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महत्वाकांक्षाओं को कतर दिया

एमजे अकबर 

एक ऐसे राजनीतिज्ञ के सामने चिरौरी करना श्रीमती सोनिया गांधी के लिए थोड़ा कष्टप्रद तो होगा ही, जिसने 1997 में कांग्रेस गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने संबंधी उनके व्यक्तिगत प्रयास की हवा निकाल दी थी और फिर 2012 में उनके पुत्र राहुल की महत्वाकांक्षाओं को कतर दिया। 
परंतु राजनीतिक दिल गर्म और ठंडे, दोनों तरह के खून को पंप करता है। जब इस हाथ दे, उस हाथ ले का कारोबार होना होता है, तो सर्वश्रेष्ठ राजनेता भावनाओं को अटारी में रख छोड़ते हैं। श्रीमती गांधी एक अच्छी नेता हैं और मुलायम सिंह यादव के साथ उनके समीकरणों में स्मृति की अब कोई जगह नहीं रह गई है। वे जुलाई में राष्ट्रपति भवन के लिए होने वाले चुनावों में उनके समर्थन के बगैर जीत नहीं पा सकतीं। 
मुलायम सिंह ने श्रीमती गांधी की राह में आड़े आने की कड़वी कीमत चुकाई है। उनकी पार्टी 2004 से लगातार यूपीए सरकार का समर्थन कर रही है, पर उसे सत्ता में किसी भागीदारी की अनुमति नहीं रही है। वे रस्मी रात्रिभोजों में अपमानित हुए हैं। उन्हें जो भी ठेस पहुंची रही हो, उसे किनारे कर उन्होंने 2008 में लोकसभा में भारत-अमेरिका नाभिकीय करार का समर्थन किया और मध्यावधि आम चुनावों को रोक लिया। उस समय उन्हें समुचित इनाम मिलने की काफी चर्चाएं थीं, संभवत: रक्षा मंत्री का पद। 
लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। 2009 के बाद कांग्रेस को उनके समर्थन की ज्यादा जरूरत नहीं रह गई थी, इसलिए किसी भी तरह के प्रतिदान का कोई खास सवाल भी नहीं उठता था। लेकिन इस साल उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में उनकी जबरदस्त जीत के बाद, उनकी मदद एक बार फिर कांग्रेस के टिके रहने के लिए बेहद अहम हो गई है। यदि राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी नहीं जीत पाता, तो साख के लिए दिल्ली की यूपीए सरकार का आखिरी दावा भी बेकार चला जाएगा। 
कांग्रेस के लिए सबसे अच्छा सौदा यह होगा कि वह एक आईओयू, यानी वचनपत्र के बदले मुलायम के वोट हासिल करे। चूंकि भारतीय राजनीति में गोपनीयता एक अनजानी चीज है, लखनऊ में इस बात की भिनभिनाहट होने लगी है कि कांग्रेस ने आज के समर्थन के बदले मुलायम सिंह यादव को कल उपराष्ट्रपति पद देने की पेशकश की है। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार उपराष्ट्रपति चुनाव अगस्त में होना है। 
शुरुआत में यह चर्चा थी कि एके एंटनी राष्ट्रपति के तौर पर पदोन्नत होंगे और मुलायम सिंह को वह पद दिया जाएगा। लेकिन सेना प्रमुख वीके सिंह के साथ आनन-फानन में हुई तकरार के बाद एंटनी की संतनुमा छवि में लगे धब्बों के चलते यह संभावना धूमिल हो गई है। 
यह और कुछ नहीं तो कशाकशी और बखेड़े के समय पारे में नजर आने वाले बदलावों को दर्शाता है। आप आने वाले कल पर तभी भरोसा कर सकते हैं, जब आप इस बारे में समुचित रूप से सुनिश्चित हों कि यह कल क्या लाने वाला है। लेकिन ऐसे समय में, जब हालात बलखाती लहरों पर नौका की तरह झटके खा रहे हों, देने और लेने का काम एक ही साथ होना चाहिए। अजित सिंह, जो अभी नागरिक उड्डयन मंत्री हैं, उत्तरप्रदेश में चुनावी सौदा करने से पहले अपने पदारोहण पर जोर देने के मामले में काफी सयाने साबित हुए। यदि वे चुनावी नतीजों के लिए रुकते, तो अभी भी इंतजार ही कर रहे होते। 
