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बागियों को शह देते मुलायम गैर भाजपावाद की नई पहल दम तोड़ रही है नैनी झील अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम
दुख हुआ,पर अचंभा नहीं

मृणाल पांडेय 
वर्ष 2011 के खात्मे तक यह बात कि भारतीय लोकतंत्र पुरखों से हमें विरासत में मिली कोई सुनिर्मित-स्थायी इमारत नहीं, बल्कि निरंतर निर्माणाधीन इकाई है, देश को बखूबी समझ में आ गई है।
लोकतंत्र की मजबूती बनी रहे, इसके लिए बदलती परिस्थितियों में इसके मूल नक्शे में कौन-सा बदलाव जरूरी है, कहां इसमें ‘लोचा’ लग रहा है, किधर पुराने पाइप बदलने होंगे और खराब निर्माण सामग्री से निर्मित किस खंड को तोड़कर नई तरह सिरजना पड़ेगा, इन सब पर लगातार निगाह रखना जरूरी है। पर यह विलक्षण वर्ष जाते-जाते यह भी हमको बता गया कि लोकतंत्र के मूल नक्शे में सोच-विचारकर बदलाव करना ही श्रेयस्कर होगा। जल्दी का काम शैतान का होता है।
अट्ठाइस दिसंबर को असामान्य दबाव और तनाव के वातावरण में एक अविकसित अवयवों वाले, सतवांसे लोकपाल बिल के प्रारूप का लोकसभा में जबरन जन्म करवाया गया। उसे महज एक दिन बाद राज्यसभा में अंतिम हिचकी लेते देख दुख भले ही कइयों को हुआ हो, पर अचंभा नहीं।
यह सही है कि देश की आबादी में एक नई पीढ़ी की तादाद बढ़ती जा रही है और भारी तादाद में कश्मीर से कन्याकुमारी तक ‘साड्डा हक एत्थे रख’ चिल्लाते युवा आंदोलनकारी लगातार जिद्दी और लड़ाकू बन रहे हैं, पर उतना ही सही यह भी है कि 2011 में बदलाव को उतावले आंदोलनकारियों के हाथों में जाकर राजनीतिक प्रतिरोध के अनेक स्वतंत्रता संग्रामकालीन हथियार भोंथरे हो गए हैं। उधर समयबद्ध मांग के लिए अल्टीमेटम दे रहे आंदोलनकारियों के नेताओं की मांगों से संविधान का सही तालमेल बिठा सकने वाली प्रशासकीय मशीनरी भी जरूरत के वक्त भीतर से खतरनाक तौर से पोली साबित हुई।
लिहाजा लोकपाल का वैताल राज्यसभा में जा लटका और संसद अनिश्चितकाल तक स्थगित हो गई। अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों पर इसके संभावित असर को लेकर सभी में एक असहज प्रतीक्षा का भाव है। फ्लोर मैनेजमेंट की विफलता से सत्तापक्ष और आंदोलन की काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ सकती, यह बात हठात् स्पष्ट हो जाने के बाद बातूनी आंदोलनी जत्थे दोनों मौन और स्तब्ध हैं। पर यह खामोशी अल्पकालिक है। यह दशा कुछ-कुछ 1975 की याद दिलाती है। तब भी (नवनिर्माण आंदोलन के दौरान) मतदाताओं को पुरजोर लफ्जों में कहा गया था कि बांझ वायदा करते आ रहे एकाधिकारवादी नेता को शासन से बाहर कर वे जनआंदोलन से उठे सर्वहारा वर्ग के सच्चे और युवा हितैषियों को सत्ता सौंपें, जो सामूहिक विमर्श द्वारा गरीबी, बेरोजगारी और अन्याय को जड़ से मिटाएंगे, पर सत्ता बदल के बाद पीढ़ियों और निजी अहं के टकरावों से बार-बार तापमान चरम पर पहुंचने लगा तो नया सामूहिक नेतृत्व भी यकायक वृद्धाश्रित और एकचालकानुवर्ती बन गया। यह मान लिया गया कि बीमार होते हुए भी सत्ताविरोधी आंदोलन के राजनीतिनिरपेक्ष अगुआ वयोवृद्ध नेता के पास हर तरह के वैचारिक मनमुटाव खत्म कर सर्वमान्य हल खोजने की कोई चमत्कारी ताकत है। लोकपाल बिल को लेकर संसद में घटे घटनाक्रम ने