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अंग्रेजी का साहित्यिक उपनिवेश
शंभुनाथ 
 साहित्य से भी बड़ा साहित्य उत्सव है, यह जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने साबित किया। इस पर आश्चर्य हो सकता है कि जिस साहित्य के सामाजिक विस्थापन का लोग रोना लेकर बैठ जाते हैं, इस उत्सव में उसका कितना हल्ला मचा, देश-विदेश के लेखकों को देखने-सुनने के लिए कितनी भीड़ें उमड़ीं, और पांच दिनों में देखते-देखते करोड़ों की किताबें बिक गर्इं। जयपुर साहित्य उत्सव एक नए ट्रेंड की सूचना है। अब देश भर में इसके छोटे-छोटे प्रतिबिंब बन रहे हैं। इसलिए इसे अच्छी तरह समझने की जरूरत है।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्यकार ही नहीं, फिल्मी हस्तियों, मंत्रियों, अमेरिका-इंग्लैंड से आए मीडिया के लोगों, हजारों विद्यार्थियों-नौजवानों और निश्चय ही प्रकाशकों का भी एक बड़ा जमावड़ा था। सेलिब्रिटी बने हुए कुछ लेखक आदि दुर्लभ दृश्य थे तो काफी लेखक दर्शक थे। उत्सव में अमेरिका की खरबपति आकर्षक महिला विनफ्रे भी आर्इं। शहर के होटलों के तीन हजार कमरे बुक थे। गुलाबी शहर में अनगिनत लेखक गुलाबी गुलाबी। मेरे जैसे दूरदर्शकों को पहली बार यह लगा, यह साहित्य का तूफान है। कुछ सालों में ही यह चीज इतनी अधिक बढ़ गई। इतना तामझाम, इतना प्रचार और सबकुछ एक बड़े सांस्कृतिक विस्फोट-सा और इन सब पर अंग्रेजी की एक विराट रेशमी चादर। इस माहौल में होना एक बौद्धिक स्टेटस का मामला बन गया। जयपुर साहित्य उत्सव ऐसी घटना है, जो कई बार आशा से अधिक भय पैदा करती है।
इस साहित्य उत्सव में भारतीय भाषाओं के इने-गिने लेखक आमंत्रित थे। इनकी न कोई आवाज थी और न ये मुख्य दृश्य में थे। इनकी सिर्फ औकात दिखाई जा रही थी। चारों तरफ अंग्रेजी का दबदबा था। मुझे नहीं पता हिंदी के दिल्ली में रहने वाले जो लेखक जयपुर उत्सव में गए थे, वे इसमें भारतीय भाषाओं की पददलित स्थिति देख कर कितनी शर्म महसूस कर रहे थे। इसमें संदेह नहीं कि भारतीय भाषाओं के लेखकों का आम अनुभव यही होगा कि यह उत्सव अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों बल्कि अंग्रेजी में लिखने वाले गैर-पश्चिमी मूल के लेखकों को प्रमोट करने के लिए है। यह निश्चय ही सबसे अधिक भारत में अंग्रेजी का साहित्यिक उपनिवेश बनाने का मामला है।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की कारीगरी अभूतपूर्व है। इसके पीछे विभिन्न स्रोतों से पैसे का अपार बल तो है ही। विदेशी लेखकों और साहित्य प्रेमियों को सबसे अधिक मुग्ध करने वाली बात है दो सौ चालीस साल पुराने डिग्गी पैलेस के विराट हरे-भरे बहुमूल्य परिसर में इस उत्सव का आयोजन। इस पैलेस में भारत की राजछवि है, एक इतिहास है। इसके साथ ही उत्सव है साहित्यिक सत्रों के बाद लोकशिल्पियों का प्रदर्शन, ताकि राजछवि और लोकछवि के बीच साहित्यिक अड््डा, तमाशा और मस्ती जम उठे। 
1857 पर लिखने वाले ‘द लॉस्ट मुगल’ के लेखक डेलरिंपल और इस उत्सव के संयोजक (प्रोड्यूसर) संजय रॉय दोनों मुख्यत: रहते दिल्ली में हैं, पर उन्होंने साहित्य उत्सव के लिए चुना जयपुर शहर को। इसके निहितार्थ अस्पष्ट नहीं हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल मुख्य रूप से इतिहास, लोकसंस्कृति और साहित्य को नव-औपनिवेशक खेल में बदलने का एक आनंद भरा अभियान है।
समझना मुश्किल नहीं है कि इस फेस्टिवल में गुलजार, जावेद अख्तर और प्रसून जोशी जैसे व्यावसायिक गीतकार ही बड़े कवि का दृश्य क्यों बनाते हैं। फेस्टिवल में कपिल सिब्बल भी बड़े कवि हैं। वे पिछले साल भी आमंत्रित थे, इस बार भी। इस बार तो अशोक वाजपेयी ने उनसे वार्ता की जुगलबंदी की। ऐश्वर्या-अभिषेक की संतान को मुंबई में देखते हुए, मथुरा के ट्रैफिक से टकरा कर, स्लम और ताजमहल दोनों का मजा लेते हुए धनाढ्य अमेरिकी लेडी विनफ्रे चमकते-दमकते जयपुर फेस्टिवल पहुंचीं। आखिरकार उन्हें किस हैसियत से आमंत्रित किया गया था? अब अस्पष्ट नहीं है कि इस फेस्टिवल के लिए आमंत्रण नीति के पीछे कुछ सोची समझी निश्चित योजनाएं हैं। 
कई बार जयपुर फेस्टिवल को डीएससी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के रूप में याद किया जाता है। डीएससी सड़क और पुल बनाने वाली एक बड़ी कंपनी है। इसमें साहित्य-प्रेम कैसे जगा, पता नहीं। इसने पिछले साल से दक्षिण एशियाई साहित्य के लिए पचास हजार डॉलर का डीएससी प्राइज शुरू किया है, जो इस साल भी दिया गया। यह अब भारत से दिया जाने वाला सबसे बड़ी राशि का पुरस्कार है। यह भीतर से लगभग पूर्व निर्धारित है कि पुरस्कार उपन्यास के लिए दिया जाएगा और वह भी अंग्रेजी में लिखे गए गैर-पश्चिमी लेखक के उपन्यास के लिए। यह एशिया में अंग्रेजी के ताज में एक और कोहिनूर है। दरअसल, तीन साल पहले सलमान रुश्दी ने इसी फेस्टिवल में बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि अंग्रेजी में लिखा गया भारतीय साहित्य ही भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है, पश्चिम में इसी की स्वीकृति है। ‘वर्नाकुलर’ में लिखा साहित्य महत्त्वहीन है, यह बात जयपुर
 
 जनसत्ता 
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