मुलायम और कांग्रेस के बीच दिक्कत भरोसे की कमी की है। ज्यादा स्पष्ट करें, तो मुलायम, कांग्रेस पर भरोसा नहीं करते और यही अकेली राजनीतिक विवशता है, जो उन्हें यूपीए में पूरी तरह शामिल होने से रोकती है। उनका समर्थक आधार उन्हें भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए से जुड़ने की इजाजत नहीं देगा और तीसरे मोर्चे में वाम दलों के साथ गठबंधन का कोई खास अर्थ नहीं है। 
राष्ट्रीय स्तर पर यह कोई विशेष घनीभूत नहीं होगा और वामदलों के पास उत्तरप्रदेश में देने को भी कुछ नहीं है। यह कांग्रेस का गुमान है कि मुलायम के पास कोई और रास्ता ही नहीं है और यह भी कि वे भले ही भुलावे और चक्कर में हों, लेकिन यूपीए और एनडीए के बीच अनिर्णय की किसी भी स्थिति में उनके पास कांग्रेस के पीछे कतार में खड़े होने के अलावा कोई खास विकल्प नहीं है। 
यह एक भूल है। बंद गली लगने वाली जगह निकलने की राह खोजते किसी दक्ष ड्राइवर से कोई रचनात्मक समाधान निकलवा सकती है। यहां तमाम तरह के भटकाव हैं, जो वैकल्पिक राहें खोलते हैं। मिसाल के लिए, मुलायम एक सामान्य, लेकिन उत्कृष्ट तर्कसंगत शर्त रख सकते हैं : यदि कांग्रेस उनका समर्थन चाहती है, तो उसे प्रत्याशी के मामले में उनसे सलाह-मशविरा करना होगा। पांच साल पहले, श्रीमती सोनिया गांधी ने आखिरी क्षणों में गूढ़ टोपी से अनजाना खरगोश निकाला था।
एक ज्यादा आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस अपने सबसे ज्यादा सुस्पष्ट और योग्य उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी पर भरोसा करती नहीं लगती। सबकुछ प्रणब मुखर्जी के पक्ष में है, सिवाय उनकी पार्टी के समर्थन के। यह एक असाधारण सेवाकाल के लिए एकदम उपयुक्त चरमोत्कर्ष होगा। उनका व्यक्तित्व और संसद व देश में उन्हें मिलने वाला मान-सम्मान उनकी आसान विजय सुनिश्चित करेगा। उनका निर्वाचन यूपीए को स्थायित्व देगा, जब तक कि वह खुद ही अस्थिरता की नौबत न ले आए। ममता बनर्जी, जिनके गठबंधन को कभी भी सही-सही नहीं समझा जा सकता, इस पीढ़ी के सबसे प्रतिष्ठित और विलक्षण बंगाली के नाम पर शायद ही आपत्ति करें। 
मुलायम सरीखे निष्ठावान भी मुखर्जी के साथ वैसे सहज होंगे, जैसे वे कहीं कम कद वालों के साथ कभी नहीं हो सकेंगे। लेकिन लगता है, कांग्रेस इस बात में विश्वास करती है कि मुखर्जी को हमेशा भोजन पकाने का प्रभारी होना चाहिए, पर अहम मेज पर जगह नहीं दी जानी चाहिए। वैसे, एक दूसरे नामी उम्मीदवार, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी हैं, लेकिन इस पक्षपाती दौर में उनके लिए नुकसानदायक यह है कि वे किसी पार्टी से नहीं जुड़े हैं। 
मुलायम सिंह यादव राष्ट्रपति पद के दांव में प्रणब मुखर्जी के नाम का प्रस्ताव कर और फिर कांग्रेस को इसे खारिज करने की चुनौती देकर कुछ पाने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में बहस पर्दो को पार कर सार्वजनिक हो जाएगी। और यह सही वक्त भी होगा। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर 
हैं।
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