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कार्पोरेट घरानों की लूट का सवाल

आनंद स्वरूप वर्मा
अमेरिका के न्यूयार्क शहर से 17 सितंबर को ‘आक्यूपाई वाल स्ट्रीट’ नामक जो आंदोलन शुरू हुआ वह एक डेढ़ महीने के अंदर अमेरिका के 1500 शहरों तक और दुनिया के 80 देशों तक फैल गया है। पश्चिमी मीडिया ने शुरू में तो इन खबरों का एक तरह से ब्लैकआउट किया लेकिन आगे चलकर इन्हें अखबारों और टीवी चैनलों पर जगह मिलने लगी। जनता द्वारा शुरू किए गए इस स्वतःस्फूर्त आंदोलन के बारे में भारत के मीडिया में अभी भी कोई खास हलचल नहीं दिखायी दे रही है। लगभग इसी शैली पर अब से कुछ माह पूर्व बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू हुआ था और उसको लेकर मीडिया में अभूतपूर्व बदहवासी दिखायी दी थी। अमेरिका के आंदोलन ने जहां तेजी से बढ़ती आर्थिक असमानता और कार्पोरेट घरानों की लूट को उजागर किया वहीं भारत में चले आंदोलनों ने राज्य स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। यह भ्रष्टाचार किस तरह भारतीय समाज में-खास तौर पर मध्य वर्ग में जीवन शैली का रूप लेता जा रहा है और इसके प्रति लोगों के अंदर जो आक्रोश पैदा हो रहा है उसका लाभ रामदेव और अन्ना हजारे दोनों के आंदोलनों को मिला।
देखा जाए तो पश्चिमी देशों के मुकाबले दक्षिण एशिया की स्थिति कहीं ज्यादा खराब है। जहां तक कार्पोरेट घरानों की लूट का सवाल है, भारत में इस लूट में राजनीतिक नेताओं की हिस्सेदारी तय है चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल के क्यों न हों। पश्चिमी देशों में इन हालात ने मंहगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता को बढ़ावा दिया है जिसके वे अभ्यस्त नहीं थे। उनका मानना है कि नयी आर्थिक नीति का लाभ एक प्रतिशत आबादी को मिला और 99 प्रतिशत के हिस्से में बदहाली आयी। यही वजह है कि वाल स्ट्रीट के आंदोलनकारियों के हाथ में ‘99 प्रतिशत’ लिखी तख्तियां दिखायी पड़ जाएंगी। वे खुद को 99 प्रतिशत कहते हैं।
इन सबके बावजूद जनतंत्र, जनतांत्रिक व्यवहार, जनतंत्र के तौर तरीके, जनतंत्र की वजह से पैदा संस्कृति इन सब बातों को ध्यान में रखकर अगर मूल्यांकन करें तो पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत की जो हालत है उसकी कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। जिन देशों में कुछ सौ वर्षों से जनतंत्र है और जहां पूंजीवाद विकास की एक निश्चित अवस्था तक पहुंच चुका है वहां समाज में और राजनीति के शिखर पर बैठे लोगों में भी इन स्थितियों के प्रति एक तरह की संवेदनशीलता दिखायी देती है। लेकिन दक्षिण एशिया में और खास तौर पर भारत जैसे देश में जहां सामंतवाद के अवशेष हैं अथवा जहां की समाज व्यवस्थाएं अर्द्ध सामंती हैं वहां के शासकों के माथे पर इन स्थितियों से थोड़ी भी शिकन नहीं पड़ती। उल्टे वे बड़ी बेशर्मी के साथ उस वैभव का अश्लील प्रदर्शन करते हैं जो आम आदमी की लूट से अर्जित है। अभी हिंदी के एक अखबार में पत्रकार अंबरीश कुमार की रिपोर्ट देखने को मिली जिसमें बताया गया है कि जिस समय उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में