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अगर प्रेमचंद हिंदू थे
कमल किशोर गोयनका 
 असल में मैंने लेख का शीर्षक दिया था- ‘नामवर सिंह का आलोचना विवेक’, लेकिन वह प्रकाशित हुआ ‘अगर प्रेमचंद हिंदू थे’ शीर्षक से। मेरा लक्ष्य था, नामवर सिंह के आलोचना-कर्म की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना, पर वह प्रेमचंद के हिंदू होने न होने की बहस में खिसक गया। नामवर सिंह ने एक आलोचक के रूप में मुझ पर जो आरोप लगाए थे, मैंने एक शोधकर्ता-आलोचक की हैसियत से उनका उत्तर दिया था और इसी कारण मैं उन्हीं मुद्दों तक सीमित रहा, जो नामवर सिंह ने उठाए थे। मैं समझता हूं, इस बहस का जो दायरा है, हमें उसी में रह कर आरोपों और उनके स्पष्टीकरण तक रहना चाहिए, अन्यथा यह बहस मूल लक्ष्य से भटक जाएगी।
वीरेंद्र यादव ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है कि नामवर सिंह इन दिनों अपनी वक्तृता में विचलन और उन्मुक्तता से ग्रस्त हो गए हैं, यानी एक आलोचक के रूप में वे इस पर अनर्गल बातें करते रहते हैं। यादव ने साप्ताहिक पत्रिका ‘शुक्रवार’ में भी नामवर सिंह के एक दलित-विरोधी वक्तव्य की चर्चा की है, लेकिन वे इसके लिए कोई कटु आलोचना करने का साहस नहीं कर पाए हैं। यानी ऐसी विचलनपूर्ण, अनर्गल और असत्य बातों के बावजूद नामवर सिंह प्रगतिशील लेखकों के नेता हैं। 
यादव ने यह स्वीकार किया है कि गोयनका ने ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ पुस्तक उपलब्ध करा कर हिंदी साहित्य की सराहनीय सेवा की है, लेकिन वे प्रेमचंद को हिंदू बनाने के तथाकथित अपराध के लिए नामवर सिंह के समान मुझे दोषी ठहराते हैं। यह कैसी प्रगतिशील आलोचना है, जो एक भी प्रमाण दिए बिना किसी को भी दोषी बना देती है? नामवर सिंह और वीरेंद्र यादव में से किसी ने भी एक भी प्रमाण ऐसा नहीं दिया, जिससे यह सिद्ध हो कि मैंने अहिंदू प्रेमचंद को हिंदू बना दिया है। यह उनकी अज्ञानता, असमर्थता और प्रगतिशील खीज का परिणाम है। वीरेंद्र यादव ने तो अपनी प्रतिक्रिया में उन तथ्यों-प्रमाणों की भी उपेक्षा की है, जो मैंने अपने लेख में प्रेमचंद की हिंदू चेतना के संबंध में दिए थे। वे उनके सत्यासत्य की परीक्षा किए बिना उन्हें अपने सोच से ही गायब कर देते हैं। 
उन्होंने प्रेमचंद के हिंदू-विरोधी विचारों के प्रमाण में वर्णाश्रम व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, देवी-देवता और गाय के प्रसंगों को उठा कर यह सिद्ध करना चाहा है कि वे हिंदू धर्म का विखंडन और उसे ध्वस्त करना चाहते थे। वीरेंद्र यादव ने अगर मेरे लेख को गंभीरता से पढ़ा होता तो देखा होता कि मैंने लिखा था, प्रेमचंद हिंदू समाज को अपने ‘आलोचनात्मक विवेक’ से देखते-परखते हैं। अज्ञेय ने जिस आलोचनात्मक राष्ट्र की कल्पना की थी, प्रेमचंद तो उसी आलोचनात्मक दृष्टि से पूरे देश को देख रहे थे। प्रेमचंद ने परिभाषा ही यही दी थी कि साहित्य जीवन की आलोचना है। इसलिए प्रेमचंद जब हिंदू समाज का चित्रण करते हैं तो उसके धर्म, संस्कृति, समाज, अर्थ, राजनीति, रहन-सहन आदि सभी की अपने आलोचनात्मक विवेक से परीक्षा करते और उसके पाखंड, विभेद, विषमता, अंधविश्वास, कुप्रथा, रुढ़ि आदि की अमानवीयता को उद्घाटित करते चलते और उसकी भर्त्सना करते हैं। हिंदू धर्म-समाज का यह पक्ष उन्हें अस्वीकार है, पर यही तो हिंदू धर्म नहीं है। 
