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पटेल की कहानी पर धुंध

गोपालकृष्ण गांधी 
समय सिकुड़ रहा है, तारीखें तंग होती चलती हैं। अक्टूबर को ही देखिए, त्योहारों-तिथियों से खचाखच है। उसकी दो तारीख न सिर्फ महात्माजी की जयंती है, लाल बहादुर शास्त्री की भी है। फिर अक्टूबर 2 को ही, 1975 में, कुमारस्वामी कामराज का आकस्मिक देहांत हुआ था। वह उस कर्मठ नेता की पुण्यतिथि भी बनती है। इतिहास में रुचि रखने वालों के दिलों में अक्टूबर 31 की एक अपनी पहचान है : यह दिन सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्मदिन है। कभी यह बड़ी उमंग से मनाया जाता था। एक बार गुजरात में कुछ लोग जब उस सालगिरह को अनायास भूल गए तो गांधीजी ने उन्हें खूब फटकारा था। अब दर्द के साथ हम उस ही तारीख को इंदिरा गांधी की शहादत के दिन से भी पहचानते हैं।
जन्म-मरण एक काल के दो सत्य हैं।
हम जन्म शताब्दियां खूब मनाते हैं। लेकिन सरदार पटेल की जन्म शताब्दी जब हुई थी, तब देश ने उस मौके को सही ढंग से नहीं पहचाना। कारण? तब देश में इमरजेंसी लागू थी। इंदिराजी ने ऐसा कोई नकारात्मक निदेश नहीं भेजा था। वे हजार मसलों में मसरूफ थीं। लेकिन लोगों ने अनुमान लगाया ‘कौन जाने वे क्या सोच बैठें? कुछ न करने में ही सलामती है।’ वह जमाना था भी ‘बातें कम, काम ज्यादा’ का। दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में मेरे अग्रज अध्यापक रामचंद्र ‘रामू’ गांधी ने उस नारे में एक संशोधन लगा दिया था : ‘बातें कम, चाय ज्यादा!’ कई आस्तीनों में मुस्कराए और रामूजी को धन्यवाद करते हुए चलते गए।
आज आपातकाल नहीं। तिस पर भी सरदार पटेल की याद और उनकी कर्म-कहानी पर धुंध की परत बैठी है। यह किसी के भी निदेश पर नहीं। कौन ऐसा आदेश-निदेश भेजेगा? लेकिन ‘भैया, सावधानी में भलाई है’ सोचने वालों की आज कमी नहीं। 1947-1950 में ‘नेहरू के लोग’ और ‘पटेल के लोग’ जैसे दो गुटों में राजनीतिज्ञों और अफसरों को बांटा गया था। नेहरू-पटेल में एक द्वंद्वयुद्ध देखा जा रहा था। मूलत: ऐसा कोई द्वंद्व नहीं था। दोनों अग्रणी संग्रामी रह चुके थे। एक के हाथ में मानिए खड्ग था, दूसरे के हाथ में गदा। आजादी मिल जाने के बाद दोनों प्रशासनिक चुनौतियों में लग गए। एक के हाथ में नाजुक कलम आई, दूसरे ने सम्हाला हथौड़ा। एक को नियति ने बैठाया सिंहासन पर, दूसरे को गजासन पर। एक में कल की सोच थी, दूसरे में आज की पहचान। अन्य लोग उनमें द्वंद्व देख सकते हैं, लेकिन उनके पास इसके लिए समय कहां था?
