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माओवाद चला अमेरिकी राह
विनय कांत मिश्र।
 नेपाल में लड़ाई झगड़ा अब बीते जमाने की बातें होंगी। अब शांति होगी। फिलहाल हाल ही में घोषित डा बाबूराम भट्टराई की अमेरिकी यात्रा से तो यही लगता है। बाबूराम भट्टराई अमेेरिका जाने के लिए तैयार हो चुके हैं। अब न तो वह पहले की तरह दिल्ली पढ़ने के लिए आएंगे और न ही मार्क्सवाद का पाठ पढ़ने के लिए जे एन यू की तरफ मुख़ातिब होंगे। अब उन्हें न्यूयार्क रास आ रहा है। क्रांति की लौ जलाने वाले बाबूराम को अब यह बात समझ में आ गई है कि बिना पूॅंजी के कोई वाद नहीं होता। वे दिन और थे जब बिना किसी पूॅंजीपति के सपोर्ट के ही नेपाली जनता ने तख़्ता पलट किया था। नेपाली माओवादियों में प्रमुख पुष्प दहल प्रचंड पर उस समय आरोप लगा था कि प्रचंड चीन समर्थित हैं और बाबूराम को भारत से मदद मिलती है। अब न तो प्रचंड को चीन से और न ही बाबूराम को भारत से हमदर्दी है। दोनों के समवेत सुर अमेरिका की तरफ राह तलाश रहे हैं। यह दूसरी बात है कि अमेरिका खुद हमदर्दी की तलाश में है। अमेरिका आर्थिक मंदी की मार को झेल रहा है। वहॉं हालात बदतर हैं। 
              यह अकारण नहीं है कि नेपाल में बाबूराम भट्टराई के प्रधानमंत्री बनते ही अमेरिका ने नेपाली माओवादियों को आतंकियों की सूची से निकाल दिया। इसके तुरंत बाद ही नेपाल में सरकार चला रही प्रमुख पार्टी यूनीफाइड सी पी एन-माओवादी के अध्यक्ष प्रचंड ने माओवादियों से हथियार जमा करने को कह दिया। घटना चक्र इतनी तेजी से बदला कि वर्षों से चला आ रहा माओवाद; शांत हो गया। अब यह प्रचारित किया जा रहा है कि माओवादियों को मुख्य धारा में शामिल करने के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं और उन्हें शीघ्र ही क्रियान्वित किया जाएगा। इधर बीच प्रचंड और बाबूराम को अपनी ही पार्टी में, पार्टी के उपाध्यक्ष मोहन बैद्य के जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वे सिर्फ वादों के आधार पर माओवादियों द्वारा हथियार जमा कराए जाने के पक्षधर नहीं हैं। पहले दाम तब काम वाली नीति के वे पक्षधर हैं। यहॉं सरकार द्वारा नेपाली माओवादियों को फिर एक बार दिवास्वप्न दिखाया जा रहा है। रोजगार और मूलभूत बुनियादी सुविधाओं से वंचित नेपाली लड़ाकों के सामने संकट है। वहीं सरकार को अमेरिका के सामने शांत दिखने की चुनौती है। 
              उधर अमेरिका भी नेपाल के बफर एस्टेट होने का लाभ लेना चाहता है। अमेरिकी साम्राज्यवादी सोच नेपाल का कितना बकसेगा; यह भविष्य के गर्भ में है। नेपाल में माओवादियों के साथ यदि मधेशी सरकार चला रहे हैं तो इसके पीछे अमेरिकी हाथ है। अमेरिका को भारत और चीन के बीच नेपाल में युद्ध भूमि की तलाश है। चूॅंकि पहाड़ पर अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान में बहुत खराब अनुभव मिले थे, इसलिए वह दोनों के बीच थोड़ी सी समतल और माकूल जमीन की तलाश में है। इसके लिए मधेश प्रांत अमेरिका के लिए सबसे उपयुक्त स्थल हो सकता है। इसके लिए जरूरी था कि पहले नेपाली सरकार में मधेशी सरकार मे शामिल होते। अब वह पूरा भी हो चुका है। बिजय गछादर मधेशी होने के साथ-साथ नेपाल के उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी हैं। वे मधेशी प्रांत के अलगाव और स्वायत्तता की मॉंग नहीं करेंगे इसकी कोई गारेंटी नहीं है। कश्मीर को याद कीजिए। वह अब तक भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए नासूर साबित हो रहा है। अभी नेपाल में संविधान निर्माण की प्रक्र्रिया जारी है और उस संविधान में मधेशी अपने लिए विशिष्ट कवायद जारी रखेंगे। मधेशी अपने लिए जनमत संग्रह भी करा सकते हैं। बहुत जल्द ही भारत और नेपाल के बीच एक नए कश्मीर के पैदा होने का संकट है। यह वक़्त भारत के लिए अपनी नेपाली विदेश नीति की पुनर्समीक्षा का भी है क्योंकि काठमांडू भारत विरोधियों का गढ़ बनता चला जा रहा है। भारत को हर हाल में अपनी नेपाली सीमा को सुरक्षित रखना ही होगा। दूसरे कश्मीर से निपटने की तैयारी करनी ही होगी। 
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