ये ऐसी विकृतियां हैं जो सैकड़ों वर्षों से हिंदू समाज के पतन का कारण बनी हैं, लेकिन हिंदू राष्ट्रनायकों ने इनकी भर्त्सना की है। वीरेंद्र यादव स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद को एक बार पढ़ लें तो वे पाएंगे प्रेमचंद को हिंदू समाज के इन पक्षों की आलोचना की शक्ति रूसी क्रांति, आंबेडकर से नहीं स्वामी विवेकानंद और दयानंद से मिली थी। स्वामी विवेकानंद को हिंदू होने पर गर्व था, लेकिन उन्होंने ब्राह्मणवाद, पुरोहितवाद, छुआछूतआदि की जैसी तीव्र और कटु भर्त्सना की है, वह तो गांधी और प्रेमचंद में भी दिखाई नहीं देती, पर यही हिंदू धर्म नहीं है। हिंदू समाज में जीवन का एक उदात्त रूप है, मानवीय रूप है, जो ग्रहणशील है और जो जीवन का अंग है। 
यादव को प्रेमचंद के लेख ‘हिंदू सभ्यता और लोकहित’ और ‘श्रीकृष्ण और भावी जगत’ तो देखने ही चाहिए। हिंदू संस्कृति और भारतीय संस्कृति पर उनकी अनेक टिप्पणियां उपलब्ध हैं। वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, राम, कृष्ण आदि के उच्च मानव-मूल्यों को वे अपने साहित्य का अंग बनाते हैं और हिंदू पुराकथाओं, प्रतीकों, बिंबों, त्योहारों, उत्सवों आदि को अपनी कथाओं में स्थान देते हैं। राम पर ‘रामचर्चा’ जीवनी लिखते हैं, कृष्ण-बलराम पर कहानी लिखते हैं। उनका साहित्य पंचानबे प्रतिशत हिंदू समाज पर है, तब उसकी अच्छाई-बुराई हिंदू जीवन की है, क्या इस रूप में देखना अपराध है? ‘गोदान’ की कथा हिंदू किसान की कथा है, इसका नायक सलाउद्दीन बना दें तो उपन्यास खत्म हो जाएगा। मैंने उन्हें हिंदू धर्म का लेखक नहीं कहा है, शायद यादव यही सोच कर दुखी हैं। वे प्रमुखत: हिंदू जीवन के लेखक हैं, लेकिन उन्होंने मुसलिम और ईसाई समाज के चित्र भी खींचे हैं। 
वीरेंद्र यादव ने हिंदुओं के इस्लाम-विरोधी अभियान की भी चर्चा की है और कुछ उदाहरण दिए हैं। उनका मत है कि प्रेमचंद ने इस्लाम-विरोधी अभियान का प्रतिकार किया था। यह सच है, किया था, पर यादव यह क्यों नहीं देखते कि इस्लामिक समाज पर उनकी क्या राय थी। यादव राजेंद्र यादव का संपादकीय (‘हंस’, सितंबर, 2002) और नामवर सिंह का उर्दू जिहाद पर लेख देखें। उन्हें आंबेडकर की   मुसलिम समाज पर की गई टिप्पणियां भी देखनी चाहिए। ‘कर्बला’ के हिंदू लेखक के रूप में मुसलमान उनकी भर्त्सना करते हैं। ‘जिहाद’ कहानी में धर्मांध मुसलमान हिंदुओं का इस्लाम स्वीकार न करने पर गला काट देते हैं। ‘हंस’, मार्च, 1930 में लिखते हैं कि मुसलमान किसी भी प्रश्न को राष्ट्र की दृष्टि से नहीं, मुसलिम दृष्टि से देखता है। उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया और उर्दू सांप्रदायिकता की आलोचना की। 