इलाज के अभाव में इनसेफ्रलाइटिस (जापानी बुखार) से मरने वाले बच्चों की संख्या 500 पार कर रही थी ठीक उसी समय ग्रेटर नोएडा के बुद्ध सर्किट में फार्मूला-1 रेस के लिए अरबों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे थे। गोरखपुर में इस मौसम में हर साल जापानी बुखार से हजारों बच्चों की मौतें होती हैं और हर साल यह कहा जाता है कि इसकी वजह राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पर्याप्त पैसा न देना है। जो सरकार बच्चों के इलाज के लिए पैसे न उपलब्ध कराने की आपराधिक कार्रवाई में संलग्न हो वह अगर फार्मूला-1 रेस के आयोजन पर 20 अरब रुपए से भी अधिक राशि खर्च कर रही हो तो इसे क्या कहंेगे। अंबरीश कुमार की रिपोर्ट में ही इसे भाकपा के हवाले से ‘चिंतनहीन राजनीति की अय्याशी का दौर’ तो बकौल सपा नेता राजेन्द्र चैधरी इसे ‘शमशान में शाही दावत का इंतजाम’ कहा गया है। ध्यान देने की बात है कि इस अय्याशी की चपेट में ग्रेटर नोएडा के वे किसान भी आए हंैं जिनकी 875 एकड़ जमीन जबरन छीनकर फार्मूला-1 रेस की सर्किट तैयार की गयी है। हमारे दौर के ये अश्लीलतम प्रसंग हैं जो हमारी सामाजिक अवस्था को व्यक्त करते हैं।
अभी अधिक समय नहीं हुआ जब अरब देशों में जनता के स्वतःस्फूर्त आंदोलनों की लहर आयी थी जो मिस्र के तहरीर स्क्वायर से शुरू होकर ट्यूनीशिया होते हुए कई देशों तक फैल गयी थी। इस लहर को मीडिया ने काफी प्रचार दिया था। यह जनता के वास्तविक असंतोष की अभिव्यक्ति थी जो तानाशाहों के निरंकुश शासन के तले पिस रही थी। हमने देखा कि वास्तविक असंतोष से उत्पन्न आंदोलन का भी किस तरह पूंजीवादी और शोषक ताकतें अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेती हैं। मिस्र और ट्यूनिशिया में यही हुआ। निरंकुश शासन से मुक्ति तो मिल गयी लेकिन वहां अमेरिका समर्थित पूंजीवादी ताकतें पिफर सत्तारूढ़ हो गयीं। इतिहास से बार-बार हमें यह सबक मिला है कि आम तौर पर जन असंतोष से उपजे स्वतःस्फूर्त आंदोलन दमनकारी तंत्र को ध्वस्त तो कर सकते हैं लेकिन यथास्थिति में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं ला सकते। यही वजह है कि असंतोष तीव्र होने पर दमनकारी ताकतंे अपना रूप बदलकर इन स्वतःस्फूर्त विद्रोहों के साथ खड़ी हो जाती हैं और एक भ्रम पैदा करती हैं। शायद यही वजह है कि जनता के असंतोष को अभिव्यक्ति देने वाली विचार आधारित ताकतों और आंदोलनों के प्रति मीडिया जानबूझ कर उपेक्षा दिखाता है ताकि उन्हें किसी तरह का प्रचार न मिले। वर्ग आधरित समाज में और वह भी ऐसे समय जब सत्ता पर पूंजी का दबदबा हो और सत्ता के संचालक कार्पोरेट घराने हों आप किसी स्वतंत्र मीडिया की उम्मीद कर भी नहीं सकते। ऐसी हालत में उन बातों को जिसे एक सोची-समझी रणनीति के तहत मीडिया ब्लैकआउट कर रहा है, जनता तक पहुंचाने के नए-नए तरीके ढूंढने होंगे।
