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जिए भी एक अखबार की तरह

जयप्रकाश चौकसे 
देव आनंद ने तेईस वर्ष की आयु में ‘हम एक हैं’ से अपनी अभिनय यात्रा प्रारंभ की और आज उनके देहावसान के समय भारत में ध्वनि गूंज रही है ‘हम अनेक हैं’ और देश अनेक विभाजनों की भूमिका रच रहा है। सभी प्रमुख नेताओं और दलों की अपनी-अपनी ढपली है और अपना-अपना राग है। यहां तक कि कुछ लोग अपने बौनेपन के अनुरूप अपना गढ़ और देश बनाना चाहते हैं। उन्हें प्रधानमंत्री बनना है, भले ही वृहत भारत लघु भारत हो जाए। राजनीति में इस समय कुटीर और कुटिल उद्योग चल रहा है।
देव आनंद ने अपने कॅरियर में केवल कुछ महीने सक्रिय राजनीति में भाग लिया था, जब नेहरूजी की मृत्यु के बाद राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र राजनीतिक दल की स्थापना की थी। शीघ्र ही उनके राजनीतिक भरम टूटे और जितनी जल्दी उन्होंने दल से संबंध जोड़ा था, उतनी ही शीघ्रता से वे उससे बाहर आ गए, परंतु देश में उनकी रुचि हमेशा रही।
उन्होंने मूल्यहीनता के राजनीतिक वातावरण के खिलाफ अपनी ‘चार्जशीट’ भी प्रस्तुत की और उसके पहले एक फिल्म में वे प्रधानमंत्री की भूमिका भी कर चुके थे। वह पात्र माफिया और राष्ट्रविरोधी ताकतों से घिरा है और सीधे अवाम से मुखातिब होता है। देव आनंद ऐसे ‘गाइड’ थे, जो स्वयं भटक गया था और सच तो यह है कि उनका भटकना कमोबेश देश द्वारा दिशा खोने का भी प्रतीक था। इस मायने में उनकी मृत्यु राष्ट्रीय शोक भी मानी जा सकती है। दरअसल आज के सांस्कृतिक शून्य के दौर में हर समर्पित व निष्ठावान व्यक्ति की मृत्यु राष्ट्रीय शोक ही मानना चाहिए, क्योंकि यह प्रजाति विरल हो गई है।
देव आनंद शायद उन कम फिल्मवाले लोगों में से एक थे, जो अखबारों को गंभीरता से पढ़ते थे और उनकी अनेक फिल्मों की कहानियां उन्होंने सुर्खियों से उठाई हैं, जैसे ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘देश-परदेश’, ‘स्वामी दादा’, ‘काला बाजार’, ‘सीआईडी’ इत्यादि। तमाम यात्राओं के समय देव आनंद अखबार पढ़ते थे और सच तो यह है कि देव आनंद जिए भी एक अखबार के मुखपृष्ठ की तरह।
जैसे अखबार दूसरे दिन बासी हो जाता है, वैसे ही देव आनंद ने अपनी बनाई फिल्मों को दोबारा नहीं देखा और न ही उनके बारे में सोचा। उनकी विचार प्रक्रिया भी हमेशा ताजे अखबार की तरह रही।
उन्होंने कभी तीन रुपए किलो बिकने वाली रद्दी की फिक्र नहीं की, वे जिए तीन रुपए प्रति वाले ताजे अखबार की तरह। ताजगी के प्रति मोह से ही उनकी असीम ऊर्जा प्रवाहित रही। इस रवैये की तरह ही देव आनंद का ध्यान ताजी खबर को शीघ्र प्रकाशित करने जैसा रहा और उनकी अखबारों की तरह बनी फिल्मों में उन्होंने कभी प्रूफ दुरुस्त करने में समय जाया नहीं किया।