उन्होंने ‘प्रताप’ (सितंबर, 1924) के लेख ‘हिंदू-मुसलिम प्रश्न’ का उल्लेख किया है, पर उसे अधूरा पढ़ा है। नामवर सिंह कहते हैं, अर्धसत्य झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है (‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’)। प्रेमचंद इसमें लिखते हैं, मुसलमानों में हिंदुओं से ज्यादा गुंडापन है, मुसलमान हिंदू औरतों को भगा ले जाने, जबरदस्ती निकाह पढ़ाने, मजहबी जुलूस पर हमला करने और ऐसे दूसरे हथकंडों में कुशल हैं, लेकिन हिंदुओं में ये नहीं हैं। ‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी पढ़ें, यही कुछ है। वे यह भी कहते हैं कि मुसलमानों की रक्षा के लिए कई देश हैं, हिंदुओं की सभ्यता की रक्षा करने वाली कोई जाति नहीं। प्रेमचंद दोनों समाजों की आलोचना करते हैं और चाहते हैं, स्वराज्य के लिए साथ-साथ चलें। 
यादव ने ‘महाजनी सभ्यता’ लेख की भी चर्चा की है। प्रेमचंद ने कुछ स्थानों पर रूसी क्रांति की प्रशंसा की है, लेकिन अस्वीकृति और आलोचना अधिक है। ‘कैदी’ कहानी पढ़ें, लेनिन के कामरेड धोखा देते हैं और जार के गवर्नर से मिल जाते हैं। ‘महाजनी सभ्यता’ लेख के साथ (‘हंस’, सितंबर, 1936 में) ‘रहस्य’ कहानी छपी है, वह मार्क्सवाद की नहीं, सेवा-त्याग-उत्सर्ग की कहानी है। कथाकार प्रेमचंद की वसीयत लेख होगा या कहानी, यादव बताएं। प्रेमचंद ने लिखा, रूस भी विचार का साम्राज्य चाहता है, स्टालिन-लेनिन हमारे आदर्श नहीं हैं और रूस से मोह-भंग हो गया है। प्रेमचंद को समग्रता में और प्रेमचंद-दृष्टि से उनके पाठ को पढ़ें, तभी उनके साहित्य की भारतीय आत्मा के दर्शन कर पाएंगे। मार्क्सवादी पाठ का अर्धसत्य खतरनाक है। वह प्रेमचंद-मूर्ति के अंग-भंग का काम करता है। आलोचना-विवेक को संकुचित नहीं व्यापक रखें।जनसत्ता  
 
प्रेमचंद का हिंदू होना
 
वीरेंद्र यादव 
 कमल किशोर गोयनका ने ‘अगर प्रेमचंद हिंदू थे’ (25 मार्च) लेख में नामवर सिंह की ‘असाहित्यिक ग्रंथि’ का कम, अपनी ‘हिंदू ग्रंथि’ का खुलासा अधिक किया है। ऐसा वे ‘पांचजन्य’ सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं में जब-तब करते रहे हैं। यह सही है कि नामवर सिंह इन दिनों अपनी वक्तृता में विचलन और उन्मुक्तता से ग्रस्त हो गए हैं, लेकिन यह कह कर उन्होंने कोई चूक नहीं की है कि गोयनका प्रेमचंद को हिंदूवादी रंग में रंग रहे हैं। इसका पर्याप्त प्रमाण कमल किशोर गोयनका ने खुद अपने इसी लेख में दे दिया है। उन्होंने प्रेमचंद के लेखन में प्रयुक्त हिंदू शब्द को ढूंढ़-ढंूढ़ कर बिना संदर्भ को उद्धृत किए, प्रेमचंद के ‘हिंदूपन’ को उजागर करने का विचित्र कारनामा किया है। 
कमल किशोर गोयनका का सवाल है कि प्रेमचंद हिंदू नहीं थे तो क्या थे? सच है कि प्रेमचंद उसी तरह हिंदू परिवार में पैदा हुए थे, जिस तरह बुद्ध, ज्योतिबा फुले, पेरियार, रामास्वामी नायकर, राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर। लेकिन जिस प्रकार ये सभी वर्णाश्रमी हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद के कठोर विरोधी थे, उसी तरह प्रेमचंद भी। यही कारण था कि उन्हें ब्राह्मणवादियों द्वारा ‘घृणा का प्रचारक’ कहा गया। प्रेमचंद ने इसका मुंहतोड़ जवाब ‘घृणा प्रचारक महात्मा बुद्ध’ लिख कर दिया। बुद्ध के ‘सुनक सुत्त’ में ब्राह्मणवादी पाखंड का जो खुलासा किया गया है, उसको उद्धृत करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘‘यह पांच पुराण ब्राह्मण धर्म इस समय कुत्तों में दिखाई देते हैं।’’ (जागरण, 15 जनवरी 1934) 
