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मुक्तिबोध की 47वीं पुण्य तिथि

अरूण काठोटे

रायपुर(छत्तीसगढ़)। आधुनिक काल के रचनाकार जिन्होंने न केवल तिलस्म बनाएं, बल्कि उन्हें समय-समय पर तोड़ा भी। ऐसे कालजयी रचनाकार का रविवार को राजधानी में स्मरण किया गया। अवसर था गजानन माधव मुक्तिबोध की 47वीं पुण्यतिथि का। वृंदावन हॉल में हुए इस साहित्यिक आयोजन में “मुक्तिबोध के साहित्यिक सहचर”  विषय पर अतिथि साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किए।
आयोजन की अध्यक्षता प्रख्यात कवि विनोदकुमार शुक्ल ने की। आधार वक्तव्य कवि अशोक बाजपेयी ने दिया। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध सहचरों के बीच रचने-बसने वाले रचनाकार थे। उनके संक्षिप्त जीवन में मित्रों की अहम भूमिका थी। उनके सहचरों में हमउम्रों के साथ-साथ अल्प वयीन रचनाकारों में विनोदकुमार शुक्ल के अलावा वे खुद भी शामिल थे। उन्होंने जो रास्ता चुना वह बेहद दुर्गम व कठिन था। मित्रों को संबोधितकर कविता लिखने वाले मुक्तिबोध बिरले कवियों में शामिल थे। मुक्तिबोध के लिए दूसरों से संवाद बेहद जरूरी था। यह उनकी कविता, साहित्य के लिए भी पोषक था। उनका अपना विवेक दूसरों से पुष्ट भी होता था। हिंदी साहित्य की यह बड़ी त्रासदी है कि उनके जीवन में उनका कोई भी कविता संग्रह प्रकाशित न हो सका। श्री बाजपेयी ने उनके सहचरों द्वारा लिखे गए पत्रों का वाचन भी कि या। वे उन चुनिंदा कवियों में थे जो अंत:स्थलों के विप्लव को अपना विप्लव मानते थे। 
इस कड़ी में मुक्तिबोध के दूसरे साहित्यिक सहचर नेमिचंद्र जैन के साथ मुक्तिबोध के संबंधों पर प्रभात त्रिपाठी ने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दोनों की मैत्री में अद्भुत साहचर्य परिलक्षित होता है। अपने पत्रों में वे सर्जनात्मकता का भिन्न स्वरूप प्रगट करते हैं। स्वभाव, संस्कार और परिस्थितियों के कारण मुक्तिबोध अपने तिलस्म को तोड़ते भी रहे। वे रचनाकार के अलावा सौंदर्यप्रेमी भी थे। नेमीजी को लिखे पत्रों में ऐसा लगता है मानो वे खुद का मूल्यांकन भी करते हैं। मुक्तिबोध के सहचरों में नरेश मेहता के संदर्भ में प्रो. कांतिकुमार जैन के आलेख का वाचन संचालक तेजिंदर सिंह ने किया। श्री जैन के अनुसार नरेश मेहता का इलाहाबाद से नागपुर आना मुक्तिबोध को नहीं भाया। दोनों एक-दूजे को खारिज करते रहे। ये दोनों अपनी उपलब्धियों से भी संतुष्ट नहीं थे। मुक्तिबोध अपनी कविता में जितने मुखर थे, उतने ही जिंदगी में संकोची भी थे। नागपुर में उनकी तथा मेहता की भेंट का जिक्र श्री जैन ने किया। सहचरों में हरिशंकर परसाई के साथ संबंधों पर रमाकांत श्रीवास्तव के आलेख का वाचन लाल रामकुमार सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य की व्यापकता, कलात्मकता का दोनों ही रचनाकारों पर प्रभाव पड़ा। मुक्तिबोध जहां काव्य रचते वहीं परसाई जनता की अभिव्यक्ति को स्वर देते। दोनों की रचनाएं तत्कालीन परिवेश की स्थितियों को बखूबी रेखांकित करती हैं। मुक्तिबोध के अन्य मित्र प्रमोद वर्मा के संदर्भ में प्रख्यात समालोचक डा. राजेंद्र मिश्र ने वक्तव्य दिया। श्री मिश्र ने कहा जीवन और रचना के विविध प्रसंगों में असंगतियों के बावजूद मुक्तिबोध तथा प्रमोद वर्मा एक-दूसरे के पर्याय थे। मुक्तिबोध के बगैर प्रमोद वर्मा की कल्पना नहीं की जा सकती। उनकी कविता में अंधेरा बार-बार आता है, उनके जीवन में भी यह गहराई तक व्याप्त था। सहचरों में पांचवे क्रम पर श्रीकांत वर्मा के संदर्भ में युवा आलोचक जयप्रकाश ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि नागपुर को साहित्यिक नक्षत्र बनाने का श्रेय मुक्तिबोध को जाता है। कहन अधिक तथा अलंकरण कम की शैली का मुक्तिबोध ने उल्लेख भी किया है। श्रीकांत वर्मा के रूप में उन्हें अपना बौद्धिक सहचर मिला था। यह भी संयोग था कि नागपुर में एकत्र सभी सहचर न केवल प्रवासी थे बल्कि अपनी जिंदगी से भी जूझ रहे थे। दोनों की कविताएं अपने समय को तीखे ढंग से जीवंतता के साथ रेखांकित करती हैं। दोनों की कविता ध्वंस भी है। 
आयोजन के अध्यक्ष विनोदकुमार शुक्ल ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में कहा कि जिन नामों का जिक्र मुक्तिबोध आत्मीयता के साथ करते थे, परसाई भी उन्हीं नामों का उल्लेख करते थे। मुक्तिबोध के साथ अपनी मुलाकात का भी उन्होंने स्मरण किया। कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध ने आभार प्रदर्शित किया। प्रारंभ में सभी आमंत्रित वक्ताओं का स्वागत रमेश मुक्तिबोध ने किया। आयोजन इस लिहाज से सफल रहा चूंकि इसमें मुक्तिबोध के एक नए अनछुए पहलू को उजागर करने का प्रयास किया।   
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