यह पढ़ने का शौक ही था कि आरके नारायण की ‘गाइड’ उन्होंने पढ़ी और इतनी साहसी गैरपारंपरिक फिल्म का निर्माण किया। यह भी गौरतलब है कि ‘गाइड’ के अंग्रेजी संस्करण में उनकी सहनिर्माता नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल एस. बक थीं। उनकी आधुनिकता उनके कपड़ों की स्टाइल तक ही सीमित नहीं थी, वह उनकी विचार शैली का भी अविभाज्य अंग थी। फिल्म उद्योग में फिल्म का मुहूर्त, प्रीमियर और रजत जयंती, ये तीन उत्सव होते हैं। देव आनंद का जीवन और सोच का प्रतीक ‘प्रीमियर’ है, उन्होंने कभी ‘मुहूर्त’ नहीं किया और न ही ‘रजत जयंती’ मनाई। प्राय: फिल्मकार धार्मिक अनुष्ठान के साथ मुहूर्त करते हैं और इत्तेफाक से फिल्म सफल हो जाए तो पांच सितारा होटल में रजत जयंती का उत्सव स्वयं की खुशी से ज्यादा प्रतिद्वंद्वी को जलाने के लिए करते रहे हैं।
देव आनंद ने कभी कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया, कभी कोई दावत नहीं दी, क्योंकि वे सदैव अपने काम में लीन हर किस्म की शोशेबाजी से दूर रहने वाले व्यक्ति थे। उनके ‘कर्म’ में उनका ‘धर्म’ और उनकी खुशी शामिल थी। इतनी एकाग्रता कम ही देखने को मिलती है।
देव आनंद की माता ने अपने ज्येष्ठ पुत्र चेतन आनंद को कुछ वर्षो के लिए कांगड़ी गुरुकुल भेजा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके पति की आधुनिकता बच्चों को बिगाड़ रही है। देव आनंद ने अंग्रेजी साहित्य में डिग्री प्राप्त की और स्वयं को किसी भी गुरुकुल में भेजे जाने का विरोध किया।
दरअसल देव आनंद का आधुनिकता के प्रति ऐसा रुझान था कि जीवन में केवल एक बार दक्षिण भारत में बनी ‘इंसानियत’ में उन्होंने ग्रामीण युवा की भूमिका की, अन्यथा ताउम्र उन्होंने महानगरीय युवा की भूमिकाएं की। इस आधुनिकता के निर्वाह के साथ ही उन्होंने अपनी श्रेष्ठ फिल्म ‘गाइड’ के आखिरी हिस्से में स्वामी की भूमिका को पूरी विश्वसनीयता से प्रस्तुत किया। श्रद्धालु ग्रामीण उन्हें जबरन स्वामी मान लेते हैं और इस अनिच्छुक संशयग्रस्त स्वामी की भूमिका करना देव आनंद के अपने जीवन में संशय की स्थिति से उबरने की प्रक्रिया का हिस्सा था
देव आनंद ने अभिनेता बनने की महत्वाकांक्षा से मुंबई में प्रवेश किया और उनकी पहली और आखिरी नौकरी सैनिकों द्वारा अपने परिवार को लिखे पत्रों को सेंसर करने की थी। उन्होंने खत पढ़े और कुछ इबारतें मन में अंकित रहीं, जिनकी अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने ‘हम दोनों’ बनाई, जिसमें साहिर ने उनके लिए गीत लिखा : ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।’ यही मुखड़ा कमोबेश उनका जीवन गीत बन गया।
दुनिया के अनेक देशों में टेक्नोलॉजी द्वारा विकसित माध्यमों के विकास के कारण अखबारों का प्रकाशन बंद-सा हो रहा है। अनेक पुराने स्थापित अखबार केवल सप्ताहांत में अखबारी रूप में प्रकाशित हो रहे हैं, शेष दिन वे इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
भारत में अभी इस तरह का समय नहीं आया है, परंतु पूर्वानुमान लगाने में हमेशा सक्षम देव आनंद नामक अखबार का आखिरी अंक प्रकाशित हो चुका है। देव आनंद नामक सदाबहार अदा हमारी स्मृति में हमेशा कायम रहेगी। यह कसक भी उनके प्रशंसकों में रहेगी कि ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं।’
(लेखक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और स्तंभकार हैं।) 

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