एक अन्य लेख में हिंदू धर्म के देवी-देवताओं पर कटाक्ष करते हुए प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘‘ईश्वर और देवता भी मजदूरों की श्रेणी से निकल कर महाजनों और राजाओं की श्रेणी में जा पहुंचे, जिनका काम अप्सराओं के साथ विहार करना, स्वर्ग के सुख लूटना और दुखियों पर दया करना था। भारत में तो मजदूर देवताओं का कहीं पता नहीं है। यहां के देवता तो शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करते हैं। कोई फरसा लिए प्राणियों का कत्लेआम करता फिरता है, कोई बैल पर चढ़ा भंग चढ़ाए, भभूत रमाए, ऊल-जलूल बकता नजर आता है। जाहिर है ऐसे ऐशपसंद या सैलानी देवताओं की पुष्टि करने वाले मजदूर नहीं हो सकते। ये देवता तो उस वक्त बने हैं, जब मजदूरों पर धन का प्रभुत्व हो चुका था और जमीन पर कुछ लोग अधिकार जमा कर राजा बन बैठे थे।’’ 
हिंदू धर्म का विखंडन करते हुए प्रेमचंद हिंदू प्रतीकों को ध्वस्त करने में कभी पीछे नहीं रहे, चाहे वह देवी-देवता हों या गो माता। गाय और हिंदू धर्म के शुद्धतावादी आचरण को लेकर प्रेमचंद का मत था कि ‘‘गौ कितनी ही पवित्र हो, लेकिन मनुष्य की तुलना नहीं कर सकती। मुसलमान कितने ही गए-गुजरे हों, फिर भी आदमी हैं। क्या अंधेर है कि हम अपने खाने के बरतनों में कुत्ते को ग्रास खिलाते हैं, लेकिन किसी मुसलमान को पानी पिलाना हो तो कुल्हड़ की तलाश करते हैं। कुत्ते के मुख का स्पर्श मांजने से साफ हो जाता है, लेकिन मुसलमान के मुख का स्पर्श अमिट है! क्या ऐसी स्थिति में भी हम आशा कर सकते हैं कि कोई आत्माभिमानी मुसलमान हमसे भाईचारे का बर्ताव करेगा?’’ (प्रताप, कानपुर, सितंबर, 1924)
प्रेमचंद हिंदुत्व के पैरोकारों के इस्लाम विरोधी अभियान से अत्यंत क्षुब्ध थे। धर्मपाल द्वारा मुसलिम विरोधी पुस्तक ‘विबलता’ लिखे जाने पर उन्होेंने कहा कि ‘‘किसी धर्म विशेष के भूतपूर्व नरपतियों का अब छिद्रान्वेषण करना केवल दो जातियों में द्वेष बढ़ाना है। मेरी राय में ऐसी पुस्तकों को दियासलाई दिखानी चाहिए।’’ (माधुरी, जून 1924) इसी प्रकार पं. कालीचरण शर्मा की पैगंबर मुहम्मद के विरोध में लिखी गई पुस्तक पर प्रेमचंद की टिप्पणी थी कि ‘‘लज्जा और
खेद का विषय है कि कुछ प्रकाशक टके कमाने के फेर में पड़ कर ऐसी गंदी किताबें प्रकाशित कर रहे हैं।’’ (उपरोक्त) इस प्रकार के इस्लाम विरोधी अभियान का प्रतिकार करने के लिए ही प्रेमचंद ने ‘कर्बला’ नाटक लिखा और अपने मंतव्य का खुलासा कुछ यों किया, ‘‘कितने खेद और लज्जा की बात है कि कई शताब्दियों से मुसलमानों के साथ रहने पर भी अभी तक हम लोग प्राय: उसके इतिहास से अनभिज्ञ हैं। हिंदू-मुसलिम वैमनस्य का एक कारण यह भी है कि हम हिंदुओं को मुसलिम महापुरुषों के सच्चरित्रों का ज्ञान नहीं। (कर्बला की भूमिका से, नवंबर 1924)
