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चिंता के केंद्र से बाहर हैं बच्चे

 संजय द्विवेदी

जिस देश में प्राथमिक शिक्षा का ढांचा लगभग ध्वस्त हो चुका हो, बाल मजदूरों की तादाद रोजाना बढ़ रही हो, वहां ‘बाल साहित्य’ पर चिंताएं कुछ आगे की बात लगती हैं। लेकिन चिंता इसलिए भी जरूरी है कि नई पीढ़ी के सामने जो भले साधन सम्पन्न हो- संस्कार का, नैतिक शिक्षा का संकट सामने है। स्कूल शिक्षा एवं सामाजिक स्थितियां बेहतर मनुष्य के निर्माण में खुद को नाकाम पा रही हैं। जाहिर हैं सद्साहित्य इस टूटन में सीमेंट का काम कर सकता है। देश की और उसेक नेतृत्व की चिंताओं में दरअसल बच्चे हैं ही नहीं। शायद इसका कारण यह भी हो कि वे मतदाता नहीं है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री के बाद राजनीति के शीर्ष कर किसी ऐसे व्यक्ति का आगमन प्रतीक्षित है। जिसकी चिंताओं में बच्चे और उनके व्यक्तित्व निर्माण के सवाल भी हों ।
     बड़ी संख्या में बाल साहित्य का सृजन एवं प्रकाशन हो रहा है। तमाम साहित्यकार हैं, जो निष्ठा एवं प्रमाणिकता से बच्चों के लिए लिख रहे हैं, लेकिन मुख्यधारा के साहित्य की तरह उनकी कृतियां भी कमीशन और दलाली की संस्कृति के चक्र में फंसकर आम बच्चों तक नहीं पहुंच पाती । सरकारी खरीद एवं पुस्तकालय खरीद तंत्र ने समूचे प्रकाशन जगत को भ्रष्ट एवं काहिल बना दिया है। फलतः बाल साहित्य की किताबें इतनी महंगी हैं कि बच्चा उन्हें खरीदना तो दूर छू भी नही सकता है, सो महंगी किताबें कौन खरीदेगा ? अभिभावकों की चिंता में सिर्फ अपने बालक के स्कूली परीक्षा में मिलने वाले ‘मार्क्स’ हैं, जो आगे की पढ़ाई या बड़ी कक्षा में प्रवेश में उसके सहायक बनेंगे। बाकी बचा समय ‘टेलीविजन’ के चैनलों की लंबी श्रृंखला निगल जाती है। व्यस्तता की इस दिनचर्या में शब्दों का महत्व गिरा है । जिंदगी में उनके लिए ‘स्पेस’ घटा है।
     बच्चों के लिए आज कई पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं, लेकिन वे शहरी मध्यवर्ग के कुछ परिवारों तक ही पहुंच पाती हैं । बाल साहित्य को लेकर एक चलताऊ और खानापूरी करने का भाव प्रायः पत्रकारिता क्षेत्र में भी व्याप्त है। इसलिए प्रायः हर समाचार पत्र बच्चों के लिए पूर्ण पृष्ठ या विशेष पत्रिकाएं छापता है, किंतु उसमें बच्चों के मन की, उनकी रुचि की कितनी सामग्री होती है, इसका आकलन होना भी शेष है । साहित्य क्षेत्र में भी बाल साहित्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता । बच्चों के लिए लिखने वाले बाल साहित्यकारों को उपेक्षा के भाव से देखा जाता है। साहित्य की चर्चा, आलोचना एवं समीक्षा में भी बाल साहित्य को अहमियत नहीं दी जाती । बडे़ साहित्यकारों प्रायः बच्चों के लिए साहित्य लेखन से बचते हैं । स्वयं साहित्य के गलियारों में बच्चों में लिए लेखन पर यह उपेक्षा भाव चकित करता है। बाल साहित्य के लिए शासकीय स्तर पर कोई बड़ा पुरस्कार नहीं है, न ही शासकीय अकादमियां बाल साहित्य के संदर्भों पर कोई आयोजन करती नजर आती है।
    इस सबके बावजूद हिंदी बाल साहित्यकारों की एक लंबी परंपरा ने अपने सतत लेखन से इस क्षेत्र को समृद्ध किया है, जिनमें डॉ. हरिकृष्ण देवसरे,  डॉ. श्री प्रसाद, मस्तराम कपूर, हरीश निगम, अनंत कुशवाहा, मनोहर वर्मा, भगवती प्रसाद द्विवेदी, डॉ. राष्ट्रबंधु, शिवचरण चौहान, राजा चौरसिया, डॉ. नारायण लाल परमार, शुकदेव प्रसाद, सूर्यकुमार पाण्डेय, रमेंश तेलंग, सूर्यभान, गुप्त,डॉ. शोभनाथ शशि, जगदीश चंद्र शर्मा, राजनारायण चौधरी, जहीर कुरेशी, सुरेंद्र विक्रम, शिवनारायण सिंह, तारादत्त निर्विरोध, शंभूलाल शर्मा वसंत, जयप्रकाश मानस, गिरीश पंकज, इंदरमन साहू, बाबूलाल शर्मा ‘प्रेम’, सुखबीर, रामनारायण उपाध्याय, अहद प्रकाश, क्षमा शर्मा आदि बाल साहित्यकारों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। संपादक के रूप में अपने संपादन में प्रकाशित बाल पत्रिकाओं के माध्यम से ने रचनाकारों को सामने लाने वालों में स्व. र्स्वेश्वर दयाल सक्सेना, लक्ष्मीचंद जैन, जयप्रकाश भारती, अनंत कुशवाहा, विश्वानाथ, हरिकृष्ण देवसरे, कन्हैयालाल नंदन, मनोहर वर्मा डॉ. राष्ट्रबंधु के नाम लिए जा सकते हैं।
    बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में डॉ. जयप्रकाश भारती, सुरेंद्र विक्रम, ऊषादेवी सिंह, डॉ. श्री प्रसाद एवं डॉ राष्ट्रबंधु ने उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। कुल मिलाकर बाल साहित्य की स्थिति प्रचार-प्रसार के स्तर पर भले ही दयनीय हो, लेखन के स्तर पर संतोषजनक है। जाहिर है जब तक बच्चे हमारी चिंताओं के केंद्र में न होंगे, उनके व्यक्ति संवर्धन से जुड़ा हर पक्ष चाहे वह शिक्षा, मनोरंजन, फिल्म या साहित्य कुछ भी हो, उपेक्षा का शिकार होगा। अभिभावकों एवं समाज के प्रबुद्ध वर्गों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी चिंताओं के केंद्र में बच्चों को शामिल करें। सिर्फ उनके स्कूली पाठ्यक्रम या कैरियर का नहीं वरन एक मनुष्य के नाते उनके नैतिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक पक्षों का भी विकास जरूरी है। श्रेष्ठ बाल साहित्य की उपलब्धता एवं शिक्षा भावी पीढ़ी को ज्यादा बेहतर, ज्यादा संवेदनशील, ज्यादा मानवीय बनाएगी।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में रीडर हैं।)
 
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