अरब जनता के विद्रोह से लेकर रामदेव-अन्ना के विरोध प्रदर्शन की खबरों को जनता तक पहुंचाने वाले स्रोतों ने क्या कभी यह जानकारी देने की कोशिश की कि दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों-पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान आदि में उन आंदोलनों की क्या स्थिति है जो सचमुच जनता को बदहाली से निजात दिला सकते हैं या जो स्वतःस्फूर्त जन आक्रोश की अवस्था में आगे बढ़कर लड़ाई की कमान अपने हाथ में ले सकते हैं और स्थिति को अराजक होने से बचा सकते हैं? आप गौर करेंगे कि दक्षिण एशिया के सभी देशों में आंदोलन की चेतना एक कदम आगे बढ़ी है। सैनिक तानाशाहों और मौलवी-मुल्लाओं से त्रस्त पाकिस्तान में एन जी ओ संस्कृति के अत्यधिक प्रसार के बावजूद वामपंथी आंदोलन की वापसी हो गयी है जिसकी धमक 1960 और 1970 के दशक तक बनी हुई थी और जिसका दमन करने के लिए जियाउलहक के सैनिक शासन को 20 साल लगे। श्रीलंका में ‘जनता विमुक्त पेरुमना’- जेवीपी, नाम से विख्यात कम्युनिस्ट आंदोलन जिसने 1971 और 1986-89 में सशस्त्र संघर्ष के जरिए सरकार की नींद हराम कर दी थी अब फिर एक नए रूप में अपने को संगठित कर चुका है। भूटान में शरणार्थी शिविरों से शुरू हुआ माओवादी आंदोलन भूटान की सीमा के अंदर प्रवेश कर चुका है। बांग्लादेश में 1970 के दशक में मारे गए माओवादी नेता सिराज सिकदर द्वारा शुरू की गयी पार्टी, जिसे पूरी तरह समाप्त समझा जाता था, एक बार फिर अस्तित्व में आ चुकी है। ध्यान देने की बात है कि सैनिक तानाशाही से जूझते देशों में जहां इन आंदोलनों की अभिव्यक्ति सामान्य वामपंथी या जनतांत्रिक आंदोलन के रूप में हो रही है वहीं उन देशों में जहां कम्युनिस्ट या किसान-मजदूर पार्टियों के रूप में वामपंथ पहले से स्थापित है, अपने विकास के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। ऐसा हमने पश्चिम बंगाल में देखा जहां जनता ने संसदीय वामपंथ को खारिज कर दिया; जिसका फौरी तौर पर लाभ ममता बनर्जी को मिला, क्योंकि संसदीय वामपंथ के बरक्स उसे क्रांतिकारी वामपंथ दिखायी दे रहा था। कुछ दशक पहले आंध्र प्रदेश में यह स्थिति पैदा हुई थी जो पिछले दशक में बिहार और झारखंड में देखने को मिली।
जनता के असंतोष का लाभ उठाकर विश्व पूंजीवाद द्वारा पोषित वे तत्व एक अराजक स्थिति पैदा करना चाहते हैं जिन्हें पता है कि ऐसा करके वे उन ताकतों को कमजोर कर सकते हैं जो सचमुच सामाजिक संरचना में आमूल-परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं। जो सचमुच अन्याय और शोषण पर टिकी व्यवस्था को नेस्तनाबूद कर सकते हैं। जो सचमुच एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में आंदोलन की धार को मोड़ सकते हैं और नेतृत्व को संभाल सकते हैं। इस स्थिति को रोकने वाली ताकतें बहुत हड़बड़ी में हैं और वे जल्द से जल्द जनता के असंतोष का लाभ उठाकर ऐसे आंदोलन खड़े करने में लगी हैं। उनकी इस सक्रियता को देखते हुए जरूरत है कि वास्तविक वामपंथी और क्रांतिकारी ताकतें अपने कार्यक्रम में तेजी लावें ताकि वे ऐसी किसी स्थिति में नेतृत्व संभाल सकें। समय बहुत कम है, रास्ता लंबा है और दुश्मन हड़बड़ी में है।
समकालीन तीसरी दुनिया

आनंद स्वरूप वर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और माक्र्सवादी चिंतक हैं। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के संपादक हैं।

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