शक्तियां देकर (जिसकी संविधान के 73वें और 74वें संशोधन में व्यवस्था है) और जनता को सूचना के अधिकार की तरह ही शिकायत तथा आलोचना और विरोध का अधिकार देकर हम इस समस्या को बेहतर ढंग से सुलझा सकते हैं। जनता को अंधेरे में रखकर चल रहे राज में अंधेरगर्दी ही हो सकती है और इस स्थिति को बनाने में एक प्रतिशत आबादी द्वारा समझी जाने वाली तथा मुट्ठी भर लोगों द्वारा सही ढंग से लिखी-बोली जाने वाली विदेशी भाषा की गुलामी सबसे बड़ा कारण है। सिविल सोसायटी शायद ही इसे महसूस करे।
 
( जनपक्ष आजकल से साभार)
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • मीडिया में धूमते चेहरे
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.