इस साल फिर याद कराया है कि यदि चमत्कारी माने गए नेता का जादू नाकाम हो जाए तो शासक हटाओ संपूर्ण क्रांति लाओ का सिनिकल खेल कैसे क्षुद्र और मोहभंगकारक बिंदुओं पर सिमटने लगता है। त्याग और वीतरागिता का आदर करने वालों के देश में अन्ना व जेपी दोनों के प्रति जनता में सहज आकर्षण और गहरा आदर भाव उपजा, पर स्मरणीय है कि लोकपाल आंदोलन की अगुआई से पहले अन्ना की गतिविधियां सराहनीय होते हुए भी राष्ट्रीय नजरिए से 1973 तक जेपी की उपलब्धियों की तरह ही सीमित थीं।
अलबत्ता सक्रिय राजनीति में उतरे समवयसी नेताओं की चादर पर जो कीचड़-मिट्टी चिपक गई थी, वह इनकी चादरों पर नहीं लगी थी। नियति कहिए या संयोग, सत्तर के पार दोनों एकाकी वृद्ध यकायक दिल्ली को हिलाने वाले विराट युवा आंदोलनों के सूत्रधार बन गए। पर आज तटस्थता से सोचने पर लगता है कि प्रसिद्धि के चरम क्षणों में भी अपने महत्वाकांक्षी सहायकों के लिए जेपी या अन्ना एक कारगर राजनीतिक औजार थे। उनकी जयकार कर रहे सहयोगियों का लक्ष्य एक साफ-सुथरे संत की छवि की मदद से मतदाताओं को लामबंद कर सत्तारूढ़ कांग्रेस और कांग्रेस से भी उसके शिखर नेता को हटाकर नवनिर्माण के नाम पर विकेंद्रित शासन लाने का था।
संत की ओट में राजनीतिक दांव चलने का नुकसान यह हुआ कि अपने शिखर नेतृत्व पर जुनूनी किस्म की आस्था रखती आई कांग्रेस की निगाह में विरोधी पक्ष के नेता का अकृत्रिम आदर्शवाद, उनकी लोकप्रियता और उनके उठाए तमाम जरूरी सवाल भी अप्रासंगिक बन गए। प्रासंगिक बस इतना ही बन गया कि वे उनके हाईकमान और अंतत: उनको समूल उखाड़ने पर आमादा ताकतों के प्रतिनिधि हैं। लिहाजा आंदोलन के लीडरों से ही नहीं, सहयोगी दलों से भी शिखर नेतृत्व का सार्थक संवाद करवाने की कोई पहल समय रहते नहीं की गई और नाराज मतदाता नारेबाजियों के भुलावों के बीच भटकता रहा।
लोकपाल पर बहस के दौरान क्षेत्रीय क्षत्रपों की तरफ से लोकायुक्त की नियुक्ति के प्रसंग में राज्यों की स्वायत्तता पर खूब गहमागहमी हुई। पर बहस से जाहिर हुआ कि असहमतों की असल चिंता लोकतांत्रिक स्वायत्तता से उतनी नहीं, जितनी केंद्र चयनित लोकायुक्त की नियुक्ति से एक हाईकमान के अनुचर क्षेत्रीय दलों की ताकत पर लग (या लगाए जा) सकने वाले विराम की संभावना से उपजी थी।
यह निर्विवाद है कि कमोबेश हर राज्य में क्षेत्रीय क्षत्रपों की अकूत ताकत का आधार जातिजनित धनबल व भुजबल रहा है। इनको बनाए रखने को अगर राज्यों द्वारा केंद्र की समन्वयवादी शक्ति को अदूरदर्शी चुनौती दी जाने लगे तो राष्ट्रीय स्थिरता की दृष्टि से यह स्थिति खतरनाक है। बिल का विरोध कराने वाले ममता, माया, मुलायम या बादलादि खुद क्या अपने राज्य में भीतरखाने दलगत लोकतांत्रिकता या विधानसभा में विपक्ष से तालमेल का कोई सार्थक समांतर खाका पेश करते रहे हैं? जवाब होगा, नहीं। अत: चोटिल होकर दांत पीसती पैविलियन लौटी टीम अन्ना के प्रतिशोध के मंसूबों और क्षेत्रीय नेताओं के मुंहलगे बाहुबलियों की लोकतंत्र में बेलगाम अनास्था की पृष्ठभूमि में लोकपाल के राष्ट्रीय स्वरूप के लिए तुरत कोई नई और सार्थक पहल निकल सकेगी, इसमें संशय है। -लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।  

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