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दिनमान ने भाषा दी है

चंचल 

काफी हाउस में एक बेचैनी है ,पुराने जमाने की बात होती तो हम उसे 'पड़ताल' की टोकरी में डाल कर आगे खिसका देते और जांच कर्ताओं से कहते की इसका जो भी नतीजा हो उसे आम जन के सामने कर दिया जाय ,लेकिन वक्त बदल चुका है .पुराने 'उतरन' लत्ता हो चुके हैं .रमेंद्र जी लाख समझाएं की 'दिनमान' एक पत्रिका थी जिसके हर अंक का इन्तजार अखबार वाले करते थे .लेकिन नीलाक्षी जी नहीं मानेगी.क्यों की उन्होंने उसे देखा ही नहीं तुर्रा यह देखिये की अपनी उम्र एक सौ पच्चीस बता रही हैं  .उग्र जी आज भी उसका मोह नहीं छोड़ पाए हैं ,और संदीप जी हमें उकसा रहें हैं .काफी हाउस में बैठ कर मिठाई खाएं ये लोग और दिनमान खोजूं मै ?
 दिनमान एक पत्रिका थी .इसके पड़ताल पर मत जाइए .यह ज़माना है 'डी कोडिंग' का .इसे यूँ खोलिए .जब बतौर ट्रेनी के मै पहुचा तो अज्ञेय जी जा चुके थे 'नव भारत टाइम्स' के संपादक बन कर .दिनमान के संपादक थे रघुवीर सहाय .पहले दिन मेरे साथ क्क्या हादसा हुआ था इसका जिक्र कर चुका हूँ .धीरे धीरे मै भी दिनमानी हो गया .दस दरियागंज इसका दफ्तर होता था .इस दफ्तर से दिनमान और 'पराग' निकलते थे .दोनों में कमाल का  बेमेल रहा .'पराग के संपादक थे कन्हैया लाल नंदन .धुले धुलाए, इस्तरी किये .सफारी लिबास ,गंभीर मुख मुद्रा विशेष कर अपने स्टाफ के सामने .नंदन जी केबिन में और पूरा स्टाफ एक लंबी टेबल पर दोनों तरफ  लगता था जैसे ये मूर्तिया हों जिन्हें  गोंद से चिपका दिया गया हो .लक्ष्मी चंद गुप्त उप संपादक थे ,वही करता धरता थे .दस बजे ये लोग चिपक जाय और ठीक पांच बजे रवाना हो जायं .'दिनमान इसके कत्तई बर् अक्स .कौन कब आरहा है ,कब जा रहा है ,इसका कोइ हिसाब नहीं .पराग में जितनी खामोसी डिमां में उतना ही शोर गुल ..सर्वेश्वर दयाल सक्सेना.श्याम लाल शर्मा ,प्रयाग शुक्ल ,जवाहर लाल कॉल .शुक्ला रूद्र ,महेश्वर दयाल गंगवार , सुषमा जगमोहन ,योगराज थानी ,नेत्र सिंह रावत ,दोपहर दो बजे तक एक एक कर के लोग जमा होते काम कब करते किसी को किसी ने नहीं देखा .. एक श्याम लाल शर्मा के .सबसे गंभीर मुद्रा में बैठे लिख रहें होते .सर्वेश्वर जी के आते ही यह गंभीर मुद्रा टूट जाती ... सर्वेश्वर जी अंदर आते ही चीखते ..श्याम लाल ...! शर्मा जी अपनी जगह पर बैठे बैठे सिर उठाते और घूर कर सर्वेश्वर जी को देखते ,सर्वेश्वर जी निहायत अदब के साथ बोलते -श्याम लाल ! तिवारी जी को भेजना तो (तिवारी जी दिनमान में चपरासी थे )... श्याम लाल जी अपनी कुर्सी से उठ कर सर्वेश्वर जीके पास आते -सर्वेश्वर ! सुनो तुमको बोलने की भी तमीज नहीं है ? यहाँ से शुरू होता था दिनमान ....दिन भर हंसी मजाक..लेकिन काम गंभीर .उग्र जी ! दिनमान में सबसे पहले पाठकों से आये खतों को तरजीह दी जाती रही है .आज लोंगो को जान कर हैरानी होगी की मंत्रियों और बड़े बड़े लेखकों ,पत्रकारों  का पत्र अगर दिनमान में छ्प गया तो वे अपने आपको धन्य मानते थे . दिनमान ने भाषा दी है .सूखा और बाढ़पर रेणु जी की रपट है -धनजल और ऋणजल ..बाद में किताब की शक्ल में राज कमल से प्रकाशित हुई .
चंचल के ब्लाग से 
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