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राजनीति में अपराधियों का बोल-बाला

 संदीप पांडेय

आज मुख्य धारा की राजनीति विभिन्न विकास की योजनाओं के धन की चोरी व लूट तथा बड़ी परियोजनाओं के कमीशन के पैसे से पोषित है। चूंकि भ्रष्टाचार करना अपराधियों के लिए अपेक्षाकृत सरल काम है इसलिए राजनीति में अपराधियों का बोल-बाला है। राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है जिसकी वजह से सत्ता में आने पर वे लोकतंत्र के मूल्यों का सम्मान नहीं करते। विचारधारा की जगह दिखावा व बड़े नेताओं के प्रति अंध-श्रध्दा राजनीति में सफलता के मंत्र माने जाते हैं। राजनीति में जनता के मुद्दों के स्थान पर भावनात्मक मुद्दे हावी होते हैं। ग्लैमर व पैसे का वर्चस्व है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नही कि इस किस्म की राजनीति का चरित्र जन-विरोधी हो चुका है।
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि वर्तमान में भ्रष्टाचार एवं अपराध के शिकंजे में फंसी राजनीति को मुक्त करा लोगों के सामने एक साफ-सुथरा राजनीतिक विकल्प खड़ा करना समय की मांग है। आइए इस वैकल्पिक राजनीति के स्वरूप की कल्पना करें।राजनीति को सबसे बड़ा नुकसान वे लोग पहुंचा रहे हैं जो राजनीति को एक पेशा मानने लगे हैं। आज राजनीति में अराजनैतिक लोगों की घुसपैठ हैं। कायदे से तो राजनीति उन्हें ही करनी चाहिए जिन्होंने जनता के बीच उसके मुद्दों पर काम किया हो। जन-संगठनों व जन-आंदोलनों में नेतृत्व की भूमिका में रहे लोगों, जिनकी समतामूलक समाज निर्माण की एक स्पष्ट सोच है, राजनीति के लिए सबसे आदर्श लोग हैं। जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने वालों के राजनीति में आने से राजनीति की गुणवत्ता बढ़ेगी। किसी अन्य पृष्ठभूमि के व्यक्ति को अचानक राजनीति में लाने से राजनीति का बहुत नुकसान होता है। उदाहरण के लिए हम फिल्मी दुनिया के लोगों या उद्योगपतियों को देखें जो राजनीति में आए हैं। उनमें से इक्के-दुक्के को छोड़ कर बाकी किसी ने राजनीति में कोई सृजनात्मक योगदान नहीं दिया है। वे दूसरे योग्य उम्मीदवारों को, जिन्होंने शायद राजनीति में पूरा जीवन लगाया हो, विधायिका का हिस्सा बनने से वंचित करते हैं। यह भी सवाल पूछा जाना चाहिए कि फिल्मी दुनिया के लोग या उद्योगपति सीधे संसद के चुनाव में ही क्यों उतरते हैं? या फिर फिल्मी दुनिया के लोग राज्य स्तर पर अपना दल बना कर मुख्य मंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं। यदि उन्हें जन सेवा करने का शौक है तो वह तो किसी भी स्तर पर हो सकती है, बल्कि उसके लिए चुनाव लड़ना भी जरूरी नहीं है। चुनावों में उम्मीदवारों का चयन, भले ही वे किसी दल से सम्बध्द हों अथवा निर्दलीय हों, जनता की सहमति से होना चाहिए। जनता के बीच उम्मीदवार के चयन की एक खुली प्रक्रिया होनी चाहिए। जैसे अमरीका में दल का उम्मीदवार बनने के पहले उसे अपने दल के अंदर ही चुनाव लड़ना पड़ता है। चुनाव प्रचार कम संसाधनों में पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। प्रत्याशियों को अपने किए हुए काम के आधार पर ही वोट मांगने चाहिए। कायदे से तो प्रचार की कोई जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। यदि प्रत्याशी ने जनता के लिए काम किया है तो लोग जरूर उसको वोट देंगे। यदि ऐसा हो जाए तो हम कुछ अवांछित चीजों से निजात पर सकते हैं। जैसे, एकदम नए उम्मीदवारों से हम बच सकते हैं जिन्हें अभी परखा ही नहीं गया है, लुभावने वायदों या भावनात्मक मुद्दों से हम बच सकते हैं। फिर जनता के मुद्दे ही चुनाव के मुद्दे होंगे। हारने या जीतने का उम्मीदार की कार्य-प्रणाली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वह जैसे पहले काम करता था उसी तरह चुनाव के बाद भी काम करता रहेगा। राजनीति को उसके भटकाव से वापस मूल स्वरूप में लाने में ऐसा कदम सहायक होगा।