उनमें दृष्टिभेद जो थे, खुले थे, स्वच्छ थे। विभाजक नहीं थे, विषैले नहीं थे। उनमें प्रतिस्पर्धा नहीं थी, स्वार्थ की बू नहीं थी। लेकिन आज भी अपने-अपने मतलब के लिए तकसीम की जाती है : नेहरू लेफ्टिस्ट-वामपंथी, पटेल राइटिस्ट-दक्षिणपंथी, नेहरू सेकुलर, पटेल परंपरावादी, नेहरू आधुनिक, पटेल रूढ़िवादी, नेहरू विश्ववादी, पटेल राष्ट्रवादी। सरदार पटेल के जीवन के आखिरी साल 1950 को देखें। तब तक हमारे सरदार ने 554 राजप्रांतों का भारत में विलय कर दिया है। सरदार के हाथों में पंडित नेहरू के सौंपे हुए दो महकमे हैं : गृह और सूचना प्रसारण मंत्रालय। सरदार पटेल भारत के उपप्रधानमंत्री भी हैं।
दोनों के परिदृश्यों में अंतर जो हैं, सो राजनीति के खुले मैदान में मुकाबला होता है कांग्रेस की अध्यक्षता को लेकर। सरदार के समर्थित पुरुषोत्तमदास टंडन खड़े होते हैं और पंडितजी द्वारा समर्थित आचार्य कृपलानी को हरा देते हैं। और फिर, भारत के प्रथम राष्ट्रपति के पद के लिए सरदार पटेल द्वारा समर्थित बाबू राजेंद्र प्रसाद सफल होते हैं, न कि पंडितजी के पसंद के चक्रवर्ती राजगोपालाचारी। लेकिन सरदार इसमें न खुद की जीत देखते हैं, न पंडितजी अपनी हार। हां, राय-पसंदगियां भिन्न रहीं, बस। अब चुनाव हो गए हैं, बात खत्म। करने को आगे बहुत काम हैं। नेहरू बहादुर इंसान हैं, पटेल निडर। दोनों देश के सिपाही।
उपप्रधानमंत्री की निडरता की कई मिसालें दी जाती हैं। एक व्यक्तिगत है। उनका हवाई जहाज आकाश में डांवाडोल होकर भूमि पर उतर पड़ता है। कहां? क्यों? देश को घंटों तक सूचना नहीं। सब घबराए हुए हैं। प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा। जब खबर मिलती है कि सरदार सुरक्षित हैं, पंडितजी खुशी से उछल पड़ते हैं। पता चलता है लुढ़कते विमान में सरदार तनिक भी विचलित न हुए थे। लौटने पर सरदार जब पार्लियामेंट हाउस में प्रवेश करते हैं, सभा तालियों से गूंज उठती है, मानो कह रही हो ‘हम इस आदमी के हाथों में सुरक्षित हैं, भगवान इन्हें सुरक्षित रख!’ सरदार की उम्र तब 75 है। दिल का दौरा भी हो चुका है। वे फिक्रमंद हैं। 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में कहते हैं : ‘मुझे आज उपप्रधानमंत्री कहा जाता है। लेकिन मैं अपने को इन परिभाषाओं में नहीं देखता। हमारे नेता जवाहरलाल हैं। बापू ने उन्हें अपना वारिस कहा। बापू के सिपाहियों का फर्ज है कि बापू का कहा मानें.. जो ऐसा नहीं करता, वो भगवान की निगाह में अपराधी है..।’
नवंबर में सरदार अस्वस्थ हैं। 23 नवंबर 1950 को पंडितजी उनके घर आते हैं। सरदार कहते हैं : ‘जवाहर, जब जरा शक्ति आ जावेगी, तब एकांत में बातें करेंगे.. मुझ पर तुम्हारा विश्वास कहीं कम तो नहीं हो रहा..’ पंडितजी कहते हैं : ‘वल्लभभाई ऐसा न कहें.. मुझे अपने पर विश्वास कम हो रहा है।’ 5 दिसंबर 1950 को सरदार की बेटी मणिबेन उन्हें नजीर का एक जुमला गाते पाती हैं : ‘जिंदगी का यह तमाशा चंद रोज..’। हवा-बदल के लिए बंबई जाने की सलाह मिलती है। जाते हैं। और बंबई ही में चिराग बुझता है। दाह संस्कार पर राष्ट्रपति प्रसाद मौजूद हैं, पंडित नेहरू भी, और राजगोपालाचारी, लाखों लोगों के साथ। सब अश्रुपूर्ण। सब इस सोच में ‘बापू गए, अब सरदार.. कौन करेगा रहनुमाई..?’ आज जो लोग नेहरू व पटेल को द्वंद्व में देखते हैं, और उनके पृथक नामों पर तीरें तेज करते हैं, वे यह समझें : ऐसे बहुत काम पड़े हैं, जिनमें उन दोनों की अविभाजित प्रेरणा जरूरी है। कल की सोच जरूरी है, आज की पहचान भी। प्रशासन के बासाफ हाथों में कलम जरूरी है, हथौड़ा भी। 

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