हिंदू धर्म की विषमतामूलक और भेदभाव से युक्त संरचना को अनावृत्त करते हुए प्रेमचंद ने समता और समानता पर आधारित समाजवादी व्यवस्था की खुले मन से प्रश्ांसा की। लाहौर की एक उर्दू पत्रिका ने जब रूसी क्रांति पर ‘रूस नंबर’ निकाला तो प्रेमचंद ने लिखा कि ‘‘वह कौन-सी ऐसी सामाजिक, राजनीतिक, भावनात्मक दशाएं थीं, जिन्होंने रूस में समष्टिवाद को स्थापित किया? इतने महान परिवर्तन केवल पुस्तकों से नहीं हो जाते।’’ (प्रताप, 7 अप्रैल 1936) उन्होंने अन्यत्र यह भी लिखा कि ‘‘यदि स्वाधीनता का अर्थ यह है कि जनसाधारण को हवादार मकान, पुष्टिकर भोजन, साफ-सुथरे गांव, मनोरंजन और व्यायाम की सुविधाएं, बिजली के पंखे और रोशनी और सस्ते सुलभ न्याय की प्राप्ति हो, तो इस समाज-व्यवस्था में जो स्वाधीनता और आजादी है, वह दुनिया की किसी अन्यतम कहाने वाली जाति को भी सुलभ नहीं। धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ अगर पुरोहितों, पादरियों, मुल्लाओं की मुफ्तखोर जमात के दंभमय उपदेशों और अंधविश्वास जनित रूढ़ियों   का अनुसरण है, तो निस्संदेह वहां इस स्वतंत्रता का अभाव है, पर धर्म स्वातंत्र्य का अर्थ यदि लोक सेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनीयती, शरीर और मन की पवित्रता है, तो इस सभ्यता में धर्माचरण की जो स्वाधीनता है, और किसी देश को उसके दर्शन नहीं हो सकते।’’ (हंस, सितंबर 1936)
उल्लेखनीय है कि तर्क और वैज्ञानिक सोच से ओतप्रोत प्रेमचंद का ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक यह लेख उनकी मृत्यु के चंद दिनों पूर्व ही लिखा गया था। इसके पूर्व मराठी लेखक रा. टिकेकर को दिए गए साक्षात्कार में प्रेमचंद ने साफ कहा था कि ‘‘मैं कम्युनिस्ट हूं... हमारे समाज में जमींदार, साहूकार, यह किसान का शोषण करने वाला समाज बिल्कुल रहेगा ही नहीं।’’ प्रेमचंद का यह साक्षात्कार खुद कमल किशोर गोयनका ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ के पहले खंड में संग्रहीत किया है। मेरे इस लेख में प्रयुक्त प्रेमचंद के सभी उद्धरण गोयनका जी की पुस्तक में शामिल हैं। काश उन्होंने अपनी पुस्तक में प्रेमचंद संबंधी सामग्री को संकलित करने के साथ-साथ उसे पढ़ा भी होता। अगर पढ़ते तो उन्हें प्रेमचंद के मार्क्सवादी रुझान की जड़ें नामवर सिंह की कम्युनिस्ट पार्टी में ढूंढ़ने की जहमत न उठानी पड़ती।
दो राय नहीं कि ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ उपलब्ध करा कर कमल किशोर गोयनका ने हिंदी साहित्य की सराहनीय सेवा की है। इस पुस्तक में संग्रहीत सामग्री स्वयं उनकी अपनी हिंदू ग्रंथि का खुलासा करने के लिए दुर्लभ स्रोत है। गोयनका जी को मलाल है कि नामवर जी आचार्य रामचंद्र शुक्ल क्यों न हुए! अच्छा ही है कि नामवर जी अभी तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल होने से बचे हुए हैं। वरना वे भी शुक्ल जी की तरह लिखते- ‘‘योरप में नीची श्रेणियों में ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार का प्राबल्य हुआ, जिससे लाभ उठा कर ‘लेनिन’ अपने समय में महात्मा बना रहा।... ऊंची-नीची श्रेणियां समाज में बराबर थीं और बराबर रहेंगी। अत: शूद्र शब्द को नीची श्रेणी के मनुष्य का कुल, शील, विद्या, बुद्धि, शक्ति आदि सबमें अत्यंत न्यून का बोधक मानना चाहिए।’’ खतरा यही है कि कहीं नामवर जी आचार्य रामचंद्र शुक्ल न बन जाएं।जनसत्ता  
 
 
 
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