राजनीति को भटकाने के लिए कई किस्म की भ्रामक बातें होती हैं। जैसे कई लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे के पढ़े-लिखे लोगों को राजनीति में आना चाहिए। लेकिन शिक्षा से इंसान समझदार बनता हो ऐसा जरूरी नहीं है। शिक्षा से व्यक्ति हेरा-फेरी के सारे तरीके सीख जाता है। सही बात तो यह है कि समझदार लोगों को राजनीति में आना चाहिए जिनकी सोच सामाजिक हो तथा जो ईमानदार हों। कुछ लोग कहते हैं कि राजनीति में सेवा निवृति की उम्र होनी चाहिए ताकि युवाओं को मौका मिल सके। जो बात राजनीति के सम्बन्ध में शिक्षा के संदर्भ में कही गई है वही उम्र के बारे में भी लागू होती है। समझदारी का उम्र से कोई विशेष लेना देना नहीं, हलांकि उम्र के साथ परिपक्वता जरूर आती है। लेकिन उम्र के साथ व्यक्ति आदर्शों से भटकता भी है। युवाओं में निष्चित रूप से सम्भावनाएं छिपी होती हैं। जो युवा उपभोगतावाद व अपने पेशे में चूहा दौड़ से मुक्त हैं वे ही सामाजिक बदलाव के वाहक बन सकते हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि युवाओं के नाम पर फिलहाल तो राजनीति में उत्तराधिकार की परम्परा चल पड़ी है। राजनीति में वंशवाद इसलिए घातक हैं क्योंकि यह किसी भी दल के आंतरिक लोकतंत्र के लिए अशुभ है। जहां काबलियत के बजाय भाई-भतीजावाद हावी हो वहां राजनीतिक पतन तय है। नासमझदार युवाओं, जैसे, वरुण गांधी, से समाज को खतरा भी है। ऐसे युवा जोश में होश गवां बैठते  हैं। बिना समाज सेवा की कठिन राह पर चले किसी ऊंचे सार्वजनिक पद पर किसी युवा के बैठने में खतरा ही ज्यादा दिखाई पड़ता है।
राजनीति देश फैले भ्रष्टाचार के लिए सीधे-सीधे दोषी है क्योंकि आज राजनीतिक दलों का वित्तीय पोषण ही इससे हो रहा है। कोई भी प्रलोभन का तरीका राजनीति से जनता के मुद्दों को हाशिए पर  ढकेलने का काम करता है। इससे भी राजनीति का नुकसान होता है। जन प्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता  तथा जनता के प्रति उनकी जवाबदेही तय की जानी आवश्यक  है। जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार तो आज भी है। छत्तीसगढ़ के तीन स्थानीय निकायों में इसका इस्तेमाल भी हुआ है। इसका इस्तेमाल और आसान बनाया जाना चाहिए ताकि जनता का अंकुश  जन प्रतिनिधियों पर रहे। चुनाव के दौरान सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार भी जनता को है ही किन्तु अभी यह बहुत सारे लोगों को यह मालूम नहीं है। इस बात का पर्याप्त प्रचार होना चाहिए कि यदि लोग चाहें तो किसी को भी अपना मत नहीं दे सकते हैं। इस प्रक्रिया को भी और सरल बनाए जाने की जरूरत है। जब ज्यादा लोग इस प्रावधान का इस्तेमाल करने लगेंगे तो राजनीति दल भी दागी छवि के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाना बंद करेंगे।
कई पढ़े-लिखे लोग, खासकर सर्वण पृष्ठभूमि के, आरक्षण की नीति का विरोध करते हैं। किन्तु भारत जैसे जाति विभाजित समाज में, जो भेदभाव, शोषण  व अत्याचार का आधार भी बनता है, समतामूलक समाज निर्माण् हेतु आरक्षण की नीति की आवश्यकता आज भी है। इसका सकारात्मक पहलू यह है कि इसने समाज के वंचित तबकों से राजनीतिक नेतृत्व उभरने में मदद की है जिससे समाज में राजनीतिक समानता तो कुछ हद तक स्थापित हुई है। यह भारत के संविधान व राजनीति की बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। भारत की राजनीतिक व्यवस्था में इस बात की गुंजाइश है कि कोई भी वंचित समुदाय अपना दल बना कर अपने पक्ष में पर्याप्यत मत जुटा कर सत्ता में भागीदारी की पेशकश कर सकता है। अन्यथा बहुत सारे शोषित समाज के लोगों के सामने नक्सलवाद का रास्ता अपनाने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता। इसलिए भारत में बहुदलीय व्यवस्था की आवश्यक्ता है।
इधर यह देखा जा रहा है कि विधायिका पर विशेषज्ञों व विदेशी संस्थाओं का प्रभाव भारी पड़ रहा है। बहुत सारे महत्वपूर्ण आर्थिक नीतियों सम्बन्धित निर्णय संसद में नहीं लिए जा रहे हैं। यही हाल विदेश, ऊर्जा नीति, यातायात नीति, आदि, का है। यह बात देश की संप्रभुता के लिए चिंताजनक है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का हित ही सर्वोपरि होना चाहिए एवं सभी निर्णय जनता की आवश्यक्ताओं को ध्यान में रख कर लिए जाने चाहिए। आदर्श स्थिति तो यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी भी हो।
 
 
 
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